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दिल्ली का इतिहास: प्राचीन इतिहास का प्रतिबिंब है पुराना किला
सार
आज जहां पुराना किला विद्यमान है,वह क्षेत्र अपने भीतर 2600 वर्ष का इतिहास समेटे हुए है। इसी पुराने किले के विषय में अबुल फजल ने लिखा था कि दिल्ली जिसका प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ है।
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दिल्ली में स्थित पुराना किला।
- फोटो : AI Generated
विस्तार
दिल्ली दीर्घकाल से भारतीय राजनीति का केंद्र रही है। मध्यकाल में दिल्ली का महत्व व उसके इतिहास की चर्चा तो इतिहास की प्रत्येक पुस्तक व आमजन की जुबां पर है। परन्तु, क्या दिल्ली का मध्यकाल के पूर्व कोई इतिहास नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर तो पुरातात्विक सर्वेक्षणों व उत्खननों में ही निहित है। आमजन को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि दिल्ली का यह क्षेत्र तो प्रागैतिहासिक काल से ही मानव की क्रीड़ास्थली रहा है।
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अरावली जो दिल्ली तक व्याप्त है, उसके आसपास पाषाण युगीन मानव ने अपना बसेरा बसाया था। वर्तमान जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, अनंगपुर, छतरपुर, दिल्ली विश्वविद्यालय स्थित रिज आदि 40 से अधिक स्थलों से पुरापाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं,जो कई लाख साल पुराने हैं।
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आज जहां पुराना किला विद्यमान है,वह क्षेत्र अपने भीतर 2600 वर्ष का इतिहास समेटे हुए है। इसी पुराने किले के विषय में अबुल फजल ने लिखा था कि दिल्ली जिसका प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ है। जहां इंद्रप्रस्थ का किला था उसी स्थल पर हुमायूं ने दीनपनाह (पुराना किला) बनवाया। पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ को ढूंढने के उद्देश्य से ही पुराना किले का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने कई बार करवाया।
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यहां हुए पुरातात्विक उत्खनन में सबसे निचले स्तर से चित्रित धूसर मृदभांड प्राप्त हुए। बीबी लाल इन मृदभांडों को महाभारत कालीन मानते हैं। इन मृदभांडों से जुड़ी संस्कृति को 3000 वर्ष पूर्व का माना जाता है। खैर हाल ही में हुए पुरातात्विक उत्खनन से यह संस्कृति यहां 540 ईस्वी पूर्व में विद्यमान थी ऐसा ज्ञात हुआ है। यहां यह ध्यान रखना होगा कि पुराविद पुराने किले के सबसे निचले स्तर तक अभी तक नहीं पहुंच पाए हैं।
इसके बाद अर्थात चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में दिल्ली मौर्य शासकों के अधीन रही। पुराना किला उत्खनन में मौर्य काल के पात्र जिनमें एन.बी.पी.डब्ल्यू प्रमुख हैं,प्राप्त हुए हैं। इसके साथ ही भारत की प्रथम मुद्रा जिसे आहत मुद्रा के नाम से जाता है, यहां से बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। मौर्य काल का रिंग वैल उत्खनन में मिलना इस बात का द्योतक है कि मौर्य काल में यहां स्थाई बसाहट विद्यमान थी।
मौर्य वंश के बाद भारत भूमि पर शुंग वंश का शासन स्थापित हुआ। 200 ईस्वी पूर्व से ईस्वी सन् प्रारंभ होने तक यहां से शुंग कालीन अवशेष मिलते हैं। शुंग काल के कच्ची ईंटों के बने घर, स्त्री - पुरुष कि मिट्टी की मूर्तियां, पशु मृणमूर्तियां, पत्थर के बांट, ताम्र निर्मित सिक्के आदि शुंग काल के दौरान यहां रहने वाले लोगों के साक्ष्य हैं।
इसके बाद ही प्रथम ईस्वी सन से लेकर द्वितीय शताब्दी ईस्वी तक यहां कुषाण कालीन बस्ती विद्यमान थी। कुषाण काल के पकी ईंटों के बने घरों के अवशेष उत्खनन में मिले हैं। कुषाण कालीन ताम्र मुद्राओं के साथ एक मिट्टी की मुहर मिली है जिसपर संस्कृत भाषा व ब्राह्मी लिपि में "भूकारक" शब्द लिखा हुआ है। भू से तात्पर्य भूमि से है। यह मुहर हाथी दांत से बनी है।
200 ईस्वी से 600 ईस्वी तक दिल्ली गुप्त शासकों व उनके बाद शासन करने वाले शासकों के अधीन रही। गुप्त काल के दौरान बने घर, मिट्टी के बर्तन आदि उत्खनन में मिले हैं। उत्खनन में एक मुहर मिली है,जिसपर ब्रह्मवर्त लिखा हुआ है। इसी काल के एक गले में पहनने वाले मिट्टी के मेडैलियन पर गज लक्ष्मी का अंकन है,जो उस काल की धार्मिक मान्यताओं की परिचायक है।
600 ईस्वी से 1200 ईस्वी तक दिल्ली पर राजपूत शासकों का आधिपत्य रहा। पुराना किला उत्खनन से यह ज्ञात हुआ है कि इस काल में यहां पत्थरों का उपयोग कर किलेबंदी की गई थी। इस काल के स्तरों से हमें वैकुंठ विष्णु की एक सुंदर प्रतिमा और भगवान गणेश की एक प्रतिमा भी प्राप्त हुई है।
1200 ईस्वी के पश्चात पुराना किला मुस्लिम शासकों के अधीन हो गया। उत्खनन में मिलने वाले सल्तनत कालीन पुरावशेष इस तथ्य के प्रतिबिंब है। दिल्ली दो राजपूत वंश तोमर व चौहानों का केंद्र रही। कहा जाता है कि दिल्ली नाम भी राजपूत काल में ही अस्तित्व में आया था। दिल्ली का एक और नाम योगिनीपुरा भी था। जहां आज कुतुब मीनार विद्यमान है उस क्षेत्र में तोमर शासकों द्वारा बनाया किला जिसे लाल कोट कहा जाता था,विद्यमान था। यहां कई मंदिर विद्यमान थे जिनका बारहवीं शताब्दी के बाद विध्वंस कर दिया गया।
यह पुरातात्विक तथ्य इस बात के परिचायक हैं कि दिल्ली का इतिहास केवल मध्यकाल तक सीमित नहीं है। उसका एक लंबा गौरवशाली अतीत है जिससे हम अनभिज्ञ हैं। पुराने किले में पुन: प्रारंभ हुआ उत्खनन प्राचीन दिल्ली के और क्या नवीन रहस्य उद्घाटित करेगा यह जानना रोचक होगा।
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