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बिहार अपराध और क्राइम के बहाने: क्या अपराध खत्म हो गया है या परिभाषा बदलने में जुटे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी?

सार

Bihar Law And Order: बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का दावा है कि राज्य में अपराध का कॉन्सेप्ट ही खत्म हो चुका है। क्राइम हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं! मुख्यमंत्री के इस बयान ने कानून-व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या शब्दों का अर्थ बदल देने से अपराध की वास्तविकता भी बदल जाती है? सम्राट चौधरी के पुराने बयानों, 1995 के चर्चित एफिडेविट विवाद, पुलिस एनकाउंटर और मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में सामने आई आपराधिक घटनाओं को एक साथ रखकर देखना जरूरी है।

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Crime Erased or a Game of Statistics? Questions Over Samrat Choudhary's Claims and Police Encounters in Bihar
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Samrat Choudhary Statement: बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 3 नवंबर 2026 को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में अपराध को लेकर ऐसा बयान दिया, जिसने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा छेड़ दी। उन्होंने कहा- 

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हमारे यहां कोई अपराध नहीं है। अपराध का कॉन्सेप्ट ही खत्म हो चुका है। क्राइम हो सकते हैं, लेकिन अपराध नहीं। कोई अपराधी नहीं है।" मुख्यमंत्री का यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। विपक्ष ने इसे लेकर सवाल उठाए और बिहार की कानून-व्यवस्था पर तंज कसा।

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राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री के बयान पर कटाक्ष करते हुए सवाल किया कि मंच पर बैठे आईएएस और आईपीएस अधिकारी उनके इस तर्क को किस रूप में ले रहे होंगे। यहां सवाल केवल भाषा या शब्दों के चयन का नहीं है। अंग्रेजी का Crime और हिंदी का अपराध एक ही अर्थ रखते हैं। दोनों के बीच अंतर बताकर अपराध के अस्तित्व को नकारने का क्या औचित्य है? हो सकता है मुख्यमंत्री यह बताना चाह रहे हों कि उनकी सरकार ने अपराध पर प्रभावी नियंत्रण कर लिया है। यदि ऐसा है तो उन्हें अपराध के आंकड़ों और तुलनात्मक रिकॉर्ड के साथ अपनी बात रखनी चाहिए थी।

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मुख्यमंत्री और गृह विभाग की जिम्मेदारी
इस बयान को हल्के में इसलिए भी नहीं लिया जा सकता क्योंकि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री होने के साथ गृह विभाग की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी सीधे उनके नेतृत्व वाली सरकार पर है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बिहार में अपराध का कॉन्सेप्ट ही समाप्त हो चुका है तो हत्या, लूट, अपहरण, रंगदारी, दुष्कर्म और साइबर अपराध जैसी घटनाओं को किस श्रेणी में रखा जाएगा? क्या पुलिस थानों में दर्ज एफआईआर अपराध नहीं हैं? क्या अदालतों में चल रहे आपराधिक मुकदमे केवल शब्दों का भ्रम हैं?

मुख्यमंत्री का दावा जितना बड़ा है, उसकी पुष्टि के लिए उतने ही ठोस प्रमाण भी जरूरी हैं। बिहार की जनता को शब्दों की नई परिभाषा नहीं, अपराध से सुरक्षा चाहिए।

