{"_id":"672176339bad615169017a95","slug":"profit-with-goodness-tradition-of-india-indian-philosophy-and-diwali-festival-connection-2024-10-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"दीपावली का संदेश: लाभ को शुभ होना चाहिए..., अपने भीतर नूतन ऊर्जा का सृजन कर एक नए उत्साह के साथ आगे बढ़ें","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
दीपावली का संदेश: लाभ को शुभ होना चाहिए..., अपने भीतर नूतन ऊर्जा का सृजन कर एक नए उत्साह के साथ आगे बढ़ें
Wed, 30 Oct 2024 05:26 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 30 Oct 2024 05:26 AM IST
सार
लाभ के साथ हमारी परंपरा में शुभ भी लिखा जाता है। ऐसा लाभ कभी फलदायी नहीं हो सकता, जिसमें शुभता न हो। भारतीय दर्शन में इसका बहुत महत्व है। दीपावली हमारे जीवन में शुभ और लाभ के इसी अर्थ को समझाती है।
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
विद्वान कहते हैं कि आज हमें सनातन सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक ऐसे दीपों को जलाने की जरूरत है, जो ‘अपो दीपो भवः’ के भाव के साथ आत्मचेतना को प्रकाशित करने के लिए प्रेरित कर सकें। इस पावन पर्व पर दीपों की लालिमा हमारे समाज के जीवंत और उत्सवधर्मी मन को बयां करती है। हम उमंग, उत्साह और ऊर्जा के इस उत्सव को सिर्फ पटाखों के शोर या बिजली की महंगे झालरों की चमचमाती रोशनी मात्र तक सीमित न मान लें, बल्कि इस पर्व की उत्सवधर्मिता को समझने का प्रयास करें।
विज्ञापन
चहुंओर फैले प्रकाश को देखते हुए कुछ समय अंतर्मन की यात्रा पर जाएं। मन-मस्तिष्क में प्रेम और प्रसन्नता के दीप जलाएं। शांति और सुकून का अहसास करें। दिवाली हमें याद दिलाती है कि हम प्रकाश हैं। सिर्फ दीये में तेल डालकर उसे प्रज्वलित करने से सही मायने में दिवाली नहीं मनाई जा सकती। हमें स्वयं वह प्रकाश बनना है और दूसरों को सही राह दिखानी है।
विज्ञापन
ऋषि पतंजलि ने कहा है- “मुर्द्ध ज्योति, सिद्ध दर्शन”। जब आप अपने भीतर के प्रकाश के प्रति जागृत हो जाएंगे, तभी पूर्णता प्राप्त होगी। जब भगवान राम घर वापस आए, तब लोगों ने उनका स्वागत अपने घरों में दीप जलाकर किया। इसका एक गहन अर्थ यह भी है कि जब स्व का ज्ञान प्रकाशित होता है, तब सब चमकने लगता है और सारी दुनिया उज्ज्वलित हो जाती है। जब बुद्धिमत्ता का प्रकाश हमारे जीवन को चमकाता है, तब हम सारे तनावों से ऊपर उठते हैं और ईर्ष्या, घृणा आदि नकारात्मक भावनाओं एवं प्रवृत्तियों से हमें मुक्ति मिलती है।
विज्ञापन
आज जब इतना तनाव, दबाव और संघर्ष है, हमें इसकी ज्यादा जरूरत है। हमें दुनिया में बुद्धिमत्ता, शांति और अपनेपन का अहसास लाना है। आइए, इस दिवाली ज्ञान के दीप जलाएं। खुश रहें, आनंदमय रहें और यह आनंद दूसरों के साथ भी बांटें। अपने सारे झगड़े, फसाद और मतभेद भुला दें। तब वास्तव में इस उत्सव की कुछ सार्थकता होगी।
ज्ञान से अज्ञानता का नाश
हम जिस कुबेरी संस्कृति के हिस्सा बनते जा रहे हैं, वहां तो अपना कुछ भी ऐसा नहीं दिखाई पड़ता, जिसे हम अपने अंतर में उतारकर मन की आंखों से देख सकें और अपना कह सकें। जिस दीपक को हम जलाते हैं, वह हमारे ज्ञान का भी तो प्रतीक है। ज्ञान से अज्ञानता का नाश होता है। ज्ञान को सत्य माना गया है, लेकिन केवल सत्य से ज्ञान पूर्ण नहीं बनता, बल्कि उसमें सौंदर्य और शुभत्व भी होना चाहिए। लक्ष्मी के साथ सरस्वती का वैर भले बताया जाता हो, लेकिन इस बात को कौन झुठला सकता है कि लक्ष्मी तभी फलदायी होती हैं, जब सरस्वती का फलभोग किया जाता है, यानी कि अर्थ का सदुपयोग बिना विद्या यानी ज्ञान के नहीं हो सकता। जिस जगह धन के साथ अविद्या यानी भ्रष्टाचार और कदाचार हावी रहते हैं, उस धन का नाश होने में कितना वक्त लगता है। इसलिए लाभ के साथ हमारी परंपरा में शुभ भी लिखा जाता है। पहले शुभ, फिर लाभ। ऐसा लाभ कभी फलदायी नहीं होता, जिसमें शुभता न हो। भारतीय दर्शन में इसका बहुत महत्व है। इसे हमें आज समझने की जरूरत है।
माटी के दीपक का भाव
दीपावली पर माटी के दीपक जलाने की परंपरा का भी अपना एक अलग भाव और व्यंजना है। हम इसे एक सही समझ के साथ जब सात्विक भाव और व्यंजना को आत्मसात कर लेते हैं, तब दीपावली का दीप महज एक दीप नहीं रह जाता, बल्कि एक आलोकित सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक बन जाता है। प्रकृति माता की गोद में दीप इठलाता है, लेकिन अपना छोटा-सा अवदान देकर इतराता नहीं। आलोक का मूल्यांकन दीप और सूर्य के अवदान से नहीं, बल्कि उसके संकल्प से करना चाहिए। रात भर प्रकृति माता से विनम्र भाव से दीप प्रार्थना करता रहा- मां, मैं बहुत छोटा दीप जरूर हूं, लेकिन मैं अंधकार को परास्त करने का व्रत लेकर आया हूं। मानव ने जब दीप का संकल्प सुना, उसे लज्जा आई। उसने तो अंधकार और गंदगियों को दूर करने का कभी व्रत लिया ही नहीं। आज वह स्वच्छता और प्रकाश को जीवन का हिस्सा बनाने का व्रत लेगा और अंधकार को परास्त करके रहेगा।
शुभ और लाभ का मर्म
दीपावली मानव सभ्यता, संस्कृति की निर्मात्री बनकर इन्सान को अंधेरे से रौशनी असत्य से सत्य और पुरातनता से चिर नवीनता के भाव-बोध की ओर ले चलने के लिए हमेशा प्रेरित करती आई है। दीपावली जिंदगी में शुभ और लाभ के अर्थ को भी समझाती है। इसलिए दीपावली अमर है और मानव सभ्यता, संस्कृति के साथ अमर रहेगी। यह सुहाना, सुखद, मिठाइयां बांटने और खुशियां बिखेरने का वक्त है। उमंग, उल्लास के वातावरण में अपने भीतर नूतन ऊर्जा का सृजन कर एक नए उत्साह के साथ आगे बढ़ें।