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नए साल में क्या-क्या याद रखेंगे आप?

Tue, 30 Dec 2025 03:51 PM IST
Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Tue, 30 Dec 2025 03:51 PM IST
सार

गीता की स्मृति केवल अतीत की ओर देखने की सलाह नहीं देती, बल्कि वह वर्तमान को सही ढंग से जीने की क्षमता देती है, क्योंकि स्मृति का अर्थ है अपने मूल मूल्यों को सक्रिय रूप से याद रखना और उन्हें कर्म में उतारना।

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iim indore dr ananya mishra column What will you remember from the new year
जिजीविषा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

याद कीजिए वह क्षण जब आपने अचानक महसूस किया हो कि आप बहुत व्यस्त हैं, बहुत सफल हैं, बहुत आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन भीतर कहीं कुछ खो गया है? जैसे जीवन की गति तो बढ़ गई हो पर दिशा धुंधली हो गई हो... जैसे निर्णय तो प्रतिदिन लिए जा रहे हों लेकिन यह स्पष्ट न हो कि वे निर्णय किस मूल्य के आधार पर लिए जा रहे हैं, और जैसे पहचान तो है पर उसका केंद्र कहीं खो गया हो? यह अनुभव आज व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक हो चुका है।
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हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ सूचनाएँ अभूतपूर्व गति से प्रवाहित हो रही हैं, सामाजिक भूमिकाएँ अस्थिर हैं, नैतिक मानक सापेक्ष हो चुके हैं, और पहचान लगातार पुनःनिर्मित हो रही है। लेकिन इसी तीव्र परिवर्तन के बीच एक सूक्ष्म, लगभग अदृश्य संकट गहराता जा रहा है, जिसे आधुनिक शब्दावली में भले ही “वैल्यू क्राइसिस” या “एथिकल कन्फ्यूज़न” कहा जाए, पर जिसे भगवद्गीता एक अत्यंत सटीक शब्द में परिभाषित करती है - स्मृति–भ्रंश।
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भगवद्गीता में स्मृति केवल याददाश्त नहीं है, बल्कि वह अंतःस्मृति है जो मनुष्य को यह याद दिलाती है कि वह कौन है, उसका धर्म क्या है, और उसके कर्म किस दिशा में होने चाहिए। जब यही स्मृति नष्ट होती है, तब मनुष्य केवल भूलता नहीं है, बल्कि भटक जाता है।
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गीता का प्रसिद्ध श्लोक है:

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात, क्रोध निर्णय लेने की क्षमता को क्षीण करता है जिसके कारण स्मृति भ्रम हो जाता है। जब स्मृति भ्रमित हो जाती है तब बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है।

यह श्लोक एक क्रम बताता है कि एक मनोवैज्ञानिक और नैतिक पतन की श्रृंखला, जिसमें सबसे पहले इंद्रिय-आसक्ति से भ्रम उत्पन्न होता है, फिर भ्रम से स्मृति नष्ट होती है, स्मृति के नष्ट होने से विवेक नष्ट होता है, और विवेक के नष्ट होते ही मनुष्य अपने ही पतन का कारण बन जाता है।

यह क्रम आज असहज रूप से प्रासंगिक लगता है। आज का मनुष्य चिंतित इसलिए नहीं हो रहा कि वह अनैतिकता से घिरा हुआ है, बल्कि इसलिए कि वह यह याद ही नहीं रख पा रहा कि नैतिकता का आधार क्या था, और यही बिंदु स्मृति–भ्रंश को साधारण भूल से एक गंभीर आध्यात्मिक संकट बना देता है। गीता की स्मृति वह सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और नैतिक स्मृति है, जो पीढ़ियों से मनुष्य को यह बताती आई है कि सफलता केवल उपलब्धि नहीं होती, स्वतंत्रता केवल विकल्प नहीं होती, और प्रगति केवल गति नहीं होती। जब यह स्मृति कमजोर होती है, तब नैतिक निर्णय परिस्थितियों के अनुसार बदलने लगते हैं, मूल्य सुविधानुसार ढलने लगते हैं, और पहचान स्थिर केंद्र के बजाय एक चलती हुई छवि बन जाती है, जिसे समाज, बाजार और सत्ता समय-समय पर परिभाषित करते रहते हैं।