पुराने बयान: कभी आबादी, कभी ऑनलाइन एफआईआर!
सम्राट चौधरी के मौजूदा बयान को उनके पुराने वक्तव्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।फरवरी 2026 में जब वह उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री थे, तब बिहार में दर्ज अपराधों के बढ़ते आंकड़ों पर उन्होंने अलग तर्क दिया था। बिहार विधान परिषद में अपराध के आंकड़ों पर सवाल उठे तो उनका कहना था कि आबादी बढ़ने और ऑनलाइन शिकायत तथा डिजिटल एफआईआर की सुविधा शुरू होने से दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है। उन्होंने एनसीआरबी के आंकड़ों के संदर्भ में बताया कि वर्ष 2004 में बिहार में संज्ञेय अपराधों के 1,15,216 मामले दर्ज हुए थे, जबकि बाद के वर्षों में यह संख्या लगभग 3.52 लाख तक पहुंच गई। उनका तर्क था कि डिजिटल माध्यम से शिकायत दर्ज कराने की सुविधा मिलने के कारण पहले जिन शिकायतों को दर्ज नहीं कराया जाता था, वे भी अब पुलिस रिकॉर्ड में आ रही हैं। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता।

ऑनलाइन एफआईआर और शिकायत दर्ज कराने की बेहतर व्यवस्था से दर्ज मामलों की संख्या बढ़ सकती है। लेकिन क्या अपराध के बढ़ते आंकड़ों की पूरी व्याख्या केवल आबादी और ऑनलाइन रिपोर्टिंग से की जा सकती है? अगर दर्ज मामलों की संख्या बढ़ रही है तो यह भी देखना होगा कि हत्या, अपहरण, चोरी, लूट और महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में अलग-अलग क्या स्थिति है। यानी फरवरी में बढ़ते अपराध के आंकड़ों को समझाने के लिए रिपोर्टिंग व्यवस्था का तर्क और नवंबर में अपराध का कॉन्सेप्ट ही खत्म होने का दावा- इन दोनों के बीच सरकार को स्पष्टता देनी चाहिए।

1995 का एफिडेविट: उम्र का विवाद क्यों उठा?
सम्राट चौधरी के राजनीतिक जीवन का एक पुराना विवाद 1995 के एक हत्याकांड और उससे जुड़े एफिडेविट को लेकर भी है। 29 मार्च 1995 को मुंगेर जिले के तारापुर क्षेत्र में कांग्रेस नेता सच्चिदानंद सिंह और उनके समर्थकों पर हमला हुआ था। इस घटना में कई लोगों की जान गई थी।इस मामले में दर्ज प्राथमिकी में तत्कालीन विधायक शकुनी चौधरी और उनके बेटे राकेश कुमार, जिन्हें आज सम्राट चौधरी के नाम से जाना जाता है, सहित 27 लोगों को आरोपी बनाया गया था।

24 अप्रैल 1995 को अदालत में दाखिल एफिडेविट में राकेश कुमार की जन्मतिथि 1 जनवरी 1981 बताई गई थी। इस आधार पर उन्हें घटना के समय नाबालिग दिखाया गया था। लेकिन बिहार विधान परिषद के रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि 16 नवंबर 1968 दर्ज है। इस हिसाब से 1995 में उनकी उम्र लगभग 26 वर्ष थी। यह विसंगति 2025 में प्रशांत किशोर द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद फिर चर्चा में आई।

सम्राट चौधरी ने 25 अक्टूबर 2025 को इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि एफिडेविट में उन्हें नाबालिग दिखाया गया था। हालांकि उनका कहना था कि यह उनके वकील ने दाखिल किया था और अदालत ने उस दलील को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा था कि पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण उनका, उनके पिता और अन्य लोगों का नाम आरोपपत्र दाखिल होने से पहले ही हटा दिया गया था। इसलिए यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि प्राथमिकी में नाम होना दोष सिद्ध होना नहीं है। इस मामले में सम्राट चौधरी की दोषसिद्धि का उल्लेख नहीं है।लेकिन एफिडेविट में दर्ज जन्मतिथि और आधिकारिक रिकॉर्ड के बीच अंतर का सवाल अपनी जगह कायम है।

चुनावी हलफनामे में दर्ज मुकदमे
2025 के विधानसभा चुनाव में तारापुर से दाखिल उनके चुनावी हलफनामे में दो लंबित मामलों का उल्लेख था। इनमें एक मामला 2014 का और दूसरा 2023 का बताया गया है। दोनों मामलों में आरोपों और कानूनी धाराओं का उल्लेख है, लेकिन किसी मामले में दोषसिद्धि घोषित नहीं हुई है।

