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जीवन धारा: क्षमा व पश्चाताप से हल्का हो जाता है मन का बोझ; करुणा का भाव रखना ही सूत्र

Thu, 21 Aug 2025 08:16 AM IST
ज्योति भास्कर दलाई लामा
दलाई लामा Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 21 Aug 2025 08:16 AM IST
सार

बीती बातों को भूलने तथा दूसरों का कल्याण चाहने से हमें आत्मविश्वास और स्वतंत्रता मिलती है और हम नकारात्मक विचारों से ऊपर उठकर जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। 

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Jeevan Dhara Dalai Lama Forgiveness and repentance lighten burden of mind having feeling of compassion is key
जीवन में क्षमा व पश्चाताप से हल्का हो जाता है मन (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

क्षमा करुणापूर्ण व्यवहार का आवश्यक अंग है। लेकिन, इसे समझने में कई बार भूल हो जाती है। क्षमा का अर्थ गलती को भूल जाना नहीं होता। अगर व्यक्ति अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को भूल जाए, तो फिर क्षमा करने के लिए कुछ बाकी ही नहीं रहेगा! मैं कहना चाहता हूं कि हमें अपने साथ हुए दुर्व्यवहार से निपटने के लिए कोई ऐसा रास्ता तलाशना चाहिए, जिससे हमें मानसिक शांति मिले। साथ ही हमारे भीतर प्रतिशोध जैसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति विकसित न होने पाए। एक जरूरी बात यह है कि जो हो गया, उसे स्वीकार करना चाहिए। यह व्यक्तिगत स्तर पर हो या सामाजिक स्तर पर, यह मानना बहुत जरूरी है कि बीता हुआ कल हमारे नियंत्रण से परे है। मगर अतीत में हुए दुर्व्यवहार पर हमारी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से हमारे नियंत्रण में होती है। 

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कर्ता और कर्म के अंतर को ध्यान रखना जरूरी है। कई बार इसमें बहुत कठिनाई होती है। यदि हम या हमारा कोई संबंधी किसी अपराध का शिकार हो जाए, तो ऐसे में अपराधी से घृणा न करना मुश्किल होता है। फिर हम थोड़ा विचार करें, तो पाएंगे कि अपने कर्मों के संदर्भ में हम किसी कुकृत्य और उसके कर्ता के बीच लगभग प्रतिदिन भेद करते हैं। क्रोध या चिड़चिड़ाहट के क्षणों में हम अपने प्रियजनों के साथ रूखा या गुस्से का बर्ताव करते हैं। बाद में हमें पश्चाताप या दुख होता है, लेकिन हम पीछे मुड़कर अपनी उस प्रतिक्रिया पर विचार करते हैं, तो हम आसानी से स्वयं में और अपने किए काम में अंतर देख पाते हैं। हम स्वयं को क्षमा भी कर देते हैं और कई बार वचन देते हैं कि हम गलती को फिर नहीं दोहराएंगे। यदि हम स्वयं को क्षमा कर सकते हैं, तो दूसरों को भी कर सकते हैं।
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हालांकि, यह सच है कि कई बार व्यक्ति स्वयं को भी क्षमा नहीं कर पाता। यह स्थिति बाधक बन जाती है। ऐसे लोगों को करुणा और अपने प्रति क्षमाशील होने का अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि इसी से दूसरों के प्रति करुणा और क्षमाशीलता का आधार तैयार होता है। एक और सच बात जो ध्यान रखने लायक है कि दूसरों को क्षमा कर देने से हमें स्वयं भी बोझ से मुक्ति मिलती है। यदि हम अपने साथ हुए दुर्व्यवहार पर विचार करते हैं, तो हमारे भीतर क्रोध और वैमनस्य का भाव जाग उठता है। लेकिन उन दुखद स्मृतियों और बुरे विचारों को मन में रखने से लाभ नहीं होता और न ही इससे अपराध के निवारण का रास्ता बनता है। इसका हम पर सकारात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ता, बल्कि इससे मानसिक शांति भंग होती है, नींद खराब हो जाती है और आगे चलकर शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
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दूसरी ओर, यदि हम अपराधी के प्रति मन में उठे वैमनस्य को दूर कर दें और उसे क्षमा कर दें, तो निश्चित रूप से हमें तुरंत लाभ प्राप्त होता है। बीती बातों को भूलने तथा दूसरों का कल्याण चाहने से हमें आत्मविश्वास और स्वतंत्रता मिलती है और हम नकारात्मक विचारों से ऊपर उठकर जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। 


सूत्र: करुणा का भाव रखें
जीवन में स्वयं या दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखें। इससे जीवन सुंदर और पहले से बेहतर होने लगेगा। चौबीस घंटों में जीवन की लय एक जैसी नहीं होती, इस बीच कई तरह की चीजें हमारे साथ होती हैं, हम क्रोध, प्रेम और दुख, सब कुछ महसूस करते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद हमें करुणा का भाव रखना चाहिए।

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