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राजस्थान: पायलट और गहलोत का वाकई पुनर्मिलन या पर्दे के बीच कुछ और!

Thu, 12 Jun 2025 04:09 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Thu, 12 Jun 2025 04:09 PM IST
सार

सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच की तल्खी को समझने के लिए कुछ साल पहले जाना होगा। वर्ष 2018 में जब राजस्थान विधानसभा चुनाव हुए, तब सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष थे।

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Rajasthan: Is Pilot and Gehlot really reuniting or something else behind the scenes
कांग्रेस नेता, सचिन पायलट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वैसे, राजस्थान में सत्ता भारतीय जनता पार्टी की है, लेकिन सियासत की गर्मी कांग्रेस में बनी हुई है। पिछले चंद दिनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो यूं लग रहा है कि कांग्रेस में अब पैचअप की राजनीति तेज हो गई है। कांग्रेस के दो कद्दावर नेता पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच एक बार फिर नजदीकियां देखने को मिल रही हैं।

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यह वाकई पुनर्मिलन है या कुछ और, यह तो वक्त बताएगा। हालांकि, दोनों नेताओं को राजस्थान के पार्टी संगठन में कोई जिम्मेदारी नहीं मिली हुई है, लेकिन दोनों अवसर आने पर शक्ति प्रदर्शन से नहीं चूकते हैं। 
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सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच की तल्खी को समझने के लिए कुछ साल पहले जाना होगा। वर्ष 2018 में जब राजस्थान विधानसभा चुनाव हुए, तब सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनाव जीता था, लेकिन ऐन मौके पर अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा बैठे। सचिन को भले उप मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन सूत्र बताते हैं कि उन्हें कामकाज की स्वतंत्रता नहीं थी।
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दोनों नेताओं के बीच इस कदर दूरियां थीं कि जून-जुलाई 2020 को जब कोविड देश में चरम पर था, सचिन पायलट साइलेंट बगावत करके कुछ मंत्रियों और विधायकों के साथ गुरुग्राम में डेरा डालकर बैठ गए थे। जयपुर में अशोक गहलोत को कांग्रेस विधायकों को बाड़ेबंदी में रखना पड़ा था। इसी दौरान 20 जुलाई 2020 को अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को नकारा-निकम्मा तक कह डाला था। 

खैर, कुछ दिनों बाद सचिन पायलट लौट आए थे, लेकिन उनका उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का पद चला गया था। जो मंत्री उनके साथ गए थे, उनको दोबारा कुर्सी मिल गई थी। दो साल बाद एकाएक राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने की सुगबुगाहट तेज हुई।

कांग्रेस के केंद्रीय संगठन ने राजस्थान में विधायकों का मत जानने के लिए पर्यवेक्षक तक भेज दिए, जिनमें मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन शामिल थे। 25 सितंबर 2022 की शाम को पर्यवेक्षकों को विधायकों से मिलना था, लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत के खेमे ने झंडा उठा लिया। बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर दी और सचिन पायलट एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर चले गए। 

वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई, लेकिन इस बार उसकी स्थिति उतनी खराब नहीं हुई, जितनी वर्ष 2013 के चुनाव में हुई थी। कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें मिलीं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में 10 साल बाद उसने वापसी की और 8 सीटें जीतीं।

अब कांग्रेस मजबूत विपक्ष की भूमिका में है। प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सरकार को रोजाना घेरते हैं। इधर, सचिन पायलट को राजस्थान से दूर छत्तीसगढ़ का प्रभारी बना दिया गया है। वो राष्ट्रीय महासचिव भी हैं।

दूसरी ओर, अशोक गहलोत पूर्व मुख्यमंत्री का तमगा लेकर घूम रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक यहां तक कहते हैं कि जिस तरह से अशोक गहलोत इनदिनों सक्रिय हैं, वैसी सक्रियता उनकी पहले कभी नहीं देखी है। केंद्रीय संगठन भले अशोक गहलोत को कोई खास तवज्जो न दे रहा हो, लेकिन वो अपनी प्रासंगिकता को बनाए हुए हैं। वह कांग्रेस के मंचों पर नजर आते हैं और मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधते हैं। 

एक समय गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे अशोक गहलोत अब भी यही जताते हैं कि गांधी परिवार अब भी उन पर विश्वास करता है। उन्होंने स्वयं को आगामी चुनाव से दूर नहीं बताया है, यानी उनके मन में कहीं न कहीं यह इच्छा जरूर है कि चौथी बार यदि मौका मिले तो वह फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकते हैं। हालांकि, यह बात कांग्रेस के  बाकी नेताओं को शायद ही हजम नहीं होती हो।

सचिन पायलट भी स्वयं को कहीं न कहीं भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहे हैं। 11 जून को पिता स्वर्गीय राजेश पायलट की 25वीं पुण्यतिथि पर सचिन पायलट ने एक तरह से शक्ति प्रदर्शन कर यह जताया भी है। इस कार्यक्रम में राजस्थान के सभी आठ कांग्रेस सांसद, अशोक गहलोत समेत 47 विधायक, 80 से अधिक पूर्व विधायक, पूर्व सांसद व पूर्व मंत्री पहुंचे।

खास बात यह है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की दूरी मिट गई हैं, यह भी दोनों नेता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। 7 जून को अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पर स्वयं की सचिन पायलट के साथ फोटो साझा की। 11 जून को उन्होंने यह तक कह दिया कि उनके बीच में कोई मनमुटाव नहीं है। 

राजस्थान में विधानसभा चुनाव में अभी काफी वक्त है। क्या दोनों नेता अभी से कदम फूंक-फूंक कर चल रहे हैं। हालांकि, राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सचिन पायलट स्वयं को भले गांधी परिवार का करीबी मानते हों, लेकिन उनके लिए राह आसान नहीं होगी। यह स्पष्ट रूप से अशोक गहलोत की सक्रियता से नजर आता है। जो भी हो, लेकिन राजस्थान में सत्ता से दूर हुई कांग्रेस के लिए यह एक सुखद पल कहा जा सकता है, जहां पर संगठन एकबार फिर एकजुट दिख रहा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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