फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   harmful effects of pesticides used in india for agriculture laws and regulations in india

कीटनाशकों के प्रयोग और लचर कानून से खतरे में है देश का स्वास्थ्य

Thu, 25 Jul 2019 01:00 PM IST
Gautam Chaudhary गौतम चौधरी
Updated Thu, 25 Jul 2019 01:00 PM IST
विज्ञापन
harmful effects of pesticides used in india for agriculture laws and regulations in india
कीटनाशकों के दुष्प्रभावों को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा होती रही है। - फोटो : फाइल फोटो

विगत् दिनों एंडोसल्फान नामक कीटनाशक एक बार फिर तब चर्चा में आया जब बिहार के मुजफ्फरपुर में अचानक 200 से अधिक बच्चों की मौत एक खास प्रकार की बुखार के कारण हुई। इस मामले में आरोप लगाया गया कि मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का सबसे बड़ा कारण लीची है और लीची खाने के कारण ही बच्चे बीमार पड़े और तकरीबन 200 से अधिक बच्चों की मौत हो गई।

विज्ञापन


एक शोध ने भी किए कई खुलासे 
इस मामले में बांग्लादेशी वैज्ञानिकों ने लीची खाने से मरने वाले बच्चों पर एक शोध किया था। उस शोध में जो बातें सामने आई वह चौंकाने वाली थी। बांग्लादेशी वैज्ञानिकों का दावा है कि लीची की खेती के लिए प्रतिबंधित एंडोसल्फान समेत कई अन्य कीटनाशकों का प्रयोग होता है, जो स्वास्थ्य के दृष्टि से बहुत खतरनाक है।
विज्ञापन


चूंकी इस इलाके में गरीबी ज्यादा है इसलिए बच्चे बागानों में से लीचियों को उठाकर उसे धोए बगैर ही दांतों से छीलकर खा लेते हैं जिसके चलते खतरनाक रसायन उनके शरीर में प्रवेश कर जाते है और वह बच्चों के मौत का कारण बन जाता है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


क्या है यह एंडोसल्फान कीटनाशक? 
2011 में आयोजित ‘‘स्टॉकहोम कंनवेंशन ऑन परसिस्टमेंट आर्गेनिक पॉल्यूटेंट्स’’ पर हुई बैठक में भारत ने एंडोसल्फान के निर्यात् पर प्रतिबंध लगाने में अपनी सहमति जताई थी। संयुक्त राज्य, यूरोपीय संघ सहित दुनिया के 80 देशों ने इस रसायन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा रखा है।

इधर, भारत की सहमति के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आठ हफ्तों के लिए इस रसायन के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो अभी भी जारी है, लेकिन अब इसके निर्यात् पर से प्रतिबंध हटा लिया गया है। बावजूद इसके चोरी-छिपे इस रसायन का उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है।

harmful effects of pesticides used in india for agriculture laws and regulations in india
भारत में भी हर्बीसाइड टॉलरेंट फसलों की गैरकानूनी खेती बढ़ने से ग्लाइफोसेट के प्रयोग में बढ़ोतरी आई है। - फोटो : फाइल फोटो

भारत में इस कीटनाशक पर पाबंदी की शुरुआत 
केरल में इस कीटनाशक के उपयोग पर सबसे पहले वर्ष 2005 में पाबंदी लगी थी। अकेले केरल में इस रसायन से 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और करीब 4000 से ज्यादा लोग शरीर के किसी हिस्से की अपंगता के शिकार हुए थे। 

दूसरा उदाहरण पंजाब का है। पंजाब के मालवा यानी बठिंडा-फरीदकोट के इलाके में बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है। कपास की खेती के लिए बीटी यानी अनुवांशिक परिवर्तित बीजों का उपयोग किया जाता है। इस बीज से बढ़िया फसल लेने के लिए एंडोसल्फान जैसे कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है। इस इलाके में बड़े पैमाने पर कैंसर के मरीज हैं।

डाॅ. प्यारेलाल गर्ग बताते हैं- जब उनकी टीम ने इलाके का सर्वेक्षण करवाया था तो 56 हजार कैंसर रोगी पाए गए थे, जो अब बढ़कर कम से कम दो लाख पहुंच गए होंगे। डाॅ. गर्ग का कहना है कि मालवा इलाके की जनसंख्या लगभग 50 लाख के करीब होगी जहां दो लाख से अधिक कैंसर के रोगी हैं।

डाॅ. गर्ग का दावा है कि यह बीमारी निःसंदेह रूप से किसानों द्वारा एंडोसल्फान जैसे कीटनाशकों के उपयोग से हुआ है। यह भी बता दें कि बीटी या अनुवांशिक परिवर्तित फसलों में केवल एक प्रकार की समस्या नहीं है। इसके उत्पादन के लिए पूरी तकनीक का उपयोग करना पड़ता है, जिसका अपना एक पैकेज है।

इस पैकेज के कारण इस प्रकार के फसलों का उत्पादन तो हो जाता है, लेकिन इसका असर बेहद खतरनाक होता है। जैसे कैंसर या अन्य प्रकार की बीमारी, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जनहानि हो रही है। 