यहां भी आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच अंतर समझना जरूरी है। लोकतंत्र में किसी मुख्यमंत्री के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाना अनुचित नहीं है। खासकर तब, जब वही मुख्यमंत्री अपराध और अपराधियों के अस्तित्व को लेकर असाधारण दावा कर रहे हों। सवाल यह नहीं कि स्वयं मुख्यमंत्री पर कितने आरोप हैं, सवाल यह है कि सार्वजनिक जीवन में उठने वाले गंभीर सवालों का जवाब कितनी पारदर्शिता से दिया जाता है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद एनकाउंटर की चर्चा

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में अपराध नियंत्रण के नाम पर पुलिस मुठभेड़ों की चर्चा भी तेज हुई। सरकार ने अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश दिया, लेकिन कुछ घटनाओं ने पुलिस की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इनमें सबसे चर्चित मामला भोजपुर के भरत भूषण तिवारी का है।

भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: पुलिस के दावे पर सवाल

17 जून 2026 को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में गोली लगने से मौत हो गई। पुलिस का दावा था कि भरत के पास अवैध हथियार था और उसने पुलिस टीम पर गोली चलाई। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने गोली चलाई और वह घायल हो गया। बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

लेकिन परिवार और स्थानीय लोगों ने पुलिस के इस दावे को चुनौती दी। भरत की मां आशा देवी का आरोप था कि उनके बेटे ने हथियार नीचे रखकर आत्मसमर्पण कर दिया था, इसके बावजूद पुलिस ने उसे गोली मारी। घटना से संबंधित वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों ने भी विवाद को बढ़ाया। मामला इतना गंभीर हुआ कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को 20 जून को उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने की घोषणा करनी पड़ी।

यहां एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम और हुआ। बिहार पुलिस ने घटना से जुड़े चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया। बाद में 31 जुलाई को एसटीएफ के जवान अक्षय कुमार को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। यह किसी पुलिसकर्मी की इस मामले में पहली गिरफ्तारी थी। अगस्त में नागरिक अधिकार संगठन पीयूसीएल की तथ्य-जांच रिपोर्ट भी सामने आई। संगठन ने गांव जाकर परिवार, प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों से बातचीत की तथा एफआईआर और पोस्टमार्टम से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन किया।

पीयूसीएल ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस के एनकाउंटर वाले दावे पर गंभीर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि भरत के आत्मसमर्पण के बाद भी उस पर गोलियां चलाई गईं। दूसरी ओर पुलिस का पक्ष था कि भरत ने हथियार से हमला किया था और जवाबी गोलीबारी आत्मरक्षा में हुई। यहां किसी एक पक्ष के आरोप को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। न्यायिक जांच और आपराधिक जांच के निष्कर्ष ही घटना की वास्तविक जिम्मेदारी तय कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह जरूर है कि अगर पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह नियमानुसार थी तो फिर इस मामले में न्यायिक जांच, पुलिसकर्मियों का निलंबन और एसटीएफ जवान की गिरफ्तारी की नौबत क्यों आई?

एनकाउंटर की सफलता या पुलिस की जवाबदेही?

भरत तिवारी का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल अपराध नियंत्रण की कार्रवाई नहीं, बल्कि पुलिस के अधिकारों की सीमा और नागरिक के जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।किसी व्यक्ति के पास अवैध हथियार होना कानूनन अपराध हो सकता है। उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है, गिरफ्तारी हो सकती है और अदालत में मुकदमा चल सकता है।

