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बहुमुखी प्रतिभा के धनी 'मुरारीलाल माहेश्वरी'

Wed, 23 Sep 2026 12:43 PM IST
नितिन गौतम अशोक वैश्य, अमर उजाला, बरेली
अशोक वैश्य, अमर उजाला, बरेली Published by: नितिन गौतम Updated Wed, 23 Sep 2026 12:43 PM IST
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amar ujala founder murari lal maheshwari 100th birth anniversary
श्री मुरारीलाल माहेश्वरी - फोटो : अमर उजाला
स्वतंत्रता संग्राम के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ। आजादी के इस आंदोलन में भारतीय पत्रकारों ने भी अपनी लेखनी के माध्यम से देश की जनता को अंग्रेजी शासन के खिलाफ जागरूक किया। आजादी मिलने के साथ ही भारतीय पत्रकारिता ने नई करवट ली, परिणाम स्वरूप हिंदी पत्रकारिता का नया स्वरूप सामने आने लगा, जो विकासोन्मुख था।
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इसी क्रम में देश के दो महान पत्रकारों श्री डोरीलाल अग्रवाल एवं श्री मुरारीलाल माहेश्वरी ने मिलकर 18 अप्रैल, 1948 को आगरा से दैनिक 'अमर उजाला' का प्रकाशन प्रारंभ किया। तब ‘अमर उजाला’ के चार पेज के प्रथम अंक की 1200 प्रतियां बिकी थीं। शुरुआती दिनों में ‘अमर उजाला’ के पास बहुत सीमित साधन थे। अखबार भी किसी अन्य छापेखाने में छपता था। लेकिन दोनों मित्रों के अथक प्रयास और जीवटता के फलस्वरूप कुछ दिनों में ‘अमर उजाला’ की तीन हजार प्रतियां छपने लगीं। बढ़ती प्रसार संख्या के साथ ‘अमर उजाला’ आगरा समेत संपूर्ण ब्रज क्षेत्र और राजस्थान के भरतपुर, मुरैना आदि जिलों का प्रमुख समाचार पत्र बन गया। 
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आगरा में ‘अमर उजाला’ बड़ी तेजी से सफलता की सीढ़ियों पर चढ़कर समाज के हर वर्ग एवं क्षेत्र में सफलता के नए आयाम स्थापित कर रहा था। अत: विकास की इस गति को और अधिक गुंजायमान करने के लिए दोनों मित्रों ने बरेली से इसका प्रकाशन शुरू करने का निर्णय लिया। उस समय बरेली में कोई दैनिक अखबार प्रकाशित नहीं होता था। अत: 17 जनवरी, 1969 को बरेली से ‘अमर उजाला’ का प्रकाशन शुरू हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 16 जनवरी, 1969 को बरेली के राजकीय इंटर कॉलेज में जनसभा में दिया गया भाषण ‘अमर उजाला’ के प्रथम अंक की लीड खबर के रूप में प्रकाशित हुआ। तब चार पेज के अखबार का मूल्य दस पैसा था। अलबत्ता ‘अमर उजाला’ के प्रथम अंक में समाचारों एवं लेख आदि के प्रकाशन के कारण पृष्ठ संख्या अधिक थी।
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‘अमर उजाला’ के प्रथम अंक का पाठकों ने उत्साह से स्वागत किया। ‘अमर उजाला’ का बरेली संस्करण श्री मुरारीलाल माहेश्वरी के निर्देशन में पाठकों में तेजी से लोकप्रिय होने लगा। बरेली कमिश्नरी अर्थात रूहेलखंड के सभी नौ जिलों के साथ ‘अमर उजाला’ कुमाऊं के नैनीताल, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ का प्रमुख अखबार बन गया। रुहेलखंड तथा कुमाऊं के सभी जिलों एवं तहसील केंद्रों पर ‘अमर उजाला’ के ब्यूरो कार्यालय बनाए गए। परिणामस्वरूप ‘अमर उजाला’ की प्रसार संख्या तेजी से बढ़ने लगी और साथ ही क्षेत्र में सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक चेतना का नया संचार हुआ। ‘अमर उजाला’ बरेली का संपूर्ण कार्य श्री मुरारीलाल माहेश्वरी ही देखते थे। वे स्वयं 18-20 घंटे अनवरत काम करके ‘अमर उजाला’ संस्थान का संचालन एक परिवार की भांति करते थे। उनका सूत्र वाक्य था-‘आओ काम करें’। उनके पारिवारिक भाव से प्रेस का हर कर्मचारी प्रभावित होकर पूर्ण निष्ठा के साथ काम करता था।

