Jhalkari Bai Jayanti 2024: रानी लक्ष्मीबाई की परछाई थी स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना और साहसी झलकारी बाई
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को भारतीय नारी के बल, बुद्वि, साहस से परिचित कराने वाली एक साधारण सी महिला झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर सन् 1830 को झांसी के पास ही भोजला गांव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था।
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को भारतीय नारी के बल, बुद्वि, साहस से परिचित कराने वाली एक साधारण सी महिला झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर सन् 1830 को झांसी के पास ही भोजला गांव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था।
विस्तार
Jhalkari Bai Jayanti 2024: भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गवाह अनगिनत बहादुर हस्तियां रहीं लेकिन इतिहास की विडम्बना है कि चंद नामों को ही इतिहास अपनी पुस्तक में दर्ज होने का मौका देता है। अनगिनत नाम आज भी गुमनामी की किताब में मुस्कुरा रहे हैं। कुछ अमिट छाप छोड़ने वाले नाम किस्सों, कहानियों, लोकगीतों में इस तरह समा गए कि उनका अमर होना लाजिमी है। कुछ नाम यूं ही इतिहास से वर्तमान तक पहुंचने की फेहरिस्त की कतार में लगे हैं। कुछ नाम ही बहादुरी के पर्याय बन गए। झलकारी बाई एक ऐसा ही नाम है जिसे इतिहास उसी सम्मान से निहारता है जैसे किसी क्रान्तिकारी वीर रानी को। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कलम की जुबानी-
’’जाकर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी।’’
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को भारतीय नारी के बल, बुद्वि, साहस से परिचित कराने वाली एक साधारण सी महिला झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर सन् 1830 को झांसी के पास ही भोजला गांव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। उनके पिता सदोवर सिंह और मां जमुना देवी थी। बचपन में ही माता का देहांत हो जाने पर पिता सदोवर सिंह ने उनका लालन-पालन एक लड़के की तरह किया। झलकारी बचपन से ही निड़र और बहादुर थी। घुड़सवारी, तलवारबाजी और हथियार चलाने का शौक उन्हें एक कुशल योद्वा में परिवर्तित करने का काम कर रहा था। तत्कालीन परिवेश में एक अति सामान्य परिवार में जन्मी कन्या को औपचारिक शिक्षा दिला पाना सरल न था। फिर भी एक कुशल योद्वा के रूप में झलकारी बाई का निर्माण हुआ। जंगल में लकड़ियां काटना, खेतों-खलिहानों में खुद को रोपना, पशुओं की देखभाल करना, झलकारीबाई के रोजमर्रा के काम थे।
कहते हैं एक दिन जंगल में झलकारी का सामना एक तेंदुए से हो गया, झलकारी ने उसे सामान्य कुल्हाड़ी से मार डाला। गांव में खबर फैली और झलकारी बाई की बहादुरी के चर्चे होने लगे। फिर एक बार डकैतों के एक गिरोह के द्वारा गांव के एक व्यापारी पर हमला बोल दिया गया, झलकारी ने बहादुरी से उन डकैतों न केवल सामना किया बल्कि उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उसकी बहादुरी देख गांव में उसकी खूब प्रसन्नता हुई और गांव वालों ने उसकी बहादुरी के कारण उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के बहादुर सैनिक पूरन सिंह कोली से करवा दिया।
इतिहास की कहानियों और किस्सों में झलकारी का चित्र महारानी लक्ष्मीबाई के जैसा ही है। उन्हें इतिहास रानी की हमशक्ल बतलाता है। यकीनन इतिहास की घटनाएं उनमें दर्ज शौर्य-गाथाएं झलकारी बाई को महारानी लक्ष्मीबाई की परछाई दर्शाती हैं। जिसने न केवल अंग्रेजों अपितु भारतीयों को भी अचंभित किया हुआ था। कहते हैं झलकारी बाई गौरी पूजा के अवसर पर रानी लक्ष्मीबाई को सम्मान देने झांसी के किले में गयीं थी वहां दोनों की मुलाकात हुई रानी यह देखकर कि वह उनके जैसे ही दिखती है आश्चर्य चकित रह गयी।
