तो क्या प्रियंका हैं राहुल के इस मास्टर प्लान का हिस्सा? इसलिए बीजेपी है सकते में?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कांग्रेस के लिए हर चुनाव में प्रियंका गांधी को तुरुप का पत्ता माना जाता रहा है। इससे पहले तक प्रियंका हर बार चुनाव प्रचार तो करती थीं और चुनावी दौरे भी करती थीं, लेकिन कार्यकर्ताओं की जबरदस्त मांग के बावजूद वह सक्रिय तौर पर पार्टी का हिस्सा नहीं थीं। 2019 के चुनाव में आखिर ऐसा क्या नया होने जा रहा है कि प्रियंका को खुलकर मैदान में कूदना पड़ा? और वह भी मुख्य प्रभार उस पूर्वी उत्तर प्रदेश का दिया गया जिसमें वाराणसी औऱ गोरखपुर जैसे अहम क्षेत्र आते हैं? तो क्या प्रियंका गांधी की एंट्री नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के लिए बड़ी चुनौती साबित होने जा रही है?
क्यों सकते हैं विपक्षी?
भाजपा की तरफ से तात्कालिक प्रतिक्रिया भी दिलचस्प है – ‘राहुल गांधी जब फेल हो गए और हर तरफ से गठबंधन से ठुकरा दिए गए तो उन्हें प्रियंका की बैसाखी का सहारा लेना पड़ रहा है, इसलिए प्रियंका का राज्याभिषेक किया गया है’। जाहिर है भाजपा के लिए यह मुश्किल घड़ी है। खासकर यूपी में एक तरफ सपा-बसपा का गठबंधन, दूसरी तरफ प्रियंका की एंट्री। यह अपने आप में यूपी में नए चुनावी समीकरणों के संकेत दे रहा है और बेशक ये उस नए बदलाव की भी आहट हो सकता है जिसके लिए मोदी विरोधी ताकतें एक हो रही हैं।
अब सवाल यह है कि जब सपा-बसपा गठबंधन ने पहले ही अपनी अपनी सीटों का बंटवारा कर लिया है और कांग्रेस के लिए सिर्फ अमेठी और रायबरेली की पारंपरिक सीट ही छोड़ी है, ऐसे में प्रियंका पूर्वी उत्तर प्रदेश के 21 जिलों की 41 सीटों पर कांग्रेस के लिए कौन सी नई उम्मीद ला सकती हैं। जिस तरह कांग्रेस ने प्रदेश की सभी 80 सीटों पर अकेले लड़ने की बात कही है, ऐसे में क्या हर तरफ त्रिकोणात्मक संघर्ष की स्थिति क्या भाजपा के लिए खुशी की बात नहीं होनी चाहिए? लेकिन भाजपा की त्वरित प्रतिक्रियाओं में बौखलाहट के स्वर साफ दिख रहे हैं।
क्या है आखिर राहुल गांधी की प्लानिंग
दरअसल, जिस तरह राहुल गांधी ने खुलकर ये कहा है कि यूपी में किए गए संगठनात्मक बदलाव और प्रियंका या ज्योतिरादित्य जैसे कर्मठ युवाओं को दी गई ज़िम्मेदारियां सिर्फ 2 महीने के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक हैं, इससे साफ है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव के साथ साथ उत्तर प्रदेश में भी योगी सरकार को उखाड़ने का संकल्प लेकर चल रही है। ये बात गौर करने की है कि राहुल ने अखिलेश यादव और मायावती का सम्मान करने और भाजपा को हराने के लिए हर सीट पर उनका सहयोग करने की बात कहकर भाजपा को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
जाहिर है कांग्रेस ने और खासकर राहुल गांधी ने इस बात को लेकर बेहद गंभीरता से रणनीति बनाई है कि आखिर क्यों मायावती और अखिलेश ने कांग्रेस से दूरी बना ली, क्या उनकी पार्टी की उनके ही प्रदेश में इतनी बुरी हालत है और आखिर कबतक कांग्रेस यूपी में दूसरों के भरोसे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रहेगी? बुजुर्ग और वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को यूपी के प्रभार से मुक्त करके हरियाणा की जिम्मेदारी देना और यूपी को प्रियंका और ज्योतिरादित्य सरीखे युवा नेतृत्व के हाथों सौंपकर वह जिस नई योजना के तहत काम कर रहे हैं, उससे आने वाले वक्त में सियासत बेहद दिलचस्प होने जा रही है।
कांग्रेस अपने भविष्य को लेकर चिंतित
प्रियंका गांधी को ऐसे वक्त में यहां की ज़िम्मेदारी देने और लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए उनका सक्रिय इस्तेमाल करने का कांग्रेस के लिए यही सबसे सही वक्त लग रहा है। खासकर ऐसे समय में जब सोनिया गांधी की सेहत ठीक नहीं रहती और जब प्रियंका गांधी अपने बच्चों की ज़िम्मेदारियों से अब खुद को करीब करीब मुक्त पा रही हैं। प्रियंका के दोनों बच्चे बड़े और समझदार हो चुके हैं। रिहान 18 साल के हो चुके हैं और मिराया 16 साल की।
पढ़ाई-लिखाई, खेलकूद से लेकर देहरादून में पढ़ते हुए ये बच्चे अपने करियर और भविष्य को लेकर निश्चिंत हैं। दूसरी तरफ भाजपा सरकार ने जिस तरह रॉबर्ट वाड्रा पर अपना शिकंजा कसा है, उससे भी प्रियंका को लगने लगा है कि अब उनके सक्रिय राजनीति में आने का सही वक्त आ गया है। जाहिर है अपनी दादी इंदिरा गांधी का अक्स लिए और बोलने की उनकी शैली के साथ साथ उनका अंदाज़ तक रखने वाली प्रियंका के लिए ज़मीन तो पहले से तैयार है। बस, देखने की बात होगी कि 2019 के इस जंग में, आरोप-प्रत्यारोपों के खेल में और भाजपा के लगातार तंज कसने के सिलसिले के बीच प्रियंका किस तरह अपनी रणनीति तय करती हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.