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चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष: सियासत के तूफान में फंसी विरासत की किश्ती को क्या निकाल पाएंगे जयंत चौधरी

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sat, 29 May 2021 12:43 PM IST

सार

चौधरी चरण सिंह ने किसान जातियों का जो बड़ा सियासी वट वृक्ष तैयार किया था उसकी डालियां टूटकर बिखर चुकी हैं। मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यादव जो कभी चरण सिंह के वैसे ही कट्टर सिपाही थे जैसे पश्चिम में जाट, अब रालोद के साथ नहीं मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और उनके पुत्र अखिलेश यादव के साथ हैं...
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चौधरी चरण सिंह, अजित सिंह और जयंत चौधरी
चौधरी चरण सिंह, अजित सिंह और जयंत चौधरी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

आजाद भारत में किसान राजनीति के जनक चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि 29 मई से महज कुछ दिन पहले उनके पौत्र जयंत चौधरी ने अपने पिता अजित सिंह के निधन के बाद राष्ट्रीय लोक दल की कमान संभाली है। जयंत ने यह कमान तब संभाली है जब उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च में होने वाले हैं। यह चुनाव जयंत के लिए पहली अग्निपरीक्षा होगी जिसे पार करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। अभी तक जयंत के सिर पर उनके पिता अजित सिंह का साया था और उनके दल राष्ट्रीय लोक दल की सफलता का सेहरा भी अजित सिंह के सिर बंधता था और विफलता का ठीकरा भी उनके सिर फूटता था। लेकिन अब सब कुछ जयंत के खाते में जाएगा, सफलता भी और विफलता भी। इसलिए अब जयंत चौधरी को अपने फैसले बेहद सूझबूझ से लेने होंगे और अपनी टीम बनाने में भी उन्हें सही-गलत की पहचान करनी होगी।
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जयंत चौधरी जिस राजनीतिक परिवार से हैं उत्तर भारत में उसकी विरासत कांग्रेस के प्रथम परिवार से कम नहीं थी। जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह पूरी हिंदी-पट्टी के किसानों के एकछत्र नेता रहे हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सहकारिता कृषि की नीति का उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए खुलकर विरोध तब किया था, जब पार्टी के भीतर ही नहीं बाहर भी नेहरू को चुनौती देने वाले बहुत कम नेता थे। आमतौर पर मौजूदा समय का मीडिया चरण सिंह को जाट नेता के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि हकीकत यह है कि चरण सिंह कभी भी खुद को जाट नेता कहलाना पसंद नहीं करते थे। वह सभी किसान जातियों के नेता थे।


उन्होंने जाट, गुर्जर, यादव, कुर्मी, शाक्य, कोईरी, सैनी, कुशवाहा आदि तमाम उन जातियों को अपने झंडे के नीचे एकजुट किया था, जिनका खेती-किसानी और गांव-देहात की अर्थव्यवस्था से संबंध था। यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम किसान भी चरण सिंह को अपना नेता मानते थे और सहारनपुर से लेकर लोनी तक एक समय चरण सिंह के दल के टिकट पर दर्जनों मुसलमान विधानसभा और लोकसभा में चुनकर जाते थे। राजस्थान, हरियाणा ,उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में तो किसान जातियों के बीच चरण सिंह का सिक्का ही चलता था। उनकी लोकप्रियता महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और उड़ीसा जैसे दूरदराज के राज्यों के किसानों में भी थी।
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