समाज और धार्मिक सौहार्द्र: आखिर कैसे स्थापित होगी सामाजिक समरसता और शांति?
भारत इन दिनों आपत्तियों और हिंसक प्रदर्शनों से जूझ रहा है। ये सब एक खबरिया चैनल के चर्चा कार्यक्रम से शुरू हुआ। ज्ञानवापी मंदिर मस्जिद प्रकरण में हो रहे बहस के बीच पैगम्बर मोहम्मद के बारे में एक उत्तेजनक बयान आया।
यह बयान कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेत्री नूपुर शर्मा द्वारा दिया गया था। जिसके बाद से चारों तरफ तूफान उमड़ पड़ा है। सांस्कृतिक थाती विरासतों को उनके मूल रूप में लौटाये जाने का मुद्दा कही पीछे छूट चुका है। अब चर्चा में न काशी और ना ही मथुरा है।
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भारत इन दिनों आपत्तियों और हिंसक प्रदर्शनों से जूझ रहा है। ये सब एक खबरिया चैनल के चर्चा कार्यक्रम से शुरू हुआ। ज्ञानवापी मंदिर मस्जिद प्रकरण में हो रहे बहस के बीच पैगम्बर मोहम्मद के बारे में एक उत्तेजनापूर्ण बयान आया। यह बयान कार्यक्रम के दौरान भाजपा नेत्री नूपुर शर्मा द्वारा दिया गया था। जिसके बाद से चारों तरफ तूफान उमड़ पड़ा है।
सांस्कृतिक थाती विरासतों को उनके मूल रूप में लौटाए जाने का मुद्दा कही पीछे छूट चुका है। अब चर्चा में न काशी और ना ही मथुरा है। कश्मीर मे आए दिन हो रही हिंदुओं की सुनियोजित हत्या भी फिलहाल चर्चा का मुद्दा नहीं रहा। नूपुर के बयान के बाद केवल विमर्श ही नहीं बदला है बल्कि मुस्लिम देशों से हमारे रिश्तों में भी तल्खी आई है।
सोशल मीडिया पर पूरे प्रकरण के ट्रेंड करने के बाद से इन मुल्कों में भारतीय उत्पादों का बहिष्कार और भारत एवं भारतीयों के प्रति दुर्भावना भी देखने को मिली है। ऐसे में भारत के सहयोग, आपसी व्यापार और कुशल भारतीय कामगारों के भरोसे चलने वाले मुल्क भी अब भारत पर सवाल खड़ा कर रहे है। इनमें भारतीय पर्यटक और पानी पर निर्भरता वाले मालदीव भी है।
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इधर, भारतीय खाद्य सामग्रियों के आवक और भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवा का लाभ लेने वाले मुल्क भी हैं। बाकियों को छोड़ दें तब भी अकसर प्रतिबंधों को झेलने वाले ईरान के साथ भारत सहयोग में खड़ा रहा है। मलेशिया से लेकर साउदी तक के हर मुस्लिम देश से भारत के व्यावसायिक रिश्ते रहे हैं। इंडोनेशिया से सांस्कृतिक तो मिस्र और तुर्किया से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का वर्षों पुराना नाता रहा है। जबकि बांग्लादेश का अस्तित्व अस्मिता ही भारत के दम पर है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश और धार्मिक स्वतंत्रता
ये सभी देश जानते हैं की भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सभी को अपने विचार रखने और अपनी आस्था के अनुसार उपासना की पूरी छूट है। इसके बावजूद इस बयान के बहाने ये मुल्क भी भारत पर आक्रामक हैं। जबकि चीन से लेकर रूस तक मुस्लिम उत्पीड़न की खबरें अक्सर आती रहती हैं। चेचन्या और सिक्यांग में तो शासन द्वारा दमन एवं नरसंहार होते रहते हैं। इसके बावजूद मुसलमानों के रहनुमा खामोश रहते हैं।
दरअसल, नागरिक अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में इस्लामिक मुल्कों का अतीत संदेह के घेरे में रहा है। ये सोच एवं व्यवहार के स्तर पर साम्यवादी चीन के समान है। अपने विचारों के अलावा किसी भी और धार्मिक सांस्कृतिक गतिविधि की इजाजत नहीं देते हैं।
दुबई और अबू धाबी जैसे अरेबियन नगर महज अपवाद हैं। जहां व्यापारिक उद्देश्यों के नाते बहुसांस्कृतिक गतिविधियों की सीमित छूट दी गई है। वैसे इस पूरे प्रकरण के कई पक्ष और आयाम हैं। ये विश्वव्यापी विरोध और हिंसक प्रदर्शन कतई स्वाभाविक नहीं है। इसे महज पाकिस्तान द्वारा रचा और मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी के बयानों से भड़काया बता खारिज नहीं किया जा सकता है। वास्तव में इसके पीछे के मानस को समझने बुझने की भी जरूरत है। अगर इसका विचार करें तो निश्चित रूप से इसके पीछे मुस्लिम संगठनों का बड़ा हाथ है।
पहले इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डालकर प्रचारित किया गया। फिर कतर, कुवैत और ईरान की आपत्तियों को आधार बना कर लोगों को विरोध के लिए उकसाया गया। जहां बड़े मुस्लिम उलेमाओं ने इसके लिए माहौल बनाया। वहीं मौलवियों ने स्थानीय मस्जिद मदरसों के माध्यम से इसे हिंसक प्रदर्शनों मे बदल दिया, जिसकी परिणिति सर धर से कलम जैसे नारे हैं। आखिर एक लोकतांत्रिक देश में किसी समुदाय को लोगों की जान लेने का अधिकार कैसे है?