आज हम जिस “नैतिक धुंध” की बात करते हैं, वह वास्तव में स्मृति-भ्रंश का ही आधुनिक रूप है, क्योंकि जब मनुष्य को यह याद नहीं रहता कि उसका कर्म किस धर्म से जुड़ा है, तब वह परिणामों को ही सत्य मानने लगता है, और साधनों को गौण समझने लगता है। गीता का यह दृष्टिकोण अत्यंत सूक्ष्म है, क्योंकि वह नैतिक पतन को किसी बाहरी शत्रु या सामाजिक संरचना पर नहीं थोपती, बल्कि उसे आंतरिक विस्मृति का परिणाम मानती है, और यही कारण है कि गीता का समाधान भी बाहरी नियंत्रण नहीं, बल्कि आंतरिक स्मरण है।

आधुनिक समाज में यह स्मृति-भ्रंश कई रूपों में दिखाई देता है: उदाहरणार्थ, शिक्षा में जब ज्ञान को केवल कौशल में बदल दिया जाता है, राजनीति में जब नैतिकता को रणनीति से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है, व्यापार में जब लाभ को उद्देश्य बना दिया जाता है, और व्यक्तिगत जीवन में जब पहचान को प्रदर्शन से जोड़ दिया जाता है। इन सभी स्थितियों में समस्या अज्ञान नहीं है, बल्कि विस्मरण है।

गीता यह नहीं कहती कि मनुष्य को नई परिस्थितियों के अनुसार बदलना नहीं चाहिए, बल्कि वह यह कहती है कि परिवर्तन के बीच भी स्मृति का एक केंद्र बना रहना चाहिए, क्योंकि बिना स्मृति के परिवर्तन प्रगति नहीं, भटकाव बन जाता है। जब व्यक्ति को यह याद नहीं रहता कि उसकी आंतरिक पहचान क्या है, तब वह बाहरी उपलब्धियों में स्वयं को खोजने लगता है: पेशा, विचारधारा, सामाजिक मान्यता, डिजिटल छवि और जब ये बदलते हैं, तो भीतर अस्थिरता बढ़ती जाती है।

गीता की स्मृति केवल अतीत की ओर देखने की सलाह नहीं देती, बल्कि वह वर्तमान को सही ढंग से जीने की क्षमता देती है, क्योंकि स्मृति का अर्थ है अपने मूल मूल्यों को सक्रिय रूप से याद रखना और उन्हें कर्म में उतारना। यह स्मृति कोई ग्रंथों में बंद ज्ञान नहीं है, बल्कि वह जीवित चेतना है, जो हर निर्णय से पहले यह पूछती है कि यह कर्म किस धर्म के अनुरूप है, और यही प्रश्न नैतिकता को जीवंत बनाए रखता है।

जैसे-जैसे यह वर्ष समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, और हम पीछे मुड़कर अपने व्यक्तिगत और सामूहिक निर्णयों को देखते हैं, तब शायद गीता का स्मृति-भ्रंश का विचार हमें आत्ममंथन का एक दुर्लभ अवसर देता है, क्योंकि यह हमें यह पूछने का साहस देता है कि हमने कहाँ केवल भूल नहीं की, बल्कि क्या हमने कहीं अपने मूल मूल्यों को भी भुला दिया।

शायद नए वर्ष में सबसे बड़ा संकल्प और अधिक करने का नहीं, बल्कि और अधिक स्मरण करने का होना चाहिए। यह स्मरण कि हम कौन हैं, हमारा धर्म क्या है, और हमारे कर्म किस दिशा में जाने चाहिए। क्योंकि गीता हमें यह स्पष्ट रूप से याद दिलाती है कि पतन अचानक नहीं होता, वह धीरे-धीरे स्मृति के क्षरण से शुरू होता है, और उत्थान भी अचानक नहीं होता, वह उसी स्मृति को फिर से जागृत करने से आरंभ होता है। और शायद इस वर्ष के अंत में, जब सब कुछ तेज़ी से बदल रहा है, तब सबसे क्रांतिकारी कर्म यही हो सकता है स्मरण।

(लेखक आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।)
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