विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: जर्मन सिनेमा का उतार-चढ़ाव
प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जर्मन सिनेमा ने खूब तरक्की की और विश्व सिनेमा को परिवर्तित कर दिया। एक सूत्र के अनुसार 27 फ़रवरी 1920 को जर्मन सिनेमा का प्रारंभ माना जाता है, उस दिन रोबर्ट वीनि के दु:स्वप्न जैसी मूक फ़िल्म ‘कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कालिगारी’ का प्रथम प्रदर्शन हुआ था।
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दर्शकों से पैसे लेकर सर्वप्रथम सिनेमा दिखाने का श्रेय लुमियर भाइयों को दिया जाता है। उन्होंने दिसम्बर 1895 में सर्वप्रथम यह करिश्मा किया। पर इससे करीब दो महीने पहले बर्लिन में यह किया जा चुका था। जर्मनी के ‘बायोस्कोप’ के अन्वेषक मैक्स स्क्लाडनोस्की को यह श्रेय नहीं मिलने का प्रमुख कारण है कि यह बायोस्कोप बड़े पैमाने पर प्रयोग के लिए व्यावहारिक नहीं था। इसके बावजूद जल्द ही बर्लिन फ़िल्म उद्योग का केंद्र बन गया। 1905 में बर्लिन शहर में 16 फ़िल्म थियेटर थे।
प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जर्मन सिनेमा ने खूब तरक्की की और विश्व सिनेमा को परिवर्तित कर दिया। एक सूत्र के अनुसार 27 फ़रवरी 1920 को जर्मन सिनेमा का प्रारंभ माना जाता है, उस दिन रोबर्ट वीनि के दु:स्वप्न जैसी मूक फ़िल्म ‘कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कालिगारी’ का प्रथम प्रदर्शन हुआ था। एफ़.ड्ब्ल्यू मुर्नाऊ की फ़िल्म ‘द लास्ट लाफ़’ ऐसी ही फ़िल्म है।
जर्मन फिल्मों की दो प्रमुख धाराएं
इस समय ‘रोमांटिक’ तथा मॉडर्न’ दो धाराएं जर्मनी में पनपीं। रोमांटिक धारा की अधिकांश फ़िल्में रोमांटिक साहित्याधारित थीं। वे रोमांटिक चित्रकारों के कार्य का भी उपयोग करते थे। वे या तो खूबसूरत लोकेशन का उपयोग करते अथवा स्टूडियो में कलात्मक सेट बना कर शूटिंग करते। जैसे कान जैसी आकृति की सीढ़ियां या खूब झुकी हुई बिल्डिंग, छाया-प्रकाश में पेंट की हुई खिड़किया-दरवाजों आदि का प्रयोग करते। डबल एक्सपोजर आदि सिनेमा तकनीकि का भरपूर प्रयोग उनके यहां होता था। अक्सर वे भयंकर-डरावने तत्वों को सिनेमा में डालते थे।
दूसरी ओर मॉडर्न शाखा के फ़िल्मकार नए टॉपिक का उपयोग कर सफल फिल्में बना रहे थे। उनके यहां विकसित होते शहर पर फिल्में बन रही थीं, जैसे, ‘जॉयलेस स्ट्रीट’, लैंग की मूक फ़िल्म ‘मेट्रोपोलिस’, ‘बर्लिन: सिम्फ़नी ऑफ़ ए ग्रेट सिटी’ आदि।
