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पर्दे के पीछे का नटसम्राट: वो नाना जिसे कैमरा कभी पकड़ नहीं पाया

Thu, 08 Oct 2026 03:56 PM IST
पंकज क्षीरसागर फीचर डेस्क, अमर उजाला
फीचर डेस्क, अमर उजाला Published by: पंकज क्षीरसागर Updated Thu, 08 Oct 2026 03:56 PM IST
सार

मुंबई में सफलता का पैमाना बंगले की लोकेशन और स्क्वायर फीट से नापा जाता है। उसी शहर में एक आदमी पिछले 40 साल से माहिम की एक पुरानी बिल्डिंग के 1BHK फ्लैट में रहता था। न नया फर्नीचर, न कोई शो-शा। वही पुरानी लकड़ी की अलमारी, वही एक पलंग। उससे बूढ़ा उसका फर्नीचर।

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Nana Patekar passes away The Nana Patekar whom the camera could never quite capture
वो नाना जिसे कैमरा कभी पकड़ नहीं पाया - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पर्दे पर वो आग है। एक ऐसी आवाज जो पर्दा फाड़ देती है। लेकिन पर्दा गिरने के बाद जो आदमी कुर्सी पर अकेला बैठा रह जाता है, वो आग नहीं, राख जैसा ठंडा और मिट्टी जैसा नरम है। नाना पाटेकर को समझना है तो उसकी फिल्में मत देखिए, उसका घर देखिए। माहिम की उस पहली मंजिल में एक सुपरस्टार नहीं, एक किसान मजदूर आम आदमी रहता था।

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मुंबई में सफलता का पैमाना बंगले की लोकेशन और स्क्वायर फीट से नापा जाता है। उसी शहर में एक आदमी पिछले 40 साल से माहिम की एक पुरानी बिल्डिंग के 1BHK फ्लैट में रहता था। न नया फर्नीचर, न कोई शो-शा। वही पुरानी लकड़ी की अलमारी, वही एक पलंग। उससे बूढ़ा उसका फर्नीचर। लोग पूछते हैं- क्यों? वो हंसकर कहता- ऊंची इमारतों में मुझे नींद नहीं आती। मुझे मिट्टी की सोंध आनी चाहिए।
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ये कोई सादगी का विज्ञापन नहीं था। ये गरीबी की कोख से आया हुआ संस्कार था। बचपन में जिसने एक वक्त की रोटी के लिए संघर्ष देखा हो, वो करोड़ों में भी रोटी की कीमत नहीं भूला। वो अपने कपड़े खुद धोता। घर में कोई मेहमान आ जाए तो वो ऑर्डर नहीं करता, खुद किचन में जाता था। प्याज काटता, तड़का लगाता, क्योंकि उसका मानना है जिसे तुम अपने हाथ से खिलाते हो, वो तुम्हारा अपना हो जाता है।
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उसके घर का गणपति, उत्सव नहीं, घर वापसी है। पिछले चार दशक से उसके घर बप्पा विराजते रहे हैं। ये कोई फिल्मी गणपति नहीं है, जहां एक दिन के लिए मूर्ति लाई और विसर्जन के लिए भीड़ बुलाई जाए। गणेशोत्सव के 10 दिन नाना कहीं नहीं जाते थे। चाहे दुनिया के किसी भी कोने में शूटिंग हो, वो ये तारीखें खाली रखते रहे। वो खुद मंडी जाकर फूल लाते। खुद बैठकर माला पिरोते। खुद पंडाल की लाइट लगाते और खुद ही 50 लोगों का महाप्रसाद बनाते। पसीने में तरबतर।

