महाराष्ट्र का चुनावी हालः भाजपा-कांग्रेस की जंग में क्यों दांव पर है राज ठाकरे की साख?
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क्या आपने किसी चुनाव में किसी ऐसे नेता की प्रतिष्ठा दांव पर लगी देखी है, जो न तो ख़ुद ही चुनाव मैदान में उतरा हो और न ही अपने दल के किसी नेता को चुनावी प्रक्रिया में शिरकत करने दिया हो? लेकिन महाराष्ट्र में इस बार लोकसभा चुनाव में ऐसा ही हुआ है। यहां चुनाव में उस नेता की प्रतिष्ठा दांव पर लगी, जिसने तीन साल पहले ही कह दिया था कि उसका दल 2019 के लोकसभा चुनाव मैदान में नहीं उतरेगा। यहां बात हो रही है उत्तर भारतीय विरोधी इमेज रखने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे की, जिनकी प्रतिष्ठा का फ़ैसला आगामी 23 मई को होगा।
क्या होगा राज ठाकरे के साथ? क्यों प्रतिष्ठा है दांव पर?
अगर भारतीय जनता पार्टी को राज्य में सफलता मिलती है और 23 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूसरा कार्यकाल मिलता है तो राज ठाकरे का मोदी हटाओ मिशन अधूरा रह जाएगा। इसका यह भी मतलब होगा कि राज ठाकरे नेता कम शोमैन ज़्यादा हैं, जिनकी सभाओं में जुटने वाली भारी भीड़ सिर्फ मनोरंजन करने के लिए आती थी और मराठी मानुस एमएनएस प्रमुख की बात को बहुत सीरियसली नहीं लेती थी। इसे राज की भविष्य की राजनीति के लिए शुभ संकेत तो नहीं कहा जाएगा।
गौरतलब है कि इस बार लोकसभा चुनाव से दूर रहने वाले राज ठाकरे पेशेवराना अंदाज़ अपनाते हुए एकदम कॉरपोरेट शैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला कर रहे थे। अपनी हर सभा में वह नरेंद्र मोदी का पहले पुराना वीडियो सामने बैठी जनता को दिखाते थे, उसके बाद मोदी का कोई ताजा वीडियो प्ले करते थे। राज ठाकरे यह साबित करने की कोशिश करते थे कि नरेंद्र मोदी बहुत झूठ बोलते हैं और दोबारा अवसर पाने लायक़ नहीं हैं।
क्या खास रहा राज ठाकरे की प्रचार शैली में?
राज ठाकरे की प्रचार शैली से भाजपा खेमे में बहुत अधिक बेचैनी देखी जाती थी। चुनाव प्रचार के दौरान 26 दिन में पूरे राज्य में क़रीब 80 सभाओं को संबोधित करने वाले मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस राज ठाकरे के प्रचार को ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ करार देकर खारिज करते रहे। हालांकि इसके बावजूद राज ठाकरे मोदी को निशाना बनाकर धुआंधार चुनावी रैली करते रहे।
राज ठाकरे को रोकने के लिए शिक्षा मंत्री विनोद तावडे़ और मुंबई भाजपा अध्यक्ष आशीष शेलार ने राज ठाकरे के बारे में सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा करने का ऐलान किया, लेकिन ये दोनों भाजपा नेता भी राज को रोकने में सफल नहीं हुए।
बहरहाल, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। महाराष्ट्र में 4 चरणों में ही मतदान पूरा हो गया। जनता ने अपना फैसला ईवीएम का बटन दबाकर सुना दिया है। अब सबकी निग़ाह 23 मई की ओर है, जब वोटों की गिनती के बाद हार-जीत का फ़ैसला होगा। राज्य में इस बार चार चरणों में औसतन 61.40 फीसदी मतदान हुआ। चुनाव के बाद नतीजों पर लोग अपने अपने ढंग से कयास लगा रहे हैं। कई राजनैतिक पर्यवेक्षक सबसे चर्चित मुंबई उत्तर की सीट, जहां भाजपा के गोपाल शेट्टी का मुकाबला ‘रंगीला गर्ल’उर्मिला मातोंडकर से था, पर अप्रत्याशित नतीजे की उम्मीद कर रहे हैं।
क्या है भाजपा और कांग्रेस का हाल?
मतदान के बाद भारतीय जनता पार्टी खेमे का कहना है कि राज्य में अंडरकरंट मोदी वेव है, जिसके चलते भाजपा राज्य में इस बार भी 2014 के लोकसभा चुनाव की पुनरावृत्ति कर सकती है। पार्टी के आला नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी की जीत का आंकड़ा इस बार 40 को भी पार कर जाएगा। दूसरी ओर पिछले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने वाली कांग्रेस का मानना है कि इस बार पार्टी कम से कम 24 सीटों पर विजय दर्ज करेगी।
मीडिया में भी किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं, इसे लेकर इस बार सही आंकलन नहीं हो पा रहा है। महाराष्ट्र कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत का कहना है कि इस बार उनके गठबंधन को 24 से 28 सीट मिलेगी। वे कहते हैं कि इस बार कांग्रेस ने पेशेवर ढंग से चुनाव का संचालन किया है, जिसका लाभ मिलेगा।
क्या कहते हैं पत्रकार और राजनीतिक पंडित?