 श्री मुरारीलाल माहेश्वरी जी अत्यंत भावुक, संवेदनशील एवं मृदुल स्वभाव के सरलचित्त व्यक्ति थे। सदैव उत्साह से भरपूर एवं स्नेहभाव से भरी मुस्कान उनके चेहरे पर दिखाई देती थी। गंभीर से गंभीर आपदा एवं प्रतिकूल परिस्थिति में भी वह अचल रहते थे। हिमालय की धूप की चमक की तरह उनके मुख पर सहज मुस्कान हर समय खेलती थी।

अखबारी दुनिया में माहेश्वरी जी ने अपने को कभी मालिक की तरह पेश नहीं किया। पत्रकारिता में वे अपने सभी कर्मियों के साथ बराबरी के रिश्ते के समर्थक थे। उन्हें अपने साथियों और पत्रकारों पर पूरा भरोसा था। जो भी व्यक्ति उनके संपर्क में आया, उनका कायल हो गया। उनकी नेतृत्व क्षमता अद्भुत थी। अपने साथ काम करने वाले कर्मचारियों को उन्होंने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे संस्थान के कर्मचारी हैं। उनकी राय एवं सुझावों का पूरा संज्ञान लिया। उनका असाधारण ज्ञान, समय की पकड़ और भविष्य का आकलन अद्भुत था। 

मां सरस्वती के चितेरे यशस्वी पत्रकार श्री मुरारीलाल माहेश्वरी का जन्म 23 सितंबर, 1926 को आगरा जिले की खेड़ा तहसील के ग्राम कुर्रा चितरपुर में हुआ था। आपके पिताश्री मेघराज माहेश्वरी एक सीधे, मेहनती और ईमानदार व्यापारी थे, जो सामान्य रूप से अपने तीनों पुत्रों श्री मिश्रीलाल माहेश्वरी, श्री रामकृष्ण माहेश्वरी और सबसे छोटे श्री मुरारीलाल माहेश्वरी तथा दो पुत्रियों के परिवार का पालन-पोषण करते थे। उस समय गांव में शिक्षा का कोई खास प्रबंध नहीं था। अत: पिता श्री मेघराज माहेश्वरी के निधन के बाद बड़े पुत्र श्री मिश्रीलाल माहेश्वरी ने 18 साल की आयु में घर-परिवार संभाला और अपने दोनों भाइयों श्री रामकृष्ण माहेश्वरी एवं श्री मुरारीलाल माहेश्वरी को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए आगरा भेज दिया। श्री रामकृष्ण माहेश्वरी एम.ए. करने के बाद आगरा की विजयनगर कॉलोनी में बस गए, जबकि श्री मुरारीलाल माहेश्वरी को आगे की शिक्षा के लिए पहले पिलानी (राजस्थान) भेजा गया। बाद में, उन्होंने बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा से एम.कॉम. की परीक्षा उच्च अंकों में उत्तीर्ण की।

एक स्वाभिमानी युवा होने के नाते आत्मनिर्भरता की दृष्टि से श्री मुरारीलाल माहेश्वरी जी अपनी पढ़ाई का खर्च स्वयं उठाने के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगे। बाद में आगरा की सेंट जॉन्स मिल में अंशकालिक रूप में कार्य करने लगे। अखबार पढ़ने की रुचि उनमें शुरू से थी। समसामयिक विषयों एवं देश-समाज के प्रति संवेदनशील होने के कारण पत्रकार भाव उनमें जागने लगा था। अत: आगरा से प्रकाशित होने वाला तत्कालीन प्रमुख अखबार ‘उजाला’, जिसे श्री गणपति चन्द्र केला निकाला करते थे, उन्होंने ज्वाइन कर लिया। ‘उजाला’ अखबार में काम करने के दौरान वे श्री डोरीलाल अग्रवाल के संपर्क में आए, जो इसी अखबार में काम करते थे। ‘उजाला’ अखबार में काम करते हुए ही उन्होंने एम.कॉम. की परीक्षा उच्च अंकों में उत्तीर्ण की।

समय के साथ श्री मुरारीलाल माहेश्वरी और श्री डोरीलाल अग्रवाल में गहरी मित्रता हो गई। ‘उजाला’ छोड़ने के बाद दोनों मित्रों ने नए विश्वास और संकल्प के साथ 18 अप्रैल, 1948 को आगरा से ‘अमर उजाला’ अखबार का प्रकाशन शुरू किया।

 दोनों मित्रों ने अथक परिश्रम से आगरा में ‘अमर उजाला’ काफी लोकप्रिय अखबार हो गया। डोरीलाल अग्रवाल आगरा में, तो श्री मुरारीलाल माहेश्वरी 1952 से मथुरा में ‘अमर उजाला’ का कार्यभार देखते थे। ‘अमर उजाला’ की बढ़ती लोकप्रियता और प्रसार संख्या को देखते हुए दोनों मित्रों ने ‘अमर उजाला’ का विस्तार करने के उद्देश्य से इसका प्रकाशन प्रदेश के अन्य जिलों से भी करने की योजना बनाई। परिणामस्वरूप 17 जनवरी, 1969 को बरेली से ‘अमर उजाला’ का प्रकाशन शुरू हुआ। शुरू में अखबार का मूल्य 10 पैसा तथा पृष्ठ संख्या चार रखी गई। लेकिन शनै: शनै: इसमें बढ़ोतरी होती गई। बरेली से प्रकाशित ‘अमर उजाला’ का संचालन श्री मुरारीलाल माहेश्वरी ही करते थे। उनके निर्देशन में ही अखबार का प्रकाशन होता था।

