पुणे पोर्श कार केस: यदि झूठ से पर्दा उठता है तो अच्छा है मीडिया ट्रायल
अपने पाठकों और दर्शकों की खबरों की भूख को शांत करने के लिए मीडिया 24 घंटे ऐसे केसों की रिपोर्टिंग करने लगता है। नोएडा का निठारी कांड हो या अभिनेता सलमान खान का चिंकारा शिकार केस, मीडिया रिपोर्टिंग को कठघरे में डालने की कोशिशें हुई हैं।
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जॉली एलएलबी फिल्म आपको याद होगी? कैसे एक रसूखदार परिवार का बेटा राहुल दीवान अपनी महंगी कार से फुटपाथ पर रह रहे लोगों को कुचल देता है। पैसों के बल पर पूरा परिवार बेटे को बचाने के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करता है, लेकिन मीडिया और एक वकील की कोशिशों से आरोपी राहुल दीवान न केवल जेल जाता है, बल्कि पूरे भ्रष्ट तंत्र का खुलासा भी होता है। कुछ-कुछ यही कहानी पुणे के पोर्श कार केस की है।
यहां भी नाबालिग आरोपी के दादा और पिता पुणे के नामी बिल्डर हैं। एक सामान्य सड़क पर नाबालिग अपने बर्थडे गिफ्ट में मिली 2.5 करोड़ रुपए की पोर्श कार को शराब के नशे में 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाता है। सड़क पर मोटरसाइकिल से जा रहे दो युवाओं की जान ले लेता है, लेकिन रसूखदार परिवार सरकारी तंत्र की कमियों का फायदा उठाकर बेटे को बचाने की कोशिश करता है।
यह कोशिश कुछ हद तक सफल भी होती दिखती है, लेकिन मीडिया की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया पर आमजन का गुस्सा बढ़ने के बाद न्यायपालिका, सरकार और पुलिस को अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
पुणे पोर्श कार केस
पुणे के पोर्श कार केस में मीडिया की भूमिका पर एकबार चर्चा छिड़ी है। बड़ा वर्ग ऐसे केसों में मीडिया ट्रायल का पक्षधर है, जबकि एक वर्ग मीडिया ट्रायल की यह कहकर आलोचना करता है कि मीडिया कुछ विशेष केसों को उठाकर पब्लिक प्रेशर बनाता है। हालांकि, यह बात सही है कि जब भी किसी रसूखदार व्यक्ति या परिवार द्वारा किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जाता है तो मीडिया की भूमिका काफी बढ़ जाती है।
यह बात सही है कि अपने पाठकों और दर्शकों की खबरों की भूख को शांत करने के लिए मीडिया 24 घंटे ऐसे केसों की रिपोर्टिंग करने लगता है। नोएडा का निठारी कांड हो या अभिनेता सलमान खान का चिंकारा शिकार केस, मीडिया रिपोर्टिंग को कठघरे में डालने की कोशिशें हुई हैं।
मीडिया ट्रायल को गलत ठहराने वाला वर्ग यह भी तर्क देता है कि ऐसे केसों में मीडिया जज की भूमिका में आ जाता है और कोर्ट के निर्णय से पहले अपना फैसला खबरों के माध्यम से सुना देता है। जॉली एलएलबी फिल्म में भी राहुल दीवान का वकील तेजेंदर राजपाल कोर्ट में इसी बात को बार-बार उठाता है कि उनके मुवक्किल को मीडिया कोर्ट से पहले दोषी करार दे रहा है।
सवाल यह है कि ऐसे केसों में क्या मीडिया को आंखें मूंदकर बैठ जाना चाहिए? क्या सीसीटीवी फुटेज में 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही पोर्श कार को अनदेखा कर दिया जाए? यदि इस केस में मीडिया तथ्यों की तह तक जाकर पूरे प्रकरण को उजागर नहीं करता तो बहुत संभव था कि दो मासूम युवाओं की जान लेने वाला अपराधी नाबालिग होने की दुहाई देकर मात्र 300 शब्दों का निबंध लिखकर छूट जाता।
मीडिया-सोशल मीडिया की शक्ति
यह मीडिया ही है, जिसने रसूखदार परिवार और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के धागे खोल डाले। पोर्श कार केस में परिवार कितना रसूखदार है और तंत्र का कैसे इस्तेमाल करता है? यह मीडिया की खबरों से ही पता चला। कैसे शराब के नशे में कार चला रहे नाबालिग बेटे के ब्लड सैंपल को मां के ब्लड सैंपल से 50 लाख रुपए लेकर डॉक्टर बदल देते हैं।
रसूखदार परिवार घर के गरीब ड्राइवर पर बेटे के अपराध को स्वीकार करने का दबाव बनाता है। यहां तो मीडिया को साधुवाद दिया जाना चाहिए, कैसे वो इस अति गंभीर केस के सच को दुनिया के आगे लेकर आया। दूसरा, सोशल मीडिया जिसकी पहुंच मीडिया से कहीं तेज है, ने पुणे के पोर्श केस में पुलिस और सरकार को विवश किया कि वो रसूखदारों को बख्शे नहीं, कड़ी कार्रवाई करे।
मीडिया ट्रायल की शुरुआत नब्बे के दशक के अंत में हुई। साल 2000 के बाद इसने तेजी पकड़ी। हालांकि, मीडिया ट्रायल की सीधे शब्दों में परिभाषा नहीं है, लेकिन एक बात मीडिया ट्रायल को लेकर कही जाती है कि इससे अपराध करने वाले की कोर्ट-कचहरी से पहले ही नकारात्मक छवि पेश कर दी जाती है। इससे न्यायपालिका से लेकर सरकार कहीं न कहीं प्रभावित होती है।
मीडिया ट्रायल के विरोधी संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देकर इसे निजता पर हमला बताते हैं, लेकिन जो सच नंगी आंखों से दिख रहा है, क्या उसे अनदेखा किया जा सकता है? यदि मीडिया ट्रायल से एक अपराधी पकड़ा जाता है। अपने पैसों का इस्तेमाल करके छूट नहीं पाता और उसे उसके किए की सजा मिलती है तो इसके लिए मीडिया का धन्यवाद दिया जाना चाहिए। यदि अपराधों को रोकने और समाज को सही संदेश देने में मीडिया की भूमिका बढ़ती है तो यह ट्रायल अच्छा है।
सोशल मीडिया पर भले लोग जज नहीं हैं, लेकिन लोकतंत्र में जनता के विचार मायने रखते हैं। उम्मीद यही है कि पुणे के पोर्श कार जैसे केसों में मीडिया आगे भी अपनी भूमिका निभाता रहेगा और भ्रष्टाचार को रोकने में मददगार साबित होगा।
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