इंदौर जिला कोर्ट और पॉक्सो एक्ट: झूठे आरोप लगाकर किसी को जेल भेजना सरकारी तंत्र का दुरुपयोग
हर बार जब कोई सख्त कानून अस्तित्व में आता है, तो अपराधी मानसिकता के लोग उसके दुरुपयोग के तरीके तलाशने लगते हैं। पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति समय-समय पर सामने आई है।
हर बार जब कोई सख्त कानून अस्तित्व में आता है, तो अपराधी मानसिकता के लोग उसके दुरुपयोग के तरीके तलाशने लगते हैं। पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति समय-समय पर सामने आई है।
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विस्तार
इंदौर जिला सत्र न्यायालय ने एक महिला द्वारा अपनी ही बेटी से दुष्कर्म के प्रयास का झूठा आरोप लगाने पर कड़ी टिप्पणी की है।
न्यायालय ने कहा-
झूठे बयान देकर किसी को जेल भेजना, न केवल व्यक्ति के अधिकारों का हनन है बल्कि यह सरकारी तंत्र के दुरुपयोग की भी पराकाष्ठा है। साथ ही न्यायालय ने आदेश दिया कि झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाने वाली महिला के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए।
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हर बार जब कोई सख्त कानून अस्तित्व में आता है, तो अपराधी मानसिकता के लोग उसके दुरुपयोग के तरीके तलाशने लगते हैं। पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति समय-समय पर सामने आई है। बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया यह कानून भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना गया है। यह कानून कठोर है, संवेदनशील है और पीड़ित की रक्षा को सर्वोपरि मानता है। परंतु, बीते कुछ वर्षों में इसके दुरुपयोग के मामलों ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है — क्या यह कठोर कानून कभी-कभी निर्दोष लोगों की ज़िंदगी तबाह करने का औज़ार बन रहा है?
इसी संदर्भ में इंदौर की जिला अदालत का एक ताज़ा निर्णय बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने एक महिला द्वारा दर्ज करवाई गई झूठी एफआईआर के मामले में उसके खिलाफ केस दर्ज करने का निर्देश दिया है। मामला अक्टूबर 2024 का है, जब महिला ने विजय नगर थाने में नवल किशोर गर्ग के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी।
आरोप था कि नवल से उसके पुराने संबंध थे और एक बार उसने बेटी की बीमारी ठीक कराने के बहाने महिला और उसकी नाबालिग बेटी को अपने कार्यालय बुलाया, जहां एक बाबा द्वारा झाड़-फूंक की गई। महिला ने आरोप लगाया कि इसके बाद नवल ने उसकी बेटी के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया। साथ ही, यह भी कहा कि नवल ने उसके साथ संबंधों के दौरान उसकी अश्लील तस्वीरें खींची थीं और उन्हें दिखाकर उसे ब्लैकमेल कर रहा था।
इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने नवल किशोर गर्ग को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। इस गिरफ्तारी के महज 20 दिन बाद उनकी बेटी का विवाह होना था। अदालत ने उन्हें विवाह में शामिल होने के लिए अंतरिम ज़मानत दी। इसके बाद केस की सुनवाई शुरू हुई।
सुनवाई के दौरान, शिकायतकर्ता महिला अदालत के कई बार बुलाने के बावजूद उपस्थित नहीं हुई। अंततः उसने वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही दी। गवाही के दौरान नाबालिग बेटी ने आरोपी को पहचाना तक नहीं। आरोपी के वकील महेन्द्र मौर्य ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने कोई आपराधिक कृत्य नहीं किया है और पुलिस ने सादे कागज़ पर जबरन हस्ताक्षर लिए थे।
इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने यह स्पष्ट कहा कि यह मामला झूठे आरोप का है और महिला के विरुद्ध मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि "झूठे बयान देकर किसी को जेल भेजना, सरकारी तंत्र का दुरुपयोग है।"
गौरतलब है कि पॉक्सो एक्ट की संरचना ही ऐसी है कि जब कोई नाबालिग यौन शोषण का आरोप लगाता है, तो तत्काल एफआईआर दर्ज होती है और आरोपी को बिना विस्तृत जांच के गिरफ्तार कर लिया जाता है। इस कानून में जमानत मिलना आसान नहीं होता। ऐसे में यदि आरोप झूठा हो, तो आरोपी की सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक स्थिति और पारिवारिक जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई बार देखा गया है कि पारिवारिक दुश्मनी, प्रेम संबंधों में असहमति या ज़मीन-जायदाद के विवादों के चलते पॉक्सो एक्ट को बदले की भावना से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे कानून की गरिमा और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
पीड़ित के वकील महेन्द्र मौर्य ने कहा-
"माननीय न्यायालय ने उचित निर्णय लिया है। हम अपने दैनिक वकालती जीवन में देखते हैं कि आपसी रंजिश के चलते कई बार लोग पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग करते हैं। यदि अदालतें ऐसे मामलों में सख्ती दिखाएं, तो झूठे आरोप लगाने वालों की संख्या में निश्चित रूप से कमी आएगी।"
यह पहला मामला नहीं है, जब किसी अदालत ने झूठे आरोपों पर कड़ी टिप्पणी की हो। केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी.एस. दीस ने टिप्पणी की थी: "पॉक्सो का दुरुपयोग केवल कानून की मंशा को ही नहीं तोड़ता, बल्कि न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचाता है। मासूम आरोपियों को झूठे मामलों में फंसाने पर उनकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा?"
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी एक फैसले में कहा था कि पॉक्सो एक्ट का अंधाधुंध और निराधार उपयोग, खासकर किशोरों के बीच प्रेम संबंधों को अपराध में बदल देना, न्याय का विकृत स्वरूप है। उन्होंने चिंता जताई कि अनेक युवा लड़के वर्षों से जेल में बंद हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की "क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट 2022" के अनुसार, कुल 44,785 बलात्कार के मामलों में से 4,340 केस प्रमाणित रूप से झूठे पाए गए, यानी लगभग 9.6 प्रतिशत। यद्यपि यह आंकड़ा रेप केस से संबंधित है, पर इनमें कई मामले पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत भी दर्ज किए गए थे। हालांकि एनसीआरबी ने पॉक्सो के झूठे मामलों का अलग से विश्लेषण नहीं किया है, फिर भी यह स्पष्ट है कि कई बार कानून का गलत इस्तेमाल कर निर्दोषों को फंसाया जाता है।
ऐसे में इंदौर जिला न्यायालय का निर्णय एक मिसाल की तरह देखा जाना चाहिए। इस प्रकार के कड़े फैसले यदि लगातार सामने आते रहें, तो कानून का भय केवल अपराधियों को ही होगा, निर्दोषों को नहीं। इससे समाज में कानून के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा और पॉक्सो जैसे संवेदनशील कानून का दुरुपयोग कम होगा।
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