मामले जो सामने आ रहे हैं 
अभी-अभी हाल ही में सैन फ्रांसिस्को की एक कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दुनिया भर में सबसे अधिक प्रयोग किए जाने वाले राउंडअप हर्बीसाइड (खरपतवार नाशक) के प्रभाव से ड्वेन जॉनसन, जो सैन फ्रांसिस्को के पास के एक स्कूल में ग्राउंडकीपर थे, को लाइलाज कैंसर हुआ हो गया।

न्यायिक समिति ने सजा और क्षतिपूर्ति के रूप में कृषि प्रौद्योगिकी कंपनी मोनसेंटो को आदेश दिया कि वह जॉनसन को 2116 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा दे। बता दें कि राउंडअप मोनसेंटो की कंपनी है। जॉनसन ने अपनी गवाही में कोर्ट से कहा था कि वह हर्बीसाइड का प्रयोग साल में 20-30 बार करते थे और कम से कम दो बार उन्हें रसायन से नहाना पड़ा। फिर 2014 में उन्हें गैर-हॉजकिन लिंफोमा हो गया।

दरअसल, यह एक दुर्लभ कैंसर है। राउंडअप हर्बीसाइड में पड़ने वाला मुख्य रसायन ग्लाइफोसेट है। मनुष्य और पर्यावरण पर इस रसायन के जहरीले प्रभाव की आशंका के चलते सरकारें और अंतरराष्ट्रीय जनस्वास्थ संगठन इस पर अनुसंधान कर रहे हैं।

क्या कहा था भारत स्थित संगठन ने?  
2013 में भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राउंडअप से कैंसर सहित अन्य स्वास्थ्य संबंधी खतरे की गंभीर आशंका है। दो साल बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आइएआरसी ने ग्लाइफोसेट को मनुष्यों के लिए कैंसरकारी बताया। इस दावे के बावजूद मोनसेंटो पर अमेरिका में 5000 के लगभग केस दर्ज हैं जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि राउंडअप से कैंसर होता है। 
 
जॉनसन का मामला ऐसा पहला केस है जिस पर सुनवाई हुई। यह केस विश्वभर में ग्लाइफोसेट के प्रयोग और इससे संबंधित नियामकों को समझने के लिए अच्छा उदाहरण है। बहुत से देशों ने ग्लाइफोसेट और उन हर्बीसाइड को जिनमें इस रसायन का प्रयोग होता है, प्रतिबंधित करने की कोशिश की है।

2013 में अल सल्वाडोर की संसद ने ग्लाइफोसेट वाले कीटनाशकों पर रोक लगा दी। इसके अगले सालों में बेल्जियम, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल ने ग्लाइफोसेट को प्रतिबंधित कर दिया।

फ्रांस में भी इस पर प्रतिबंध के बारे में अच्छी खासी बहस चल रही है। खेतिहर मजदूरों में किडनी के रोगों की वृद्धि के मद्देनजर, श्रीलंका की सरकार ने ग्लाइफोसेट रसायन वाले कीटनाशकों पर आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया गया। भारत में कीटनाशक संबंधी कमजोर नियामक तंत्र और इसके खतरे को पहचानने में सरकार की आनाकानी के चलते, इस रसायन पर गहरी छानबीन नहीं हो सकी है।

आईएआरसी की 2015 के अध्ययन के अनुसार रसायन का असर न होने वाले आनुवांशिक संशोधित फसलों के अस्तित्व में आने के बाद से दुनिया भर में ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल बढ़ा है। भारत में भी इसका प्रयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।

भारत में क्या हो रहे हैं प्रभाव 
खबरों के अनुसार भारत में भी हर्बीसाइड टॉलरेंट फसलों की गैरकानूनी खेती बढ़ने से ग्लाइफोसेट के प्रयोग में बढ़ोतरी आई है। भारत में लागू कीटनाशक नियामकों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। उदाहरण के लिए 2001 में केरल सरकार ने दुनिया भर में व्यापक स्तर पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक इंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन यह स्थाई नहीं रह सका। 

स्टॉकहोम कन्वेंशन में संबंधित पक्षों ने दुनिया भर में कुछेक अपवादों को छोड़कर एंडोसल्फान और इसके अपरूपों के उत्पादन और प्रयोग को खत्म करने के एक प्रस्ताव को पारित किया था। अलबत्ता, यह फैसला भारत पर तभी लागू होगा, जब वह विशेष रूप से इसे मंजूरी दे।

बहरहाल, कन्वेंशन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने चंद अपवादों और वित्तीय सहायता के मुद्दे पर उसकी चिंता दूर किए जाने पर इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। समीक्षा समिति कन्वेंशन में शामिल पक्षों और पर्यवेक्षकों के साथ विचार-विमर्श कर एंडोसल्फान के विकल्प सुझाएगी, ऐसा तय हुआ। कन्वेंशन विकासशील देशों को एंडोसल्फान का विकल्प अपनाने के लिए वित्तीय मदद भी देगा, यह भी तय किया गया। प्रस्ताव में कुल 22 फसलों के लिए छूट प्रदान की गई थी, जिनमें कपास, जूट, कॉफी, चाय, तंबाकू, टमाटर, प्याज, आलू, मिर्च, सेब, आम, चना, धान, गेहूं, सरसों, मूंगफली आदि शामिल हैं।