राज्य की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सचिन परब का मानना है कि राज्य में भाजपा 32 से 34 सीट पर जीत दर्ज कर सकती है। परब का कहना है कि मुंबई उत्तर की सीट भाजपा सांसद गोपाल शेट्टी के लिए एकदम सेफ मानी जाती थी पर उर्मिला मातोंडकर ने चुनाव मैदान में कूदकर शेट्टी को बेचैन तो कर ही दिया। यहां तक कि उत्तर मुंबई में पिछली बार शेट्टी के प्रतिद्वंद्वी रहे कांग्रेस के संजय निरुपम की भी उनके सामने चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं पड़ी। लिहाज़ा, निरुपम ने मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़कर मुंबई उत्तर पश्चिम में कांग्रेस का टिकट हासिल किया।
किसी कांग्रेस नेता के चुनाव न लड़ने की स्थिति में उत्तर मुंबई से कांग्रेस ने गोपाल शेट्टी के सामने मराठी, हिंदी, उर्दू, गुजराती और अंग्रेजी फर्राटे से बोलने वाली उर्मिला मातोंडकर को चुनाव मैदान में उतारा। ‘रंगीला गर्ल’ने ‘तुमची मुलगी’और ‘मराठी मुलगी’का ऐसा अभियान चलाया कि गोपाल शेट्टी खेमे में बेचैनी होने लगी।
यहां की मराठी बाहुल्य दहिसर और मागाठाणे की सीटों पर भारी मतदान हुआ है। इसी आधार पर कई लोग 23 मई को उत्तर मुंबई में अप्रत्याशित नतीजे की उम्मीद कर रहे हैं। ठीक वैसा नतीजा, जैसे 2004 में गोविंदा ने राजनीति के धुरंधर राम नाईक को हरा दिया था।
मुंबई और महाराष्ट्र में जीत और हार का गणित
इसी तरह मुंबई उत्तर मध्य की सीट किसके हिस्से जाएगी, इसे लेकर भी बड़ा सस्पेंस है, क्योंकि इस बार यहां दो धुरंधर राजनेताओं की बेटियों के बीच मुकाबला था। भाजपा की ओर से प्रमोद महाजन की बेटी और मौजूदा सांसद पूनम महाजन मैदान में थीं, तो कांग्रेस की ओर से सुनील दत्त की बेटी और पूर्व सांसद प्रिया दत्त चुनाव मैदान में उतरी थीं। दोनों के बीच बहुत कड़ा मुकाबला है। पिछली बार यहां 49.40 फीसदी वोट पड़े थे।
इस बार 4.15 फीसदी ज्यादा यानी 54.05 फ़ीसदी मतदान हुआ है। कांग्रेस विधायक नसीम खान के विधानसभा क्षेत्र चांदिवली में भारी मतदान हुआ है, इसीलिए लोकसभा में यहां की जनता का प्रतिनिधित्व कौन करेगा, इस पर कोई भी कुछ कहने से कतरा रहा है। वैसे दक्षिण मुंबई को छोड़ दें तो बाक़ी पांच सीटों पर 2014 की तुलना में अधिक मतदान हुआ है। दक्षिण मुंबई में इस बार 2.33 फ़ीसदी कम मतदान हुआ है।
महाराष्ट्र की सभी 48 लोकसभा सीटों के लिए करीब 61.40 फीसदी वोटर्स ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है। पहले चरण में 63.04 फीसदी मतदान हुआ था, दूसरे चरण में 62.88 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाला था। इसी तरह तीसरे चरण में राज्य के 62.36 फीसदी मतदाताओं ने ईवीएम का बटन दबाया तो चौथे और अंतिम चरण में 57.32 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। राज्य की 25 सीटों पर 2014 की तुलना में मतदान का प्रतिशत अधिक रहा है, जबकि 23 सीट पर पिछली बार के मुक़ाबले में कम मतदान हुआ है।
इस बार यहां से हाईप्रोफाइल नागपुर सीट पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, नांदेड़ से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, हंसराज अहीर, राजू शेट्टी, सुप्रिया सुले, मिलिंद देवड़ा, अनंत गिते, सुनील तटकरे, नवनीत कौर राणा और उदयन राजे जैसे नेता चुनाव मैदान में हैं।
मराठा क्षत्रप शरद पवार इस बार चुनाव मैदान में नहीं उतरे, क्योंकि उनके भतीजे अजित पवार ने अपने बेटे पार्थ पवार को मावल सीट से चुनाव मैदान में उतार दिया। इसके बाद पवार ने यह कहते हुए चुनाव न लड़ने का फैसला किया, कि लोग उनकी तुलना मुलायम सिंह यादव से करने लगेंगे। जो पवार नहीं चाहते।
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