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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: विजया मेहता- नाटक से फिल्म और फिल्म से नाटक

Tue, 14 Jan 2025 05:23 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Tue, 14 Jan 2025 05:23 PM IST
सार

सत्तर-अस्सी का समय समानांतर सिनेमा का था। ऐसी फिल्में यथार्थ पर आधारित होती और किसी मुद्दे के आसपास चलती थीं। विजया मेहता इसी समानांतर फिल्मों की प्रणेताओं में से एक थीं। विजया मेहता बहुत पहले से फिल्म तथा नाटकों में अभिनय कर रहीं थीं।

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history of indian cinema Vijaya Mehta Indian film director
सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik.com

विस्तार

प्रबुद्ध महिला और गहरी राजनैतिक समझ रखने वाली फिल्म निर्देशक विजया जयवंत का जन्म 4 नवम्बर 1934 को वडोदरा में हुआ, शिक्षा मुंबई विश्वविद्यालय में हुई। बहुत कम लोग जानते हैं कि विजया मेहता फिल्म अभिनेत्री दुर्गा खोटे के बेटे हरिण खोटे की पत्नी थीं। 27 वर्ष की आयु में वे विधवा हो गई, इस शादी से उनके दो बच्चे, रवि खोटे एवं देवेन खोटे हैं। उन्होंने दूसरी शादी फारुख मेहता से की। इस शादी से उनकी बेटी अनहिता ओबेराय है। विजया मेहता का पुकारू नाम बाई है।

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सत्तर-अस्सी का समय समानांतर सिनेमा का था। ऐसी फिल्में यथार्थ पर आधारित होती और किसी मुद्दे के आसपास चलती थीं। विजया मेहता इसी समानांतर फिल्मों की प्रणेताओं में से एक थीं। विजया मेहता बहुत पहले से फिल्म तथा नाटकों में अभिनय कर रहीं थीं।
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‘पार्टी’ फिल्म में विजया मेहता ने विधवा दमयंती राणे का किरदार निभाया है। यह स्त्री बंबई के मध्यवर्गीय कलाकारों-लेखकों की सहायता करती है। उसने प्रसिद्ध नाटककार दिवाकर बर्वे (मनोहर सिंह) के सम्मान में पार्टी दी है। पार्टी में लेखक, नाटककार, पत्रकार, मंच के वर्तमान-पूर्व अभिनेता सब जुटे हैं, खाने-पीने के साथ बहस चल रही है, आदर्श की बातें की जा रही हैं, खूब नुक्ताचीनी हो रही है।

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1984 की फिल्म ‘पार्टी’

गोविंद निहलाणी की 1984 की फिल्म ‘पार्टी’ (महेश एल्कुंचवार के नाटक पर आधारित) में अभिनय के लिए विजया मेहता को एशिया पैसेफिक पुरस्कार भी मिला। इसी फिल्म के लिए सहायक अभिनेता का रजत कमल रोहिणी हटंगड़ी को मिला। दीपा साही, इला अरुण अन्य अभिनेता हैं। वसंत देव एवं  सत्यदेव दुबे के सहयोग से महेश एल्कुंचवार ने स्क्रीनप्ले बनाया है। कैमरा स्वयं गोविंद निहलाणी ने संभाला है और रेणु सलूजा का संपादन है।


‘पार्टी’ को एनएफडीसी ने रिस्टोर किया है और इसका डीवीडी संस्करण भी बना है। मध्यवर्ग के पाखंड को दिखाती इस फिल्म को गोविंद निहलाणी की सर्वोत्तम फिल्म में गिना जाता है। इसके पहले विजया मेहता ने श्याम बेनेगल की फिल्म ‘कलियुग’ (1981) में देवकी की भूमिका की है।

1985 में सबसे पहले उन्होंने मराठी में ‘स्मृति चित्रे’ बनाई। यह फिल्म मानवीय अंतर्संबंधों को दर्शाती है। दो घंटे से कुछ मिनट ऊपर की उनकी दूसरी फिल्म ‘राव साहेब’ (1986) की भी खूब चर्चा रही। इस फिल्म को मैनहेम फिल्मोत्सव में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का सम्मान मिला था। फिल्म ‘राव साहेब’ जयंत दलवी के मराठी नाटक ‘बैरिस्टर’ पर आधारित है, बाद में विजया ने इस नाटक का भी निर्देशित किया। विधवा विवाह भारत में बहुत पहले से होने लगा था, पर बीसवीं सदी में भी इसे सामाजिक मान्यता नहीं प्राप्त थी।

विजया मेहता इसी कथानक को ‘राव साहेब’ में उठाती हैं। बीसवीं सदी के प्रारंभिक काल के उन महाराष्ट्रियन सुशिक्षित नौजवानों की मनोवृति का इस फिल्म में चित्रण है, जो विदेश जाकर, पढ़-लिख कर खुद को आधुनिक समझने लगते हैं। ये युवा रूढ़ परम्पराओं का बौद्धिक रूप से विरोध करते हैं, लेकिन इन्हीं मान्यताओं को अपने व्यवहार में नहीं उतार पाते हैं। 