और उनके दरवाजे पर कोई बाउंसर कभी नहीं होता था। उनके घर की सबसे खूबसूरत तस्वीर यही है- सुबह कोई बड़ा प्रोड्यूसर फर्श पर बैठा मोदक खा रहा है और शाम को विदर्भ से आया एक किसान, जिसकी आंखों में कर्ज का डर है, उसी फर्श पर बैठा बप्पा को देख रहा है। नाना दोनों को उसी थाली में प्रसाद देते। क्योंकि उसके लिए बप्पा के सामने या पीठ पीछे कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब भूखे हैं। नाना जिसने वर्दी को पहना नहीं, जिया है! नाना का सेना प्रेम डायलॉग नहीं है। वो एक जख्म है।
 

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Nana Patekar passes away The Nana Patekar whom the camera could never quite capture
वो नाना जिसे कैमरा कभी पकड़ नहीं पाया - फोटो : Amar Ujala

1990 में फिल्म प्रहार के लिए नाना ने पुणे में मराठा लाइट इन्फैंट्री में असली मिलिट्री ट्रेनिंग ली। सुबह 4 बजे उठकर राइफल के साथ दौड़ना, ऑब्सटेकल कोर्स कम्प्लीट करना। कीचड़ में रेंगना। जवानों के साथ परेड करना। खूब मेहनत करना। तब यूनिट के अफसर ने कहा- नाना, इतना मत करो, फिल्म के लिए इतना काफी नहीं है। उसने जवाब दिया मैं फिल्म के लिए नहीं, उस 19 साल के लड़के को समझने के लिए कर रहा हूं, जो मेरी जगह बॉर्डर पर खड़ा है।

और फिर 1999, कारगिल। जब गोलियां चल रही थीं, तब वो बिना किसी अखबार को बताए, बिना कैमरे के, सीधे बटालिक पहुंच गए। 15 दिन तक बंकर में रहकर जवानों के साथ मातृभूमि की रक्षा में तैनात हो गए। जवानों ने कहा सर, आप यहां क्यों आए, यहां खतरा है। तब नाना ने कहा बेटा, खतरा है तभी तो आना था। नहीं तो ये वर्दी पहनने का हक कैसे बनता। सेना ने उन्हें सम्मान में टेरिटोरियल आर्मी में मानद कैप्टन बनाया। वो रैंक नाना को किसी स्टेज पर नहीं, एक बैरक में दी गई थी। नाना की राइफल, जो निशाना भी लगाती है और आंसू भी पोंछती है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि नाना एक नेशनल लेवल का शार्प शूटर रहे हैं। जीवी मावलंकर शूटिंग चैम्पियनशिप में मेडलिस्ट। निशाना इतना सटीक इसलिए है, क्योंकि उसका मन शांत है और यही शांत मन जब 2015 में महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं देखकर अशांत हो गया, तो उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन शुरू किया। ये दान नहीं था, ये प्रायश्चित था।

वो खुद विदर्भ और मराठवाड़ा के उन घरों में गए, जहां अभी-अभी मातम बिछा था। उसने चेक नहीं थमाया, विधवा महिलाओं के हाथ में सिलाई मशीन थमाई और कहा रोना बंद करो, चलाना सीखो। उसने जेसीबी नहीं बुलाई, गांव वालों के साथ खुद फावड़ा लेकर नदी-नाले खोदे। ताकि अगली बार बारिश का पानी बह कर अरब सागर में न जाए, गांव के खेत में रहे। आज मराठवाड़ा के 500 से ज्यादा गांवों में जो पानी है, उस पानी में नाना का पसीना मिला हुआ है। आखिर में नाना पाटेकर महान अभिनेता इसलिए नहीं है कि वो अच्छा अभिनय करते रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों सहित अन्य पुरस्कारों से नवाजे गए हैं।

वो महान इसलिए हैं, क्योंकि इस चकाचौंध की दुनिया में भी वो अपनी मिट्टी से बेवफाई नहीं कर पाए। अंतिम समय तक वो एक सादे कुर्ते में, हाथ में राइफल, दिल में बप्पा और जेब में किसी किसान की चिट्ठी लिए जीते रहें। मुंबई के माहिम का 1BHK हम सबको याद दिलाता है- स्टार बनना आसान है, आदमी बने रहना सबसे मुश्किल अभिनय है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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