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हनी बैजर की सर्दियों का सफर: निडरता, धैर्य और जीवटता का संगम
सार
अगर आप इसके नाम से इसकी कल्पना करेंगे तो सोचकर लगेगा मानो कितना छोटा सा रंग बिरंगा और प्यारा सा कोई जानवर होगा मगर इसकी विशेषताएं हमारी कल्पना से बिलकुल परे हैं। लोग अक्सर इसकी तुलना जंगली भालू या पांडा से करते हैं क्योंकि दूर से देखने में ये हूबहू भालू जैसा ही दिखता हैं, लेकिन ये भालू की तरह विशाल नहीं बल्कि छोटे होते है।
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हनी बैजर
- फोटो : Indian Honey Badger Camera trap _ Vickey Chauhan and Indian Honey Badger _ CT Cooper
विस्तार
सर्दियों का मौसम आते ही हम सब अपने घरों की रजाइयों में दुबक के बैठ जाते हैं। लेकिन ज़रा सोचिये, हमारी पृथ्वी पर कितने सारे जीव जंतु हैं जो इस कड़ाके की ठण्ड में अपना जीवन व्यापन करते हैं, जहां कुछ जानवर इस ठण्ड में प्रवास पर जाने का निर्णय लेते हैं तो वहीँ कुछ शीतनिद्रा को अपना सर्दियों का साथी बना लेते हैं। तो आज एक ऐसे ही जानवर की बात करते हैं जिसे शायद हम में से कुछ मुट्ठी भर लोगों ने ही देखा या इसके बारे में सुना होगा। और क्या आपको पता है इसकी सबसे अनोखी बात के बारे में?
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इसे गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने "दुनिया का सबसे निडर जानवर”के खिताब से नवाज़ा हैं। क्यूंकि ये बड़े से बड़े खूंखार जानवर का डट कर सामना करते है फिर चाहे वो शेर हो या जंगली भैंस। इसका नाम है हनी बैजर और आज हम बात करेंगे भारतीय हनी बैजर की जिसे रैटल के नाम से भी जाना जाता हैं।
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अगर आप इसके नाम से इसकी कल्पना करेंगे तो सोचकर लगेगा मानो कितना छोटा सा रंग बिरंगा और प्यारा सा कोई जानवर होगा मगर इसकी विशेषताएं हमारी कल्पना से बिलकुल परे हैं। लोग अक्सर इसकी तुलना जंगली भालू या पांडा से करते हैं क्योंकि दूर से देखने में ये हूबहू भालू जैसा ही दिखता हैं, लेकिन ये भालू की तरह विशाल नहीं बल्कि छोटे होते है।
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वैसे आमतौर पर एक नर हनी बैजर का वजन तकरीबन 10 से 20 किलो तक होता है तो वहीँ मादा का वजन 5 से 10 किलो। इनके शरीर की ऊपर की तरफ स्लेटी रंग की चौड़ी सी धरी होती है जो इनके सर के ऊपर से होती हुई इनकी पूंछ तक जाती है। छोटा कद और मजबूत पैर, इसे सहनशक्ति का जानवर बनाते हैं न की गति का।
अब मन में ये सवाल भी आता हैं की जब ये दिखने में इतने खूंखार हैं तो इन्हें हनी बैजर क्यों कहा जाता है और आखिर इनका शहद से रिश्ता क्या है? दरहसल इन सर्वाहारी जीवों का नाम शहद और मधुमक्खी के लार्वा को खाने के शौक के कारण पड़ा है।
ये मधुमक्खियों के डंक के जोखिम के बावजूद, शहद और लार्वा खाने के लिए बहादुरी से मधुमक्खियों के छत्ते पर हमला करने के लिए जाने जाते हैं और इनकी त्वचा रबड़ जैसे लचीली होने की वजह से इन्हे मधुमक्खियों के डंक से भी कोई क्षति नहीं पहुँचती है। ये कीड़े, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारियों के साथ-साथ जड़ें, बल्ब, जामुन और फल भी खाते हैं।
भारतीय हनी बेजर (रैटल), भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका सहित पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाते हैं। वे आम तौर पर घास के मैदानों, जंगलों और झाड़ियों सहित कई प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं।
भारत में, भारतीय रैटल पश्चिमी घाट, हिमालय, दक्कन पठार और थार रेगिस्तान सहित कई क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं। वे कई वन्यजीव अभ्यारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में भी मौजूद हैं, जिनमें बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और सरिस्का टाइगर रिजर्व शामिल हैं।
शीतनिद्रा या प्रवास: दोनों में क्या हैं खास
बेजर अन्य जानवरों की तरह सर्दियों में हाइबरनेशन यानी शीतनिद्रा में नहीं जाते। हालांकि, वे अपनी गतिविधियाँ कम जरुर कर देते हैं और भूमिगत सुरंगों में रहते हैं, जो उन्हें कड़ाके की ठंड से बचाने और गर्म रखने में काफी मदद करती हैं। ठंड का मौसम इन बैजर्स के स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं होता, इसलिए वे पतझड़ के मौसम में भोजन का भंडार जमा कर लेते हैं और सर्दियों में ज्यादातर समय सोकर बिताना पसंद करते हैं।
बेजर के हाइबरनेट न करने का मुख्य कारण यह भी है कि उनके पास पर्याप्त भोजन और कठोर सर्दियों में रहने के लिए सुरक्षित मांदें या गुफाएं होती हैं। क्यूंकि ये खुदाई में बहुत कुशल होते हैं जो की ये अपने पैर और हाथ के पंजो की मदद से बड़ी आसानी से कर कर पाते हैं। इसीलिए वे इन जगहों पर रहकर अपने शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा करके ठंड का सामना करते हैं। सर्दियों में वे अपनी गतिविधियों को बहुत कम कर देते हैं और अधिकांश समय एक या दो मांदों में बिताते हैं।
सर्दियों में इनका चयापचय (मेटाबोलिज्म) धीमा हो जाता है और वे टॉरपोर प्रक्रिया (टॉरपोर एक गहरी नींद है जिसका उपयोग जानवर अपनी चयापचय दर, हृदय गति और शरीर के तापमान को कम करके ऊर्जा बचाने के लिए करते हैं) से अपनी हृदय गति और तापमान कम कर लेते हैं। उनका आहार भी बदल जाता है।
सर्दियों में वे बीज, नट्स, पौधे, और जामुन खाते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बेजर सेब और मक्का भी खाते हैं। वसंत के आगमन के साथ बेजर की गतिविधियों में तेजी आ जाती है। मार्च और अप्रैल में वे शिकार और भोजन जुटाने के अपने पुराने तरीके पर लौटते हैं। जून और जुलाई तक उनकी गतिविधियाँ चरम पर होती हैं और गर्मियों के अंत तक वे प्रजनन प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं।
हनी बैजर का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और विवेक के साथ डटकर सामना किया जा सकता है। उनकी अनोखी आदतें और सर्दियों को पार करने की रणनीतियाँ न केवल उनकी सहनशक्ति और जीवटता का प्रमाण हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि प्रकृति में हर जीव के पास चुनौतियों से निपटने का एक अनूठा तरीका होता है। यह प्रेरणा देता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न हों, सही दृष्टिकोण और तैयारी से उन्हें पार किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।