भारत में प्रतिबंध के प्रयास कैसे हुए
आपको बता दें कि कीटनाशक एंडोसल्फान पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ के आह्वान पर हड़ताल की गई थी। हड़ताल का आयोजन प्रतिबंध को लेकर केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया गया था, लेकिन सरकार ने इस दिशा में लचीला कानून बनाया और आज भी यह खतरनाक राशायन बिक रहा है और इसका उपयोग हो रहा है।

बी. एस. येदयुरप्पा के नेतृत्व वाली कर्नाटक की भाजपा सरकार ने भी केरल सरकार के इस प्रस्ताव का समर्थन किया था और एंडोसल्फान पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। केरल के मुख्यमंत्री ने इस मसले पर अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था। 

केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक 18 कीटनाशकों पर रोक लगा दी थी। सरकार की ओर से गठित समिति ने अपनी सिफारिश में इन कीटनाशकों से होने वाले संभावित नुकसान पर प्रकाश डाला था, जिसके बाद केंद्र ने इन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया।

इन कीटनाशकों के इस्तेमाल पर कई देशों ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी है। सरकार ने बेनोमिल, कार्बाराइल, फेनारिमोल, मिथॉक्सी एथाइल मरकरी क्लोराइड, थियोमेटॉन सहित कुल 14 कीटनाशकों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया था, जबकि एलाचलोर, डिचलोरवस, फोरेट और फोस्फामिडॉन देश में 2020 से प्रतिबंधित होंगे, ऐसा तय किया गया था।

कीटनाशकों की समीक्षा के लिए गठित समिति ने इस मुद्दे पर सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसने सिफारिशों में कहा कि ये कीटनाशक लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। विभिन्न स्तरों पर इनका प्रयोग फसल को कैंसर कारक व विषैला बनाता है। इसी वजह से कई देशों ने इनके इस्तेमाल पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखा है। समिति ने कहा कि इन्हें प्रतिबंधित किया जाना ही उचित व्यवस्था होगी।
 

harmful effects of pesticides used in india for agriculture laws and regulations in india
कीटनाशक एंडोसल्फान पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने के लिए हड़ताल भी हुई। - फोटो : अमर उजाला

क्या कहते हैं सरकारी और कोर्ट के आदेश 
केंद्र सरकार द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन कीटनाशकों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है, उनका निर्माण करने वाली कंपनियों को देशभर में मौजूद इन कीटनाशकों का इस्तेमाल रोकने के लिए चेतावनी जारी करनी होगी। उन्हें बाजार से अपना माल वापस लेना होगा। कंपनियों को चेतावनी में स्पष्ट करना होगा कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक होने के मद्देनजर इन कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाए।

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र को इन कीटनाशकों पर जल्द फैसला लेने के लिए कहा था। न्यायालय ने सरकार को दो महीने का वक्त दिया था। इससे पहले महाराष्ट्र में नवंबर 2017 में कीटनाशकों के इस्तेमाल से 50 से भी ज्यादा किसानों की मौत हो गई थी।

हाल में सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया था कि देश में ऐसे 66 कीटनाशकों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जो एक या उससे ज्यादा देशों में प्रतिबंधित हैं। इनमें 28 पर पहले ही रोक लगाई जा चुकी है।

गौरतलब है कि सरकार ने कहा था कि कीटनाशकों के प्रयोग का निर्णय और अनुमति देश की कृषि-पर्यावरण स्थितियों, फसलों के पैटर्न, भौगोलिक, समाजिक-आर्थिक स्थितियों और साक्षरता के स्तरों पर तय की जाती है। सरकार समय-समय पर इस मामले में संज्ञान लेकर कीटनाशकों के प्रभाव पर पुनर्विचार करती है लेकिन सरकारी संचिकाओं में सारी बातें अच्छी ही है, परंतु व्यावहारिक स्तर पर आज भी बड़े पैमाने पर इस प्रकार के घातक और विषैले रासायन का उपयोग हो रहा है, जो देश के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

यही कारण है कि अकेले पंजाब में अब इतने कैंसर पीड़ित हो गए हैं कि उनके लिए कैंसर एक्सप्रेस ट्रेन चलाने की जरूरत पड़ रही है। बिहार की घटना सबके सामने है। हालांकि वहां अभी अनुसंधान चल रहा है लेकिन दावों में दम लगता है कि लीची पर प्रयोग किए गए खतरनाक रसायन के कारण ही बड़े पैमाने पर बच्चों की मौत हुई। इसलिए इस प्रकार के खतरनाक रसायन के उपयोग, व्यापार और निर्यात पर सरकार को मुकम्मल नीति एवं कानून बनाने की जरूरत है। नहीं तो देश की एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।             
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed