क्या है एंटी ट्रैफिकिंग बिल जो मोदी सरकार कराने जा रही है पास
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पिछले कुछ सालों में देश में बच्चों की ट्रैफिकिंग और गुमशुदगी बढ़ी है। आंकड़े इसकी भयावहता की तस्दीक कर रहे हैं। हर घंटे में दो व्यक्ति ट्रैफिकिंग का शिकार हो जाता है, इनमें से एक बच्चा होता है। जबकि हर घंटे 8 बच्चे गुमशुदुगी का शिकार हो जाते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की साल 2016 की रिपोर्ट बताती है कि एक साल में ट्रैफिकिंग के शिकार लोगों की संख्या में 69 फीसदी का इजाफा हो गया।
गुम हुए ज्यादातर बच्चे भी ट्रैफिकिंग के ही शिकार होते हैं और वे भी बंधुआ मजदूरी, गुलामी, भिक्षावृत्ति, जबरिया शादी, वेश्यावृत्ति आदि के लिए खरीदे-बेचे जाते हैं। जो बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार होते हैं, गुलामी कराने के साथ-साथ उनका बलात्कार और यौन शोषण भी किया जाता है। झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उडीसा और असम आदि राज्यों के अति पिछड़े और आदिवासी इलाके के लड़के-लड़कियों को प्लेसमेंट एंजसियों के दलालों द्वारा अच्छी नौकरी का झांसा दे ट्रैफिकिंग कर महानगरों में लाया जाता है और फिर उन्हें घरों में या फिर मसाज पार्लरों में काम करने के लिए बेच दिया जाता है। ये घरेलू नौकर एक तरह से गुलाम बन जाते हैं।
क्या है एंटी ट्रैफिकिंग बिल?
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए देश में प्रभावी कानून का अभाव है। वर्तमान में भारतीय दंड संहिता-1860 की धारा 370 ह्यूमन ट्रैफिकिंग को केवल परिभाषित करते हुए उसे अपराध की श्रेणी में रखती है। जबकि अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-1956 का पूरा फोकस देह व्यापार के लिए ट्रैफिकिंग पर रोक लगाना है। दोनों कानूनों की अपनी सीमाएं और खामियां हैं। वर्तमान कानून व्यवस्था और तंत्र में ट्रैफिकिंग की जटिल प्रकृति को संबोधित करने या फिर पीड़ितों के समक्ष आने वाली चुनौतियों के समाधान का अभाव है।
पीड़ितों के पुनर्वास और प्रत्यावर्तन के लिए भी कोई व्यापक ढांचागत व्यवस्था नहीं है। इतना ही नहीं अपराधों की रोकथाम और अपराधियों के लिए कठोर सजा का प्रावधान भी नहीं है। इन्हीं खामियों की वजह से ट्रैफिकर पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ पाते। अगर आ भी जाते हैं तो लचर कानून की वजह से बरी हो जाते हैं।
इन खामियों को देखते हुए केंद्र की मोदी सरकार ने एक नया ट्रैफिकिंग कानून बनाने की पहल की है। इसी कड़ी में संसद के पिछले मानसून सत्र में 18 जुलाई 2018 को “ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रीवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रिहैबीलिटेशन) बिल 2018” पेश किया गया, जो लोकसभा में पास हो गया है। अब राज्यसभा में इसे पारित होना है।
उम्मीद है संसद के मौजूदा सत्र में यह राज्यसभा में पारित होकर कानून की शक्ल अख्तियार कर लेगा। प्रस्तावित बिल ह्यूमन ट्रैफिकिंग को एक संगठित अपराध मनाते हुए इसे समग्रता और व्यापकता के साथ वैधानिक दायरे में संबोधित करता है।
यह बिल ट्रैफिकिंग को रोकने के लिए वर्तमान प्रयासों और उपायों का आपस में समन्वय करते हुए पीड़ितों की पहचान, अपराधियों को कठोर सजा, सरवाईवर्स यानी ट्रैफिकिंग से बचाए लोगों की सुरक्षा, संरक्षण और पुनर्वास को सुनिश्चित करता है।
ह्यूमन ट्रैफिकिंग सबसे बड़ा और संगठित अपराध
ह्यूमन ट्रैफिकिंग दुनिया के तीसरे नंबर का सबसे बड़ा और संगठित अपराध है। इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन की साल 2014 की रिपोर्ट के मुताबित ट्रैफिकिंग का सालाना अंतरराष्ट्रीय कारोबार करीब 150 बिलियन डॉलर का है। एशिया इसका हब है। भारत में कई मामलों का भंडाफोड़ हुआ, जिसमें पता चला कि यहां से लड़कियों को ट्रैफिकिंग कर विदेशों में भेजा जाता था। हाल ही में मुंबई पुलिस ने एक ट्रैफिकर राजूभाई गमलेवाला को गिरफ्तार किया था जिसने कबूल किया कि 10 सालों में उसने करीब 300 नाबालिक लड़कियों को अमेरिका में बेचा है।
इसी तरह नेपाल और बंग्लादेश से भी भारत में नाबालिक लड़कियों को ट्रैफिक कर देह व्यापार, मसाज पार्लर आदि के लिए लाया जाता है। प्रस्तावित एंटी ट्रैफिकिंग बिल में पहली बार सीमापार से होने वाली ट्रैफिकिंग पर लगाम लगाने का पुख्ता बंदोबस्त किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरो की स्थापना की जाएगी, जो गृह मंत्रालय के तहत स्थापित राष्ट्रीय जांच एंजेसी यानी एनआईए का हिस्सा होगा।
यह एंटी ट्रैफिकिंग ब्यूरों विदेशी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ तालमेल रखेगा और जांच में अन्य देशों को भी सहायता करेगा। इस नए कानून में एक और अच्छी बात यह है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिकर्स के संगठित गठजोड़ को तोड़ने के लिए उनकी संपत्ति की कुर्की जब्ती और अपराध से अर्जित धन को जब्त करने का प्रावधान है। यह धन पीड़ितों के पुनर्वास पर खर्च किया जाएगा। जाहिर है यह कदम सारी दुनिया में पैर पसारने वाले इस संगठित अपराध की कमर तोड़ने के लिए एक गहरी चोट होगी।
क्या है ह्यूमन ट्रैफिकिंग बिल में खास
प्रस्तावित ट्रैफिकिंग बिल में पहली बार पीड़ितों के लिए पुनर्वास कोष बनाने की भी बात की गई है। इसका उपयोग पीड़ित के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक देखभाल के लिए होगा। इतना ही नहीं पीड़ित शारीरिक और मानसिक आघात से निपटने के लिए 30 दिन के भीतर अंतरिम सहायता का हकदार होगा। अपने देश में मुकदमों की सुनवाई और निपटारे की जो स्थिति है वह किसी से छुपी नहीं हुई है। मुकदमे के निपटारे में तो कई बार दशकों लग जाते हैं।
इसे ध्यान में रखते हुए बिल में निश्चित समय-सीमा में मुकदमे की तेजी से सुनवाई के लिए प्रत्तेक जिले में विशेष अदालत बनाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही इसमें अपराधियों को कठोर दंड का प्रावधान भी किया गया है। जिसके तहत न्यूनतम सजा 10 साल सश्रम कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक है। इस तरह से नया बिल ट्रैफिकिंग के सभी पहलुओं को समाहित करते हुए व्यापक समाधान पेश करता है।
(वरिष्ठ टीवी पत्रकार अनुराग पुनेठा लोकसभा टीवी में सीनियर एंकर हैं)
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