लेकिन किसी आरोपी को गोली मारने का अधिकार पुलिस को स्वतः नहीं मिल जाता। आत्मरक्षा में बल प्रयोग की परिस्थितियां कानून और न्यायिक जांच के अधीन होती हैं। अगर कोई आरोपी पुलिस पर गोली चलाता है तो पुलिस को अपनी सुरक्षा का अधिकार है। लेकिन अगर आत्मसमर्पण के बाद गोली चलाने का आरोप सामने आता है तो उसकी निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरूरी है। मुख्यमंत्री को अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन पुलिस को कानून से ऊपर रखने का अधिकार किसी को नहीं है।

ऑपरेशन लंगड़ा और पुलिस मुठभेड़ों का सवाल
बिहार में अपराधियों के पैरों में गोली मारकर गिरफ्तारी की कार्रवाई को लेकर 'ऑपरेशन लंगड़ा' शब्द भी चर्चा में आया। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती पांच सप्ताह में पुलिस मुठभेड़ों की संख्या को लेकर मीडिया रिपोर्टों में लगभग 11 घटनाओं का उल्लेख हुआ। इनमें दो आरोपियों की मौत और नौ लोगों के घायल होने की खबर थी। यह आंकड़ा अपने आप में पुलिस कार्रवाई की प्रकृति पर चर्चा की मांग करता है।

क्या अपराधियों के खिलाफ सख्ती का अर्थ उन्हें गोली मारकर गिरफ्तार करना है? क्या पुलिस की सफलता का पैमाना एनकाउंटर की संख्या होना चाहिए? कानून-व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि अपराध कितने रोके गए, कितने मामलों की निष्पक्ष जांच हुई और कितने आरोपियों को अदालत से सजा मिली। एनकाउंटर पर तालियां बजाने से पहले यह देखना भी जरूरी है कि कानून की रक्षा करने वाली पुलिस स्वयं कानून का पालन कर रही है या नहीं।

अपराध की दूसरी तस्वीर: जमुई से सीवान तक
भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद सितंबर 2026 में जमुई की एक नाबालिग छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न की घटना सामने आई। घटना का वीडियो भी वायरल हुआ। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की और एक आरोपी को मुठभेड़ में गोली लगने के बाद गिरफ्तार किया। लेकिन इस घटना ने एक और विवाद खड़ा कर दिया। पीड़िता और उसके परिवार की तस्वीर मुख्यमंत्री के आधिकारिक एक्स हैंडल पर साझा कर दी गई। बाद में तस्वीर हटाई गई और मुख्यमंत्री कार्यालय के एक कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।

यह मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि पीड़िता की पहचान और निजता की सुरक्षा का भी था। यहां सवाल उठता है कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा का दावा करने वाली सरकार के अपने कार्यालय से ऐसी चूक कैसे हुई? जमुई की घटना के अलावा सीतामढ़ी में गोलीबारी और हत्या की घटना भी चर्चा में रही। पुलिस अधिकारियों को निलंबित करने की कार्रवाई हुई। विपक्ष ने इन घटनाओं को कानून-व्यवस्था की स्थिति से जोड़कर सरकार को घेरा। इन घटनाओं को किसी एक राजनीतिक दल के आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों के आधार पर देखना चाहिए।

सरकार के पक्ष के आंकड़े भी महत्वपूर्ण
इस पूरे विश्लेषण में सरकार के पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 14 अगस्त 2026 को बिहार के गृह विभाग के सचिव प्रणव कुमार और डीजीपी विनय कुमार ने प्रेस वार्ता में अपराध के आंकड़े पेश किए। सरकार के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में हत्या के मामलों में 10.1 प्रतिशत, डकैती में 31.32 प्रतिशत और दंगा संबंधी मामलों में 18.97 प्रतिशत की कमी आई है।

