एनसीईआरटी: पाठ्यक्रम में बदलावों पर तर्क-वितर्क तो होना ही चाहिए
वर्ष 2014 में जब पुनः नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार की वापसी हुई तो सबसे पहले चर्चा चली कि एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों के पाठ्यक्रम का रिवीजन किया जाना चाहिए।
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Ca से कैल्शियम, I से आयोडीन और O से ऑक्सीजन होता है, यह अब कक्षा 10 के विद्यार्थी नहीं पहचान पाएंगे। दरअसल, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपने नए सिलेबस में केमिस्ट्री की पाठ्यपुस्तक से पीरियाडिक टेबल या कहें आवर्त सारणी को हटा दिया है। चार्ल्स डार्विन की इवोल्यूशन थ्योरी को भी क्लास 9-10 की पुस्तकों से बाहर किया गया है। चार्ल्स डार्विन की थ्योरी पर तर्क-वितर्क चलते रहते हैं, लेकिन पीरियाडिक टेबल पर कैची चलाना, किसी को समझ नहीं आ रहा है।
हालांकि, पीरियाडिक टेबल क्लास 11 के पाठ्यक्रम में बनी रहेगी। इवोल्यूशन थ्योरी भी क्लास 12 की बायोलॉजी बुक में पढ़ाई जाती रहेगी। क्लास 6, 7, 8 की साइंस टेक्स्ट बुक से फाइबर एंड फैब्रिक चैप्टर को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। क्लास 6 की टेक्स्ट बुक में तो इसमें महात्मा गांधी के चरखे का उदाहरण दिया गया था।
दरअसल, एनसीईआरटी को एक स्वायत्त संस्था के तौर पर वर्ष 1961 में स्थापित किया गया था, ताकि देश में स्कूली शिक्षा के गुणात्मक सुधार में सहायता मिल सके। राष्ट्र निर्माण और देशभर में नैरेटिक तथा विचारों को स्थापित करने में एनसीईआरटी ने अहम भूमिका निभाई है, लेकिन पाठ्य पुस्तकों को लेकर शुरुआत से राजनीति चली आ रही है, जिस पार्टी की सरकार होती है, वह अपनी विचारधारा के अनुसार किताबों में परिवर्तन कराती है।
अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में जब पहली एनडीए सरकार बनी थी, तब भी सिलेबस बदलने की कोशिश की गई थी। हालांकि, सत्ता में लौटते ही कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने एनडीए सरकार द्वारा किए गए बदलावों को पूर्ववत करने की कोशिश की।
वर्ष 2014 में जब पुनः नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार की वापसी हुई तो सबसे पहले चर्चा चली कि एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकों के पाठ्यक्रम का रिवीजन किया जाना चाहिए। तत्काल कुछ नहीं हुआ और वर्ष 2017 में रिविजन के बजाय रिव्यू शब्द का इस्तेमाल किया गया। तब एनसीईआरटी के मुखिया ऋषिकेश सेनापति ने कहा था कि कुछ हालिया घटनाक्रमों जैसे जीएसटी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। उस समय इस रिव्यू के तहत 182 पुस्तकों में 1334 बदलाव किए गए थे। नए रिफरेंस को शामिल किया गया।
प्राचीन भारत के ज्ञान और पद्धतियों को फोकस में रखा गया। अगले ही वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने रिव्यू के दूसरे चरण की शुरुआत कर दी और कहा गया कि सिलेबस के बोझ से विद्यार्थियों को बचाना है।
हो चुकें हैं कई बदलाव
वैसे तो बदलाव प्रकृति का नियम हैं, लेकिन एनसीईआरटी के सिलेबस से मुगल इतिहास से जुड़े चैप्टर हटाने, नागरिक शास्त्र की पुस्तक से विश्व राजनीति में अमेरिकी वर्चस्व और शीतयुद्ध का दौर जैसे पाठ पूरी तरह हटाने, स्वतंत्र भारत में राजनीति पर आधारित किताब जन आंदोलन का उदय और एक दलीय प्रभुत्व के युग का पाठ हटाने, फिराक गोरखपुरी की गजल, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का गीत 'गीत गाने दो मुझे', विष्णु खरे के 'सत्य' को भी पाठ्य पुस्तकों से हटाया गया है।
ऐसे ढेरों बदलाव हैं, जिन पर विपक्ष सरकार को घेर रहा है। हालांकि, सरकार का तर्क लगातार यही है कि हम नई शिक्षा नीति 2020 को लागू कर रहे हैं, जिसमें स्किल बेस्ड एजुकेशन पर फोकस बढ़ा दिया गया है। विद्यार्थियों को भविष्य में काम करने और अपने स्किल को समझने के लिए स्कूल में ही तैयार किया जा रहा है। भविष्य के लिए नई शिक्षा नीति और नए एजुकेशन सिस्टम को बेहतर बनाया जा रहा है।
शिक्षा मंत्रालय बार-बार कह रहा है कि एनसीईआरटी ने अपने पाठ्यक्रम को युक्तिसंगत बनाने के लिए 25 बाहरी विशेषज्ञों और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के 16 शिक्षकों से परामर्श लिया है। उसके बाद ही चैप्टर्स को हटाने का निर्णय लिया गया है। सरकार ने यह भी साफ किया है कि निर्णय को वापस नहीं लिया जाएगा, भले विपक्ष कितना भी हो-हल्ला मचता रहे।
हालांकि, आनंदपुर साहिब संकल्प के संदर्भ में खालिस्तान और अलग सिख राष्ट्र के संदर्भों को क्लास 12 की राजनीति विज्ञान की किताबों से हटा दिया गया है, क्योंकि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) को आपत्तियां थीं। वैसे, एनसीईआरटी की पाठ्यक्रम में बदलाव पहली बार नहीं हुए हैं, वर्ष 1975, 1988, 2000, 2005 में भी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा में संशोधन हुए थे।
पाठ्यक्रम में बदलाव और विवाद
राजनीति तो होती रहेगी, लेकिन यदि भावी पीढ़ी को तैयार करना है तो समय के अनुसार उन्हें शिक्षा देना सरकार का दायित्व है। कुछ चीजें तो निश्चित रूप से हटेंगी और कुछ नई चीजें जुड़ेंगी। फिर जो भी सरकार होगी, उसके निर्णयों पर विपक्ष का काम उंगली उठाना है। यदि पाठ्यक्रम में बदलाव से बच्चों का भविष्य उज्जवल होता है तो बदलाव होना ही चाहिए। हालांकि, यह तो समय बताएगा कि यह बदलाव कब तक एनसीईआरटी की किताबों में टिक पाते हैं।
दूसरा पूरे देश में एनसीईआरटी की किताबें से पढ़ाई होती है, ऐसा भी नहीं है। सीबीएसई से जुड़े स्कूल और कुछ राज्यों में सरकारें एनसीईआरटी की पुस्तकों को अपना रही हैं। नई शिक्षा नीति 2020 में भी राज्यों को अपना पाठ्यक्रम बनाने की छूट है। राज्य की परिस्थितियों के अनुसार राज्य सरकारें पाठ्यक्रम में बदलाव कर सकती हैं।
देश में जो गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं, वे इन बदलावों को कितना अपनाएंगी? क्या किताबें फिर से राजनीति का अड्डा बनेंगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन बदलावों पर तर्क-वितर्क तो होना ही चाहिए और यदि बच्चों के हित में कुछ बदलावों को बदलना भी पड़े तो सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए।
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