महाराष्ट्र के एक छोटे से स्थान के राव साहेब विदेश से बैरिस्टर बन कर लौटे हैं। उनकी हवेली में रहने वाला भाऊराव राधक्का को विवाह करके लाता है। हवेली में राव साहेब की विधवा मौसी भी उनके साथ रहती हैं। एक दिन भाऊराव बीमार पड़ कर मर जाता है। मौसी वैधव्य के दु:ख को भोग रही थीं, वे चाहती हैं कि राधक्का का फिर से विवाह हो जाए।

राव साहेब भी चाहते हैं, राधक्का का विवाह हो जाए। वे उसे चाहते भी हैं, मौसी को उनके मन की बात पता है, वे चाहती हैं, दोनों का विवाह हो जाए, लेकिन राव साहेब सरेआम विधवा से विवाह की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। फिल्म की मूल भावना को गहरा बनाता फिल्म का संगीत भास्कर चंद्रावरकर का है। अनुपम खेर, विजया मेहता, चंद्रकांत गोखले, अरविंद गाडगिल, तन्वी आजमी, नीलू फुले का सशक्त अभिनय फिल्म में जान डालता है।

history of indian cinema Vijaya Mehta Indian film director
भारतीय सिनेमा - फोटो : Adobe Stock

फिल्म ‘पेस्तनजी’

विजया मेहता की नसरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, शबाना आजमी, फारुख मेहता, किरण खेर अभिनीत, कॉमेडी-ड्रामा फिल्म 1988 ‘पेस्तनजी’ इनकी तीसरी फीचर फिल्म थी। जिसे आज तक पारसी जीवन के आधिकारिक चित्रण के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यह फिल्म बंबई के पारसी समाज की जिंदगी को विभिन्न नजरिए से दिखाती है। वनराज भाटिया के संगीत से सजी, रेणु सलूजा की संपादित फिल्म में फिरोज शाह और पेस्तनजी दो मित्र हैं।

पेस्तनजी जीरू से शादी करता है, लेकिन उसे अपना नहीं पाता है, क्योंकि जीरू ने हंसी-हंसी में बताया था कि वह ऑस्ट्रेलिया में एक लड़के से प्यार करती थी, एक दुर्घटना में उस लड़के की मौत हो गई, अंतत: जीरू को भारत आना पड़ा। पेस्तनजी को लगता है कि वह ठगा गया है। मानवीय जिजीविषा को दिखाती यह फिल्म बी. के. करंजिया की कहानी पर बनी थी, उन्होंने ही इसकी पटकथा लिखी थी। यह अकेले छूट जाने वालों, जैसाकि अक्सर पारसी समाज में देखा जाता है, की भी कहानी है। फिल्म को हिन्दी की सर्वोत्तम फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

विजया मेहता ने सदा पुरुषों के साथ, उनके क्षेत्र में काम किया पर कभी दिक्कत न आई। वे खुद को महत्वपूर्ण निर्देशक कहलाना पसंद करती हैं, स्त्री-निर्देशक नहीं। उनके अनुसार औरतें पुरुषों से भिन्न होती हैं। दोनों का काम करने का तरीका, नजरिया अलग होता है। वे महाराष्ट्र से आती हैं और मानती हैं, वहां स्त्रियों को सदैव प्रेरित किया जाता है।

उन्हें अपने परिवार से बहुत सहयोग मिला है। उन्हें नाटक को फिल्म में कलात्मक रूप से रूपांतरित करने में बहुत मजा आता है। इसके लिए वे खूब रिसर्च करती हैं। शुरू से उनका मान-सम्मान रहा है, इसलिए उन्हें फाइनेंसर के पास कभी नहीं जाना पड़ा, न नाटकों केलिए और न ही फिल्मों केलिए। टीवी कार्य केलिए रोनी स्क्रूवाला उनके फाइनेंसर थे। आर्थिक मामलों में वे खुद को अनाड़ी मानती हैं।

फिल्म उन्हें रोमांचित करती है, पर नाटक उनकी पहली पसंद है। मनुष्य का सम्मान करने वाली विजया मेहता आदमी-औरत के सूक्ष्म अच्छे-बुरे संबंधों पर काम करना पसंद करती हैं।

स्वयं को लेखक न मानने वाली विजया मेहता ने ‘शाकुंतलम’ तथा ‘वादिचोरियन’ जैसी कई टेली फिल्में भी दूरदर्शन के लिए निर्देशित कीं। ‘बैरिस्टर’, ‘हवेली बुलंद थी’, ‘लाइअफ्लाइन’, ‘पुरुष’, ‘हमीदाबाई की कोठी’ जैसे नाटकों के लिए जानी जाती हैं। 

नाना पाटेकार, विक्रम गोखले की पथप्रदर्शक, पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी, महाराष्ट्र गौरव, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अस्सी पार वर्ष की उम्र में सौम्य-शालीन, खुशमिजाज, शाहीन व्यक्तित्व की मालकिन सुंदर  विजया मेहता खूब सक्रिय है। आयु के साथ-साथ सौंदर्य-वृद्धि इंगित करती है कि उन्होंने जीवन में कुछ सार्थक किया है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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