इसके अलावा बिहार पुलिस मुख्यालय की 29 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई और अगस्त 2026 में विशेष अभियान चलाकर 73,720 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें हत्या से जुड़े मामलों में 898 गिरफ्तारियां भी शामिल थीं। ये आंकड़े सरकार के पक्ष में जाते हैं और इन्हें स्वीकार करना चाहिए। लेकिन गिरफ्तारियों की संख्या को अपराध में कमी का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। अपराध नियंत्रण का आकलन करने के लिए दर्ज मामलों, अपराध की दर, जांच की गुणवत्ता, आरोपपत्र दाखिल करने, दोषसिद्धि और पीड़ितों को न्याय मिलने की स्थिति भी देखनी होगी।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि गृह विभाग के आंकड़े पूरे वर्ष की तुलना पर आधारित हैं। इन्हें केवल 15 अप्रैल के बाद सम्राट चौधरी के कार्यकाल का परिणाम बताना भी सही नहीं होगा। इसलिए सरकार को मुख्यमंत्री बनने के बाद की अवधि के अलग और तुलनात्मक आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए।

मुख्यमंत्री से कुछ सीधे सवाल
सम्राट चौधरी के बयान और उनके शासनकाल की घटनाओं को सामने रखकर कुछ सवाल पूछना जरूरी है। 

  1. अगर बिहार में अपराध का कॉन्सेप्ट खत्म हो चुका है तो पुलिस थानों में दर्ज आपराधिक मुकदमों की व्याख्या क्या है?
  2.  फरवरी में बढ़ते अपराध के आंकड़ों को आबादी और ऑनलाइन एफआईआर से जोड़ने वाली सरकार नवंबर में अपराध के अस्तित्व को ही क्यों नकार रही है?
  3. भरत भूषण तिवारी की मौत के मामले में पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी और न्यायिक जांच की आवश्यकता क्यों पड़ी? जांच पूरी होने पर क्या सरकार निष्कर्ष सार्वजनिक करेगी?
  4. क्या पुलिस एनकाउंटर को अपराध नियंत्रण की सफलता का पैमाना माना जाएगा या कानून के दायरे में रहकर गिरफ्तारी और दोषसिद्धि को?
  5. जमुई की नाबालिग पीड़िता की तस्वीर मुख्यमंत्री के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर कैसे पहुंची? पीड़िता की निजता की जिम्मेदारी किसकी है?
  6. क्या सरकार हत्या, दुष्कर्म, अपहरण, लूट और रंगदारी के मामलों का अलग-अलग तुलनात्मक रिकॉर्ड सार्वजनिक करेगी?


अपराध की परिभाषा नहीं, जवाबदेही बदलिए!
बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति का मूल्यांकन राजनीतिक भाषणों या विपक्ष के आरोपों से नहीं होना चाहिए। इसके लिए सरकारी आंकड़े, पुलिस रिकॉर्ड, अदालतों के फैसले और आम नागरिकों के अनुभव सभी महत्वपूर्ण हैं।
सम्राट चौधरी सरकार के पास यह बताने का अवसर है कि उसने अपराध नियंत्रण के लिए क्या ठोस कदम उठाए हैं और उनका क्या परिणाम निकला है। अगर हत्या और डकैती के मामलों में वास्तव में कमी आई है तो यह सरकार की उपलब्धि है। लेकिन जहां पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं, वहां निष्पक्ष जांच भी सरकार की ही जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री को यह भी समझना होगा कि अपराधियों के खिलाफ सख्ती और पुलिस की जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कानून का शासन तभी मजबूत होता है जब अपराधी को सजा मिले और निर्दोष के अधिकारों की भी रक्षा हो।क्राइम और अपराध में अंतर बताने से अपराध खत्म नहीं होते। एफिडेविट में उम्र का विवाद हो या पुलिस एनकाउंटर पर उठते सवाल, हर मामले में जवाबदेही जरूरी है। बिहार की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके राज्य में कानून का राज कितना मजबूत हुआ है।

आखिर मुख्यमंत्री से सवाल यही है- बिहार में अपराध खत्म हुआ है या सिर्फ अपराध को देखने और उसकी व्याख्या करने का तरीका बदल गया है?

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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