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चित्रकारों की रचनात्मक यात्रा: पृथ्वी के सपनों से सजी कैनवास की दुनिया
सार
भले ही इन कलाकारों की शैली और माध्यम भिन्न हैं, लेकिन सभी की रचनाओं में प्रकृति से गहरा जुड़ाव झलकता है। उनके चित्रों में पर्वत, पेड़, नदियां, समुद्र और वसंत के रंगों से सजी प्रकृति का सौंदर्य स्वप्निल रूप में उभरता है
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चित्रों में खिली प्रकृति की झलक।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
इंदौर शहर सुदीर्घ सांस्कृतिक-सांगीतिक-साहित्यिक और कला परंपरा से समृद्ध-संपन्न है। यहां इनसे जुड़े कार्यक्रमों का एक अनूठा नैरंतर्य है और इस निरंतरता को बनाए रखने में यहां के कलाकारों को असंदिग्ध योगदान है। इसी परिदृश्य में शहर के पांच चित्रकारों की एक प्रदर्शनी मर्म कला अनुष्ठान ने आयोजित की। यह प्रदर्शनी प्रिंसेस आर्ट पैसेज में लगाई गई और इसमें पंकज अग्रवाल, राजेश शर्मा, समिधा पालीवाल, सुभाष चौहान, राहुल सोलंकी और रवीन्द्र व्यास के चित्रों को शामिल किया गया है।
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भले इन चित्रकारों ने भिन्न शैलियों और माध्यमों में चित्र रचे हों, लेकिन इन सबसे में एक बात समान है कि ये सभी चित्र प्रकृति से प्रेरित हैं। हर कलाकार को प्रकृति अलग-अलग स्तरों पर प्रेरित करती है और रचने के लिए इतना अनंत अवकाश देती है कि चित्रकार प्रकृति के रूप-वैभव को नाना तरह से चित्रित कर सके। ये सभी चित्रकार प्रकृति के इसी रूप-वैभव से मुग्ध हैं।
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मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवताले की कविता-पंक्तियां हैं...
अब मैं बसंत कहना चाहता हूं
बसंत जो पृथ्वी की आंख है
जिससे वह सपने देखती है
मैं पृथ्वी का देखा हुआ सपना कहना चाहता हूं।
इस अप्रतिम कवि की इन पंक्तियों के सहारे ही मैं कहना चाहता हूं कि ये पांचों चित्रकार अपने तरीके से पृथ्वी का देखा हुआ स्वप्न रचना चाहते हैं। उनके रचे इन चित्रों में प्रकृति कभी खुली आंखों से, कभी अधमुंदी आंखों और कभी बंद आंखों से सुंदरता का स्वप्न देखती है और इस स्वप्न में भी उसके असंख्य रंग, रंग-युतियां और रंग-संगतियां दिखाई देती हैं, उन्हें से ऊर्जा लेकर इन चित्रों को रूपायित किया गया। चाहे आसमान के वक्षस्थल में सीना छुपाए पर्वत हों या रंग-बिरंगे फूलों से झुकती पेड़ की शाख हो या अपने में ही इतराते-नाचते पेड़ हों, किसी नदी की लहरें हों या समुद्र की उत्ताल तरंगें हों या वसंत का रंगभरा नज़ारा हो या स्वप्न में देखी प्रकृति की कोई झलक, ये सारे नजारे इन चित्रों में सहज कल्पनाशीलता से रूपायित किए गए हैं।
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प्रदर्शनी का एक बड़ा मकसद यह है कि उत्सवों के माहौल में कला के प्रति जागरूकता पैदा हो और तमाम तरह की शॉपिंग करते लोगों में चित्रों को भी किफायती दानों में अपने घर ले जाने की इच्छा पैदा हो सके।
न्यूनतमवादी और संरचनावादी चित्रकार
चित्रकार पंकज अग्रवाल की चित्र-कृतियों में प्रकृति रूप-वैभव सरलता और सहजता से चित्रित किया गया है। वे कम रंगों और इन रंगों के बरताव में किसी न्यूनतमवादी की तरह नजर आते हैं। मिसाल के लिए रंग-बिरंगे पत्तों-फूलों को रचने का उनका ढंग सरलतम है, लेकिन वे अधिकतम प्रभाव पैदा कर देते हैं। उनका एक चित्र एरियल व्यू की तरह प्रकृति के एक भरे पूरे नज़ारे को अनूठे कोण से रचता है। इस तरह हमें प्रकृति का एक संपन्न-विस्तृत रूप दृष्टिगोचर होता है।
कलाकारी में दिखते हैं पृथ्वी के वसंत चित्र
इसी तरह राजेश शर्मा अपने चित्रावकाश में पहाड़ को इस तरह से ऊर्जावान तूलिकाघातों से रचते हैं कि उसमें एक लयात्मकता पैदा होती है और अनंत आकाश को इस तरह रचते हैं कि पूरा चित्र एक खास परिप्रेक्ष्य में रूपायित हो जाता है। वे अपने तूलिकाघातों को किसी संरचनावादी की तरह योजनाबद्ध ढंग से रचते हैं और हमारे सामने प्रकृति का मुग्धकारी रूप सामने आ जाता है। रवीन्द्र व्यास प्रकृति का कोई सुंदर नजारा कोमल रंग-योजना से साकार करते हैं। उनके चित्र पृथ्वी के वसंत चित्र हैं।
आंखों की सुप्त संवेदनाओं को जगा देते हैं चित्र
समिधा पालीवाल ने पिछले कुछ समय में अपनी एक खास चित्र-भाषा और चित्र-शैली अर्जित की है। वे किसी उद्दाम और वेगवती नदी का लहरों या किसी किसी जलधि की आती-जाती लहरों को नैसर्गिक बहाव के जरिए रूपायित करती हैं। वे नीले रंगों के साथ पीले और कहीं कहीं भूले-पीले रंगों के सफेद रंगों के जरिए वे ऐसा चित्र साकार करती हैं, जो आंखों की सुप्त संवेदनाओं को जगाने का काम करते हैं।
सफेद पेपर में पूरा स्पेस
राहुल सोलंकी एक भिन्न राह और भिन्न माध्यम में अपनी चित्रात्मा को खोजते हैं। वे राइस पेपर कोलाज क्रिएट करते हैं लेकिन उनके इन कोलाजों में एक तरह की महीन कल्पना से स्पंदित रूपाकार हैं। वे सफेद राइस पेपर को किसी स्पेस की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिसमें एक ध्यानकर्षी पारदर्शिता है और इसी पारदर्शिता की एकरसता को तोड़ने के लिए वे इसमें नीले, हरे, पीले राइस पेपर से मनोहारी रूप देते हैं।
कैनवस पर प्रकृति की स्वप्निलता
इसी तरह सुभाष चौहान के चित्रों में प्रकृति की स्वप्निलता दिखाई देती है। जैसे प्रकृति का कोई नज़ारा स्मृति की धुंध में धीरे-धीरे उभर रहा हो। इस प्रकृति के नजारे में वे सुचिंतित ढंग से बहुत हलका और उजला पीला या नीला रंग किसी युक्ति की तरह इस्तेमाल कर कैनवस को स्पंदित कर देते हैं।
जाहिर है इन सभी चित्रकारों के ये चित्र प्रकृति के देखे स्वप्नों के अपने माध्यमों में रूपायित करने के रचनात्मक साक्ष्य हैं और इनकी कल्पनाशीलता इन चित्रों को भी किसी स्वप्न में बदल देती है।