क्या नागरिकता संशोधन कानून पर भ्रम को रोकने में नाकाम रही सरकार?
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यह स्थापित तथ्य है कि बीते 70 सालों में पाकिस्तान और 48 साल से बांग्लादेश में गैर मुसलमानों खासकर हिंदुओ, सिखों, ईसाइयों अपार उत्पीड़न हुआ है, जबकि इसके उलट भारत में अल्पसंख्यको के हालात बहुत बेहतर हैं।
दरअसल, देश की सियासत ने अल्पसंख्यकों वोट बैंक की खातिर लंबे समय तक इस्तेमाल होता रहा। वे गरीबी, अशिक्षा और बुनियादी परेशानियों से जूझते रहे लेकिन धीरे-धीरे हाशिए पर भी चले गए। इस मामले में संसद में जो नेता मौन रहते। हार जाते। वे बाहर भाषणों में लोगों से सड़कों पर निकलने का आव्हान करते दिख रहे हैं।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान ही सही रास्ता
देश की संपत्ति नष्ट करते पत्थर और पेट्रोल बम फेंकने वालों का छात्रो की आड़ में समर्थन प्रकारांतर से हताश जमात का देशद्रोह है। सरकार इसका अंदाजा लगाने में विफल रही। यह स्वतः स्फूर्त और देशहित का मुजाहरा कतई नहीं है।
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर उठने वाले सवालाें को सख्त लहजे मेंं यह कहते हुए बरज दिया है कि जब हिंसा की जा रही हो तो पुलिस को कार्रवाई से कैसे रोका जा सकता है? दूसरी तरफ नागरिक संशोधन कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं मंजूर कर केंद्र सरकार से जबाव तलब कर कोर्ट ने यह भी जता दिया है कि सरकार या संसद का कोई भी फैसला संवैधानिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हो सकता। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती है।
लेकिन बीते एक हफ्ते से पूरे देश में जो हुआ और जिस तरह एक समुदाय विशेष के बीच यह धारणा प्रबल कर दी गई कि शरणार्थी को शरण देकर उसे नागरिकता देने के कानून में संशोधन समुदाय विशेष की नागरिकता खत्म करने का कदम है।
हमने बीते दो दिनों मेंं उग्र प्रदर्शन मेंं शामिल कई कम उम्र बच्चों को यह कहते सुना है कि हमें देश से भगाया जा रहा है? यह भ्रम और इसके आधार पर कौन देश को अराजक माहौल की तरफ ढकेल रहा है? यह न केवल देश के सियासी वर्ग की बल्कि हर जागरूक नागरिक की चिंता का विषय होना चाहिए।
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद के दोनों सदन में जिस तरह हर सवाल का जबाव दिया और बार-बार यह स्पष्ट किया कि नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी अलग-अलग चीजें हैं, इसके बावजूद एक समुदाय विशेष में यह धारणा क्यों बलवती हो पाई कि मामला एनआरसी का ही है और उनकी नागरिकता खतरे में है या एक समुदाय विशेष का होने के कारण उन्हें परेशान किया जा रहा है?
जाहिर है सरकार ने संसद में विधेयक को पारित कराने और उसे कानून बनाने की तैयारी तो पूरी की थी और उसमें वह सफल भी रही लेकिन उसका बाहर क्या असर होगा? विरोधी उसका कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं और उपद्रवी तत्व उसके खिलाफ क्या तैयारी कर रहे हैं, इसका आकलन करने में सरकार पूरी तरह विफल रही।
सरकार की तैयारी में कमी
दरअसल, जैसी तैयारी उसने धारा 370 हटाने और तीन तलाक कानून पास होने और अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले की थी, वैसी तैयारी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर नहीं की थी, यह साबित हो गया है। अगर तैयारी की होती तो जामिया मिलिया से लेकर सुदूर केरल तक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नही हुए होते।
कानून बन चुके विधेयक के विरोधी जिस पुरजोर तरीके से न केवल सरकार पर हमलावर हैं बल्कि विपक्ष को एक नई एकजुटता का जो अवसर मिल गया है, उसमें पूरी तरह सरकार खुफिया एजेंसियों और एक दल के तौर पर भारतीय जनता पार्टी के जमीनी नेटवर्क की असफलता ही कही जाएगी, वे उसका अंदाजा ही नहीं लगा सके।
भाजपा और समूचे संघ परिवार ने अब जाकर इस कानून के पक्ष में अभियान चलाना शुरू किया है, जब सब तरफ विरोध हो रहा है। इसमें भी भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं को नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी का फर्क ठीक से पता नहीं है। वे अधिनियम बन जाने के बाद भी मैं सीएबी और एनआरसी के समर्थन में कैंपेन चला रहा हैं।
अब भी सीएए और एनआरसी को भाजपा तक अलग-अलग नहीं देख पा रही है। ऐसे में किसी भ्रमित किए गए समुदाय से दाेनों कों अलग-अलग देखने की मांग करना कैसे जायज हो सकता है? जरूरी है कि सरकार और उसका तंत्र सुप्रीम कोर्ट मेंं जवाब देने के अलावा जनता के बीच नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बारे में बहुत ही स्पष्टता से समझाए और दाेनों का फर्क समझाए और एनआरसी को लेकर भी जारी भ्रम को स्पष्ट करे।
अन्यथा लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में देश की संपत्ति को नष्ट करने और भाईचारे के तानेबाने को नष्ट करने में अपनी सियासत चमकाने की कोशिश कर रहे लोग सफल हो सकते हैँं, वे सफल हुए तो देश को भारी नुकसान होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।