दरअसल, ये कोई पहली घटना नहीं है। संविधान और व्यवस्थाओं को धता बताते हुए पहले भी डर का देशव्यापी माहौल खड़ा किया गया है। नागरिकता कानून से जुड़े एनआरसी और सीएए के मसले पर ऐसा हो चुका है। किंतु इनके ऊपर कोई सवाल ना उठाये अन्यथा ये हत्या फतवों से लेकर सामूहिक संहार तक कुछ भी कर सकते हैं।
क्या देश में है एक कानून की जरूरत?
दरअसल, देश को एक सशक्त राष्ट्रीय कानून की जरूरत है। इस दिशा में केंद्र सरकार को झिझक तोड़ सबके विकास से पूर्व राष्ट्रीय अखंडता की सोचनी चाहिए।अन्यथा आज नूपुर की फांसी की मांग वाले कल किसी के लिए जेल और सरे राह फांसी की भी मांग उठा और गुंजाइश बना सकते हैं। मुस्लिम विरोधी बयान गुजरात दंगे और धारा 370 हटाए जाने के नाते ये सरकार के शीर्षस्थ नेतृत्व से लेकर संघ भाजपा नेताओं की भी हत्याओं का फतवा जारी कर सकते हैं। हालिया इस घटना के बाद कट्टरपंथियों और आतंकी संगठनों की ओर से ढेरों चेतावनी संदेश भी आए हैं।
अन्यथा हिंसक प्रदर्शन और किसी अप्रिय घटना की प्रतिक्रिया गुजरात दंगों जैसे दुखांत घटना में बदल सकती है। वहीं ऐसी हर प्रतिक्रिया देश के अमन शांति विकास और वैश्विक पहचान के लिए बुरा होगा। ऐसे में मुस्लिम समाज को अमन की पहल और सरकारों को भी दोषियों पर सख्ती बरतनी चाहिए। क्योंकि कई प्रादेशिक सरकार ने इसपे नरम रुख अपना रखा है।
वैसे इस घटना क्रम को लेकर केंद्रीय विदेश एवं गृह मंत्रालय के सक्रियता की भी समीक्षा हो। आखिर महज एक बयान को लेकर हमारे राजदूतों को तलब करना और सार्वजनिक रूप से भारत सरकार द्वारा माफी जैसी मांग भला कोई देश कैसे कर सकता है! इन सबके बीच जब बयानों को लेकर माहौल बिगड़ा तो गृह मंत्रालय क्या कर रहा था?
जबकि इससे सप्ताह दिन पूर्व ही ज्ञानवापी प्रकरण को लेकर पीएफआई जैसे संदिग्ध संगठनों ने देश व्यापी प्रदर्शन किए। जिसमें हिंदू और ईसाइयों के खिलाफ उत्तेजनक नारे लगाए गए। वहीं इसी समय मुस्लिम जमीयत के मुस्लिम उलेमाओं सम्मेलन मे हिंदुओं के देश छोड़ने के बारे में कहा गया। जमीयत के एक गुट के अध्यक्ष मिया मदनी ने कहा जिन्हें हमसे दिक्कत वो मुल्क छोड़ कर जा सकते हैं।
वैसे अब राहत भरी खबर भी आ रही है। कुवैत ने प्रदर्शनकारी गैर नागरिकों को मुल्क निकाला दिया है। वहीं भारत में जमीयते उलेमा के एक धरे ने मौलाना काजमी के नेतृत्व में आगे आकर इसके लिए मुस्लिम संगठन एवं मजहबी नेताओं को दोषी बताया है। इसके बीच संघ एवं भाजपा के नेताओं के बिगड़े बोल पर भी रोकथाम की जरूरत है। प्रचार माध्यमों से कोसों दूर रह गतिविधियों का संचालन वाला संघ अब व्यक्तिगत प्रचार वाला हो चला है। वहीं वैचारिक राजनीति वाली भाजपा संघर्षों की जगह बयानों एवं बोल पर आश्रित है।
ऐसे में संघ जहां अब संस्कृति की जगह डीएनए का बात कर रहा है। वही वे मुस्लिमों मे पैठ बना नई छवि की जुगत में भी है। बात भाजपा की करे तो यहां सफलता के सूत्र अटपटे और उत्तेजनक बोल हैं। जिसकी बानगी गिरिराज सिंह और साक्षी महाराज के वक्तव्य हैं। इस नाते हर कोई बग्गा सा ट्वीट और गिरिराज सा बयान दे सफलता प्राप्त करना चाहता है, जिसके नाते संघर्ष आंदोलन और जमीनी काम वाले संघ भाजपा मे अब विमर्श निष्कर्ष तक नही पहुंच पा रहे हैं।
आरक्षण को लेकर पुनर्विचार, एससी एसटी एक्ट, नागरिकता और कृषि सुधार कानून ऐसे तमाम मुद्दों पर ऐसा हो चुका है। भारतीय धर्म संस्कृति और मूल्यों के संरक्षनार्थ अखिल भारतीय कानून से देश अब भी वंचित है।
इसको लेकर कोई शासकीय पहल नहीं है। देशव्यापी संपर्क कार्यकर्ताओं की फौज के बावजूद इन विमर्शों को स्थापित करने और बढ़ाने में ये असमंज में दिख रहे हैं।
ऐसे में समस्याओं के फौरी हल की जगह ठोस निर्णय लेने की आवश्यकता है।
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