...और पर्दा गिर गया..! नटसम्राट अप्पासाहेब बेलवलकर चला गया..!
नाना इंडस्ट्री की चकाचौंध के बीच सादगी, सरलता और सहजता में मानवीय गुणों तथा अपनी ग्रामीण, देशज संस्कृति का दीपक रहे। रील से बाहर रियल लाइफ की एक दुनिया उनकी अपनी थी, जिसके न जाने कितने, किस तरह के अनगिनत किस्से उनके चाहने वालों के दिलों में रहे होंगे।
विस्तार
विज्ञापनअभिनय अपने स्वभाव में अभिव्यक्त है और अभिनेता लोक में. पर्दे का सितारा जब जमी पर होता है, तो आसमान में उसकी जगह सबसे चमकदार होती है-
नाना नहीं रहे।
रंगमंच के अप्पासाहेब बेलवलकर की विदाई ने रुपहले पर्दे पर अभिनय के रंगों को फीका कर दिया। नटसम्राट अपने अंतिम दृश्य में केवल एक ही दृश्य छोड़ गया।
विलाप और शोक में डूबा हुआ विदा दृश्य..!
आज की सुबह आंखें खोलते-खोलते पूरे दिन को इतना अनमना और उदास बना देगी, सोचा नहीं था। नाना के जाने की खबर का वह नोटिफिकेशन केवल सूचनाभर नहीं था, बल्कि हिंदी और मराठी सिनेमा के मेरे जैसे कई चाहने वालों के बीच एक ऐसी शोक लहर की तरह था, जो क्षणभर में स्तब्ध कर गई।विज्ञापन
यकीन ही नहीं हुआ कि नाना पाटेकर नहीं रहे। लोक, अंचल और देशज दीन-दुनिया का सितारा अपनी ही रोशनी में समा गया। अपने लोगों के बीच, अपनों के लिए जमीन पर लड़ने वाला आपला मानुस नहीं रहा।विज्ञापन विज्ञापन
फिल्मी दुनिया में नाना बतौर अभिनेता मेरे लिए निजी स्मृति का सबसे कोमल और सुनहरा हिस्सा रहे। मुंबई में लंबा समय गुजारने और कई सितारों से मेल-मुलाकात के बीच उनकी याद सबसे ज्यादा चमकती दमकती रही। स्क्रीन पर उन्हें देखना,उनका अंदाजा और खाटी देशज शैली ने हमेशा कस्बाई और आंचलिक जीवन को आकर्षित किया और प्रभवित भी।
मेरी स्मृतियों में नाना की कई फिल्में घर की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का हिस्सा रहीं। प्रहार, क्रांतिवीर, तिरंगा और बाद में तो फिर मराठी फिल्मों की एक लंबी श्रृंखला जुड़ती चली गई। जैसे-जैसे नाना अपने अभिनय के रंगों में अलहदा होते रहे वैसे-वैसे वे मेरे भीतर एक खास जगह बनाते चले। एक कमाल का अभिनेता जिसे एक फिल्म फेस्टिवल में नटसम्राट के अप्पा साहेब के रूप में देखता रहा और आंखों से आंसु झरते रहे।
जीवन में मेल-मुलाकातों के संजोग में में वे कुल जमा तीन बार मिले। अपनी इन मुलाकातों और संक्षिप्त, लेकिन हास्य से लिपटे उनके अपनेपन भरे संबोधन ने इस अभिनेता से जीवनभर का एक जुड़ाव जोड़ दिया। इंदौर में उनसे पहली मुलाकात साल 2005 में हुई थी। वह एक तरह से मेरा पहला इंटरव्यू था, जो कॉलेज की एक मैग्जीन के लिए था। नाना उस समय नेशनल लेवल के शूटिंग कॉम्पिटिशन का हिस्सा थे। जब उनसे मिलने पहुंचा तो हंसकर बोले-काय रे...!
और यह काय रे और वह मुस्कान आज तक भीतर बनी हुई है.
दूसरी मुलाकात गणपति के ही दिनों में मुंबई में माहिम स्थित उनके घर पर 2007 में हुई थी। उन दिनों दैनिक भास्कर से कुछ ही दूरी पर उनका घर था। ठेठ देसी मराठी अंदाज किसान वाली टोपी, कुर्ता-पायजामा, बंडी और माथे पर तिलक। यह अंदाज देखते ही बनता था। मुस्कुराकर मुझे दी गई आरती और प्रसाद ने उनके व्यक्तित्व को देखकर अचरज में डाल दिया था। बाद में फिल्मों के प्रीमियर के बीच हंसते-मुस्कुराते, लेकिन अपने स्वाभाविक अक्खड़ स्वभाव में जी रहे नाना अपनी रंगत दिखाते, टकराते रहे।
फिल्मों का यह अभिनेता लोगों के अपने मानुस होने के किरदार में जगह बनाता रहा और चुपचाप इतना बड़ा होता चला गया और उनकी उपस्थिति की छाया हर दिल में एक खास जगह बनाती चली गई।
इधर जब वे 2015 में मिले तो कुछ अलग थे। इतने कि अंदाजा नहीं था कि इस प्रिय अभिनेता का आभा-मंडल इतना विस्तार पा रहा था। साल 2015 में जब महाराष्ट्र में आत्महत्या कर रहे किसानों की हालत से विचलित होकर वे अपनी कमाई से 15 हजार रुपये तक के चेक किसानों को बांट रहे थे, उस समय एक टीवी पत्रकार ने उनसे पूछा था कि इस मामले में आप राजनीतिज्ञों और नेताओं से क्या कहना चाहेंगे?
नाना ने ठेठ उसी खांटी अंदाज में जवाब दिया था।
वो उनका काम कर रहे हैं, मैं मेरा काम कर रहा हूं।
इतना बोलकर नाना चुप हो गए।
नाना इंडस्ट्री की चकाचौंध के बीच सादगी, सरलता और सहजता में मानवीय गुणों तथा अपनी ग्रामीण, देशज संस्कृति का दीपक रहे। रील से बाहर रियल लाइफ की एक दुनिया उनकी अपनी थी, जिसके न जाने कितने, किस तरह के अनगिनत किस्से उनके चाहने वालों के दिलों में रहे होंगे। फोटाग्राफर हो, मीडियाकर्मी हो या सेट पर काम करने वाले हर किसी से उनका जुड़ाव बेहद आत्मीय था लेकिन वे सरलमना होकर मिलते रहे। हां अपने टेम्परामेंट, गुस्से और मुंहफट होने के बीच वे यदा-कदा अलग दिखते रहे लेकिन नाना के भीतर धड़कता एक देसी, खांटी मराठी संस्कृति में डूबा आदमी हमेशा इसे देश की जड़ों को छूता रहा।
फिलहाल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इस नटसम्राट नाना पाटेकर उर्फ गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर को विदा. एक अभिनेता रुपहले पर्दे की दुनिया को अंतिम प्रणाम कहकर गुजर गया.एक किरदार अभिनय से छूटा
और
एक किरदार संसार से..!
जब-जब स्क्रीन पर नजर आओगे बहुत याद आओगे नाना..!
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