झलकारी के विषय में उनकी बहादुरी के किस्सों से प्रभावित होकर रानी ने उन्हें दुर्गा सेना में भर्ती कर लिया। झलकारी की प्रतिभा को रानी ने बखूबी तराशा। उन्हें तोप चलाना, तलवारबाजी, बंदूक चलाना आदि में महारथ हासिल करवायी। जल्द ही झलकारी महिला फौज की बहादुर कमाण्डर बन गयी। डलहौजी की हड़प नीति के तहत जब झांसी पर संकट के बादल मडराये झलकारी अग्रिम मोर्चे की योद्धा बनी। अप्रैल 1857 के युद्व में रानी और उसकी महिला सेना महल के भीतर से ही मोर्चा संभाले हुए थे।
ब्रिटिश सेना के सभी प्रहारों को नाकाम करती महारानी की सेना सम्भवतः ब्रिटिश सेना को वापस खदेडने में कामयाब भी हो जाती यदि, तभी रानी के एक सहयोगी राव दूल्हाजू की गददारी के कारण महल के द्वार ब्रिटिश सेना के लिए न खोले जाते तो शायद इतिहास बदल भी सकता था। हालांकि किले के द्वार खुलने की खबर झलकारी के इरादों पर भारी न कर सकी, उनकी रणनीति का परिणाम था कि रानी अपने कुछ विश्वासपात्र सैनिकों के साथ किले से निकलने में कामयाब हो गयी। कहते हैं झलकारी के पति पूरन की किले की रक्षा करते हुए शहादत हुई। झलकारी की वीरता का आंकलन करना आज भी संभव नहीं। पति की मृत्यु का शोक झलकारी बाई की पांव की बेड़ियां नहीं प्रेरणा की ढाल बना। झलकारी शेरनी की तरह रानी लक्ष्मीबाई की वेशभूषा में झांसी की सेना की कमान हाथों में लेकर ब्रिटिश सेना को गुमराह करने के लिए स्वयं ह्यूरोज के कैम्प में पहुंच ललकारने लगी। कमाल का जज्बा रहा होगा, साहस और वीरता शब्द भी बौना लगता है, वीरांगना झलकारी बाई के इरादों के आगे। उनकी वीरता के साहस को बहुत लिखा गया लेकिन फिर भी कम लिखा गया ।
वृंदावन लाल वर्मा अपने उपन्यास में झलकारी बाई के बारे में बताते हैं- झलकारी जब ह्यूरोज के सामने पहुंची, उसकी शान-ओ-शौकत और चेहरे का तेज़ देख कर जब तक वह भी उसे पहचान न सका, जब तक छावनी में मौजूद राव दूल्हाजू( रानी के पकड़े जाने की खबर पाकर) ने उसे छावनी की आड़ से बारीकी से पहचान करके न बताया । दूल्हाजू ने ह्यूरोज से कहा- 'यह रानी नहीं है जनरल साहब । झलकारी कोरिन है। रानी इस प्रकार सामने नहीं आ सकती। दूल्हाजू की गद्दारी से झलकारी के चेहरे पर डर का भाव नहीं बल्कि वह निर्भय होकर दहाड़ी- 'मार दै, मैं का मरबे खो डरात हो? जैसे इत्ते सिपाही मरे तैसे एक मैं सई।'"
आज भी यह यकीन करना मुश्किल है कि एक साधारण सी महिला दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के सर्वश्रेष्ठ सैनिक से जा भिड़ी। यकीनन झलकारी बाई के बुलंद हौसले और बहादुरी के अंगिनत किस्से अभी भी हम तक अपनी पहुंच न बना पाए हैं लेकिन उनके चंद किस्सों को हमने कहानियों, कविताओं और उपन्यासों में सहेजने की जो कोशिश की है । उसे पढ़ कर आने वाली पीढ़ी को सकारात्मक ऊर्जा का भंडार मिलेगा । झलकारी बाई समाज के वंचित तबके की क्रांतिकारी महिला थी। तत्कालीन समाज में सामान्य लोगों के इतिहास लेखन की परंपरा नाम मात्र की होने के कारण, उनके जीवन की अनेक स्मृतिओं को कहीं दर्ज न किया जा सका ।
महारानी लक्ष्मीबाई विदुषी, दूरदर्शी और बेहद सहज विचारों की शासिका थी। तत्कालीन समाज की जटिलताओं और कुरीतियों से परे, समानता से लबरेज स्वतंत्रता की हिमायती रानी लक्ष्मीबाई ऊंच-नीच, भेद-भाव की विरोधी थी । उनके क्रांतिकारी विचारों की झलक उनकी दुर्गा सेना में देखी जा सकती हैं । समाज के वंचित तबके का प्रतिनिधित्व करने वाली जाबाज़ क्रांतिकारी झलकारी बाई ने अपने परिवार और प्राणों को देश के लिए समर्पित कर दिया ।
झलकारी बाई की शहादत कैसे हुई इस पर इतिहासकार अलग अलग विचार रखते हैं, कुछ का मानना है की उन्हें जेल में डाल दिया गया और कुछ उनकी शहादत 4 अप्रैल 1857 को मानते हैं । वास्तविकता कुछ भी हो लेकिन इतना तो निश्चित है की ब्रिटिश हुकूमत झलकारी के राष्ट्र के प्रति समर्पण को आसानी से सहन नहीं कर सकती थी। झलकारी बाई की बहादुरी को देख हयूरोज का कहना पड़ा, कि अगर भारत की 1% महिलाएं भी झलकारी बाई जैसी हो जाएं, तो अंग्रेजों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा। निसंदेह झलकारी बाई की बहादुरी के किस्से उन्हें रानी लक्ष्मीबाई की परछाई ही दर्शाते हैं ।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।