जर्मनी में फ़ासिज्म अपना सिर उठा रहा था जिसने वहां के साहित्य और सिनेमा दोनों को प्रभावित किया। अत: प्रोपेगंडा फ़िल्में भी बनने लगी थीं। फिल्म में राजनीति की घुसपैठ हो रही थी। तकनीकि की प्रगति का असर भी फिल्मों पर था। इस बीच ‘द गर्ल इन द मून’ 1929 में बनी, इसी साल ‘ऑल क्वाएट ऑन द वेस्टर्न फ़्रॉन्ट’ भी आई। हालांकि उस समय ‘मेट्रोपोलिस’ अथा ‘कैबिनेट ऑफ़ डॉक्टर कालिगारी’ को बॉक्स ऑफ़िस पर बहुत सफ़लता नहीं मिली थी।
जल्द ही फ़िल्म उद्योग नाज़ी द्वारा हथिया लिया गया। पूरा सिने-उद्योग ‘मिनिस्ट्री ऑफ़ पब्लिक एंटरटेंनमेंट एंड प्रोपगंडा’ के कब्जे में था, जिसका प्रमुख कुख्यात जोसेफ़ गोइबेल्स था। इसका नतीजा हुआ अधिकांश जर्मन फिल्म निर्देशक जर्मनी छोड़ कर हॉलीवुड पलायन कर गए। करीब 800 अभिनेता, निर्देशक, संगीत बनाने वाले, स्क्रीनप्ले राइटर, आर्किटेक्ट, सिनेमाटोग्राफ़र एवं प्रड्यूसर अपना स्थान छोड़ कर अमेरिका भागे। वहां भी जीवन आसान नहीं था, भाषा की दिक्कत थी।
बिली विल्डर, लैंग, हेनरी कोस्टर, फ़्रेड ज़िनेमान, रॉबर्ट सिओडमैक ऐसे ही निर्देशक थे। बिली विल्डर की मां, सौतेला पिता, ग्रैंडमदर सब यातना शिविर की भट्टी में झोंक दिए गए। अभिनेता पॉल हेनरीड, लिओनिड किन्स्की, नार्शल डालिओ आदि जर्मनी से भाग कर अमेरिका पहुंचे। जर्मन होते हुए भी अपने अंतर की आवाज सुन कर मर्लिन डिट्रिच पहले ही हॉलीवुड पहुंच गई थी।
सेक्स सिंबल मर्लिन डिट्रिच ने 1939 में अमेरिकी नागरिकता ले ली और उसने नाज़ी जर्मनी से प्रलोभन मिलने पर भी नैतिकता के कारण लौटने से इंकार किया। कर्ट गेरोन, ओटो वालबर्ग, पॉल मोर्गन जैसे लोग भाग न सके और उनकी हत्या हुई। पॉल कोह्नर और उसकी पत्नी अभिनेत्री लुपिटा टोवर ने तरह-तरह से सहायता की और कई लोगों को अमेरिका लेकर आए।
द्वितीय विश्वयुद्ध और जर्मन फिल्म उद्योग
द्वितीय विश्वयुद्ध में पराजय के साथ जर्मन फ़िल्म उद्योग का भट्टा बैठ गया। फिर पुनर्निर्माण काल में एक बार पुन: पश्चिमी जर्मनी में फिल्म उद्योग पनपा। वह न केवल पनपा वरन फिल्म निर्माण में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश बन गया, लेकिन 1950 के दशक में पश्चिम जर्मनी में गुणवत्ता की दृष्टि से अच्छी फिल्में नहीं बन रही थीं।
1962 में 26 लेखक एवं फ़िल्म बनाने वालों ने एक मेनिफ़ेस्टो तैयार किया और उन लोगों ने एक फ़िल्म समारोह के दौरान जर्मन सिनेमा की मृत्यु की घोषणा कर एक नए ‘यंग जर्मन सिनेमा’ की मांग की। ये लोग ‘न्यू जर्मन सिनेमा’ (1965) के संस्थापक बने। इस बोर्ड ने सांस्कृतिक बजट तथा वेस्ट जर्मन टेलिविजन नेटवर्क से फंडिंग ली और स्वतंत्र रूप से फ़िल्म का वितरण करने लगे।