 उन्होंने अपनी कार्यप्रणाली से बरेली में कार्यरत सभी कर्मचारियों का दिल जीत लिया। उनकी अद्भुत कार्यक्षमता और अथक परिश्रम तथा 16-18 घंटे अनवरत काम करते देख सभी सहयोगी कर्मी उनसे प्रेरणा लेकर समर्पण भाव से काम करने लगे। उनकी मधुर मुस्कान देखकर सहकर्मी अपनी सारी थकावट भूल जाते थे। कर्मचारी उन्हें ‘अजात शत्रु’ की संज्ञा दिया करते थे। जबकि बाहरी लोग उनकी कार्यक्षमता और मैत्रीभाव के काफी कायल थे।

 1950 में अलीगढ़ के साधन संपन्न देवकी नन्दन गोदानी की पुत्री श्रीमती रामदुलारी जी से मुरारीलाल जी का विवाह हुआ। श्रीमती रामदुलारी साधन संपन्न परिवार से होते हुए भी हर सम और विषम परिस्थितियों में उनकी छाया की तरह सादगी-सरलता से रहीं। बरेली में अपार सफलता के बाद 12 दिसंबर, 1986 को ‘अमर उजाला’ का प्रकाशन मेरठ से प्रारंभ किया गया। मेरठ में ‘अमर उजाला’ का संचालन शुरू से ही उनके मझले पुत्र श्री अतुल माहेश्वरी देखते थे। अतुल जी बरेली में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत मेरठ में जाकर बस गए और अमर उजाला का सफल संचालन करने लगे। इस दौरान ‘अखबार’ ने काफी उन्नति और प्रगति की।

मेरठ में सफलता के बाद ‘अमर उजाला’ का प्रकाशन मुरादाबाद, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, झांसी, हल्द्वानी, देहरादून, चंडीगढ़, रोहतक, करनाल, जम्मू तथा धर्मशाला से भी होने लगा। आज दैनिक ‘अमर उजाला’ उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख महानगरों के साथ ही उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हरियाणा का सर्वाधिक प्रसार संख्या वाला समाचार पत्र हो गया है।

 दुर्भाग्य से 15 सितंबर, 1988 को आगरा में श्री डोरीलाल अग्रवाल का स्वर्गवास हो गया। उनके निधन के बाद श्री मुरारीलाल माहेश्वरी टूट से गए थे। एक दिन अचानक हृदयघात हो जाने के कारण उन्हें मथुरा से अति शीघ्र आगरा ले जाया गया। जहां 8 जनवरी, 1989 की रात्रि को एस.एन. मेडिकल कॉलेज आगरा में श्री माहेश्वरी का निधन हो गया। 9 जनवरी, 1989 को बरेली में उनकी अंत्येष्टि की गई। उनकी अंतिम यात्रा में बरेली का अपार जनसमूह उमड़ पड़ा। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी समेत अनेक मंत्रियों, विधायकों, राजनीतिक, सामाजिक तथा समाज के विविध क्षेत्रों में काम करने वाले गणमान्य व्यक्तियों ने उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

 उनके निधन से परिवार में शून्यता का भाव आ गया। लेकिन उनके पुत्रों श्री अतुल माहेश्वरी तथा श्री राजुल माहेश्वरी ने शीघ्र ही समस्त परिस्थितियों पर काबू पाकर ‘अमर उजाला’ के सफल संचालन में कोई व्यवधान नहीं आने दिया।


 श्री अतुल जी तथा श्री राजुल माहेश्वरी के सफल निर्देशन में ‘अमर उजाला’ का काफी विस्तार हुआ है। इसका प्रकाशन उत्तर प्रदेश के सभी महानगरों, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा जम्मू के प्रमुख नगरों से होने लगा है। ‘अमर उजाला’ अब देश का प्रमुख हिंदी समाचार पत्र हो गया है। श्री अतुल माहेश्वरी के आकस्मिक निधन के पश्चात ‘अमर उजाला’ के प्रकाशन की गुरुतर जिम्मेदारी श्री राजुल माहेश्वरी पर आ गई। वर्तमान में श्री राजुल माहेश्वरी  स्व. अतुल माहेश्वरी के पुत्र श्री तन्मय माहेश्वरी तथा अपने पुत्र श्री वरुण माहेश्वरी के साथ ‘अमर उजाला’ का सफल संचालन कर रहे हैं।
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