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चुनाव प्रचार के सच को कब समझेंगे विपक्ष और सरकार, जनता हो रही शर्मसार

Wed, 17 Apr 2019 02:33 PM IST
Prasidh yadav प्रसिद्ध यादव
Updated Wed, 17 Apr 2019 02:33 PM IST
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loksabha chunav 2019 foul language of leaders in election campaign indian politics
नेता आखिर कब सीखेंगे भाषा की मर्यादा - फोटो : अमर उजाला

17वीं लोकसभा के चुनाव में पहले चरण की वोटिंग हो चुकी है और अब 18 अप्रैल को दूसरे फेज के लिए मतदान होना है। नेता और दिग्गज चुनाव प्रचार के मैदान में है लेकिन वोट के लिए जिस तरह से प्रचार किया जा रहा है वह अचरज पैदा करता है। नये और पहली बार चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार नहीं बल्कि अनुभवी नेता जिस तरह से अपने प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए जनता के सामने उसे कोस रहे हैं और जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह शर्मसार करने वाला है। चुनाव आयोग खुद सकते हैं और नौबत यहां तक आ गई है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव प्रचार की भाषा पर लगाम कसने के लिए सामने आ रही है। 

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सुप्रीम कोर्ट कर रही है दखल 
खास बात यह है कि राजनेताओं के बेतुके बोल से चुनाव आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक को दखल देना पड़ रहा है फिर भी लोग नही मान रहें हैं। इसे बेशर्मी की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। दरअसल, इस चुनाव में प्रचार करते वक्त मतदाता को रिझाने के लिए जिसके जो मन में आ रहा है वो जुबान से ज़हर घोल रहा है। नेताओं से और विशेष रूप से अनुभवी राजनेताओं से इस बात की अपेक्षा की ही जाती है कि अपशब्द बोलते समय इतना ज्ञान रखे कि इससे जनता के मन -मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा? 
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loksabha chunav 2019 foul language of leaders in election campaign indian politics
राजनीति की मर्यादा को कब समझेंगे नेता? - फोटो : Social Media

किसी को नीचा दिखाने से कोई छोटा नही हो जाता और ऐसा कहने वाले कोई बड़े नहीं हो जाते। राजनीति में भी एक मर्यादा होती है जिसकी अपेक्षा हर राजनीति दल के नेता से की जाती है। राजनेता का व्यक्तित्व चुम्बकीय होना चाहिए। लोगों को आकर्षित करने वाला होना चाहिए, लेकिन अब इसके उलट दूसरों पर दोषारोपण कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की प्रचलन हो गया है,जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नही है। 

सरकार और विपक्ष दोनों ही अपना काम भूले 
दरअसल, चुनाव में मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। सरकार को अपनी उपलब्धि बतानी चाहिए। अगर कुछ गलती हो जाए तो उस पर खेद व्यक्त करना चाहिए। सरकार का अपना विज़न होता है लक्ष्य होते हैं और वो उसी पर काम करती है। ऐसे में विपक्ष सरकार को सकारात्मक सहयोग करता है और इसकी खामियों को जनता के बीच उजागर करता है। नेता के चरित्र अनुसरणीय होता है। ये मार्गदर्शक होते हैं, जिनके कंधों पर देश, राज्य की जिम्मेवारी होती है। अगर ये बातें जेहन में हमेशा इन्हें याद रहे तो जरूर बेतुके बोल से बचेंगे और अपने चुंबकीय व्यक्तित्व से जनता को प्रभावित करेंगे।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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