इस समय ‘न्यू वेव’ के जनक गोदार की फ़िल्में बनीं। ‘यंग टोरलेस’, ‘दि आर्टिस्ट्स अंडर द बिग टॉप: डिसओरिएंटेड’ इस काल की प्रमुख फ़िल्में हैं। इस आंदोलन से आर ड्ब्ल्यू फ़ासबिंडर, वेर्नर हेर्ज़ोग, विम वेंडर्स तीन बड़े फ़िल्म निर्देशक उभरे। सबसे अधिक फ़िल्में – 40 फ़ीचर फिल्में फ़ासबिंडर ने बनाईं। उसने सर्वाधिक चमकीली फ़िल्में बनाईं जिनका अंत या तो हत्या अथवा आत्महत्या में होता है। ‘व्हाई डज हर आर रन अमोक?’, ‘द बिटर टीयर्स ऑफ़ पेट्रा वोन कांट’, ‘अली: फ़ीयर ईट्स द सोल’, ‘द मैरिज ऑफ़ मारिया ब्राउन’ ‘लोला’ आदि उसकी कुछ फ़िल्मों के नाम हैं।
हेरज़ोग की फ़िल्में सामाजिक से अधिक आध्यात्मिक और रहस्यवादी होती थीं। ‘अगुरे, द रॉथ ऑफ़ गॉड’, ‘एवरी मैन फ़ॉर हिमसेल्फ़ एंड गॉड एगेंस्ट ऑल’, हॉर्ट ऑफ़ ग्लास’ उसकी कुछ फिल्में हैं। विम वेंडर्स की फ़िल्में पोस्टमॉर्डन होती, वे स्थान के प्रतीक द्वारा अजनबीपन दिखाते हैं। ‘द गोली’ज एंजाइटी एट द पेनाल्टी किक’, ‘इन द कोर्स ऑफ़ टाइम’, ‘किंग्स ऑफ़ द रोड’ आदि उनकी कुछ फिल्में हैं। वे आधुनिक समाज में जड़ों से उखड़ना तथा विस्थापन को दिखाते हैं।
स्टेट सबस्डी के कारण खूब फिल्में बनने लगीं, स्त्री और अल्पसंख्यक भी सिनेमा बनाने लगे। मगर हेरज़ोग, विम वेंडर्स तथा फ़ासबिंडर के अलावा किसी को बहुत दर्शक न मिले। अभी भी अधिकांश जर्मन निर्देशक, प्रड्यूसर एवं अभिनेता हॉलीवुड में अधिक सफ़ल थे। हॉलीवुड आज जो है उसमें इन जर्मन का बड़ा योगदान है। जर्मनी से लेकर हॉलीवुड ने साउंड सिस्टम, लाइटिंग, स्टोरीटेलिंग तथा सेट डिजाइनिंग आदि तकनीक को अपने यहाँ स्थापित किया।
‘द गोल्डेन बेयर’
बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिए जाने वाला ‘द गोल्डेन बेयर’ पहली बार 1951 में दिया गया और इसे ऑस्कर के बराबर माना गया। इस पुरस्कार ने दुनिया का ध्यान जर्मन फ़िल्मों की ओर आकृष्ट किया।
‘रन लोला रन’ (1998), फ़नी गेम्स (1997) पिछली सदी की जर्मनी में बनी प्रसिद्ध फ़िल्में हैं। इस सदी अर्थात 21वीं सदी में जर्मनी में अब तक कई फिल्में बनी हैं, जिनमें से 2001 में ‘नोव्हेयर इन अफ़्रीका’, ‘दि एक्सपेरिमेंट’, 2003 में ‘गुड बाय लेनिन’, 2004 में ‘बिफ़ोर द फ़ॉल’, ‘डाउनफ़ॉल’, 2005 में ‘सोफ़ी स्कोल: द फ़ाइनल डेज’, 2006 में ‘फ़ोर मिनट्स’, ‘ए फ़्रैंड ऑफ़ माइन’, ‘ग्रेव डिसीजन’, ‘द लाइव्स ऑफ़ अदर’, 2008 में ‘द वेव’, ‘चेरी ब्लॉसम्स’, 2009 में ‘द व्हाइट रिबन’, 2010 में विन्सेंट वान्ट्स टू सी’, 2011 में ‘वुन्डरकिंडर’, ‘ब्रीदिंग’, ‘ए फ़ैमिली ऑफ़ थ्री’, 2012 में ‘ए कॉफ़ी इन बर्लिन’ फ़िल्में बनी और प्रसिद्ध हुईं। अभी जर्मनी के सिनेमा से काफ़ी उम्मीदें हैं।
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