इसलिए कश्मीर पर भारत के साथ आए ट्रंप, नई मुश्किल में पाकिस्तान
जी 7 की बैठक में सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप के ही सुर नहीं बदले थे, बल्कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुर भी बदले हुए थे। ट्रंप जहां कश्मीर की मध्यस्थता के पहले दिए ब्यानों से पलटी मार गए, वहीं भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रति नरम रुख का संकेत दिए।
ट्रंप की भाषा ईरान और चीन के प्रति भी फ्रांस में बदली हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की बैठक जी-7 की बैठक से अलग भी हुई। दोनों नेताओं ने विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। बातचीत के दौरान कश्मीर का मसला भी सामने आया।
निश्चित तौर पर कश्मीर का मामला उठाने की तैयारी ट्रंप पहले ही कर चुके थे, क्योंकि वो वर्तमान में किसी भी कीमत पर पाकिस्तानी सता प्रतिष्ठान को नजर अंदाज नहीं कर सकते। जाहिर है अफगानिस्तान की शांति वार्ता की सफलता की चाभी पाकिस्तान के हाथों में है। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री ने भी कुछ अच्छे संकेत दिए।
खासकर पाकिस्तान को लेकर उनके दिए गए बयान से साफ है कि भारतीय प्रधानमंत्री पाकिस्तान से बातचीत को लेकर तैयार है, वो शांतिपूर्वक सामाधान के इच्छुक हैं। हालांकि पाकिस्तान की तरफ से उग्र बयानबाजी जारी है। लेकिन समय के साथ पाकिस्तान के रुख में भी बदलाव के संकेत मिलेंगे, क्योंकि यही क्षेत्रीय शांति के लिए जरूरी है। इसी में पाकिस्तान का भी भला है।
क्या अपने स्टैंड पर कायम रहेंगे ट्रंप ?
खबरों के मुताबिक ट्रंप और मोदी के बीच 40 मिनट तक बातचीत हुई। ट्रंप ने अपने पहले के स्टैंड को बदला और कहा कि दोनों मुल्क आपस में मिलकर मामले की हल निकाल लेंगे। ट्रंप के अनुसार मोदी ने ने उन्हें बताया कि वे पाकिस्तान से बात कर रहे है, उन्हें भरोसा है कि वह अच्छा करेंगे।
ट्रंप यह भी बताना नहीं भूले कि मोदी और इमरान खान दोनों से अच्छे संबंध हैं। अच्छे संबंधों का हवाला देकर ट्रंप ने इमरान खान के महत्व को बनाए रखा। उन्होंने संकेत यही दिए कि इमरान खान भी उनके लिए मोदी की तरह महत्वपूर्ण हैं। हालांकि अभी भी यही सवाल है कि ट्रंप क्या अपने इस स्टैंड पर कायम रहेंगे। बार-बार स्टैंड बदलने के लिए मशहूर ट्रंप कल क्या करेंगे इसका कुछ नहीं पता।
गौरतलब है कि इससे पहले ट्रंप दो बार कश्मीर मामले पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं। तीसरी बार अमेरिकी प्रशासन ने मध्यस्थता शब्द हटा दिया। उसकी जगह सहयोग शब्द का इस्तेमाल किया। ट्रंप की इस पेशकश के बाद भारत असमंजस की स्थिति में था।
भारत ने कश्मीर पर मध्यस्थता को नकारा, पर पाकिस्तान से बातचीत के संकेत
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को स्पष्ट तौर पर बताया कि कश्मीर पर उन्हें मध्यस्थता स्वीकार नहीं है। हालांकि उन्होंने नरमी के संकेत दिए। शायद वैश्विक परिस्थितियों में नरमी और बातचीत का बेहतर विकल्प ही भारत के पास है। ग्लोबल ट्रेड वॉर और मंदी के संकट ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी हिलाया है। वैसे में सीमा पर तनाव भारत के लिए बहुत अच्छा नहीं है। हालांकि पाकिस्तान की आर्थिक हालात काफी खराब हो चुकी है। लेकिन भारत भी मंदी के शिकार में आ सकता है।
प्रधानमंत्री ने बहुत ही समझदारीपूर्वक कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच कई दिपक्षीय मुद्दे हैं, इसे मिलकर दोनों मुल्क हल कर लेंगे, क्योंकि दोनों मुल्क 1947 से पहले एक थे। दोनों मुल्कों को गरीबी, निरक्षरता और बीमारियों से लड़ना है। मोदी ने बताया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से जब उनकी पहले बातचीत हुई थी को गरीबी, बीमारी और निरक्षरता के साथ मिलकर लड़ने की बात हुई थी।
ट्रंप ने ईऱान को लेकर भी स्टैंड बदला
जी-7 की बैठक के दौरान डोनॉल्ड ट्रंप ने चीन और ईऱान को लेकर भी पुराने स्टैंड को बदला। उन्होंने कहा कि वे ईऱान के राष्ट्रपति से मिलने को तैयार हैं। जल्द ही दोनों के बीच बैठक भी हो सकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने ईऱान और अमेरिका के बीच तनाव को कम करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने जी-7 की बैठक के दौरान ईरानी विदेश मंत्री जवाद जरीफ को बुला लिया। जरीफ भी बिआरित्ज में राजनयिक गतिरोध को तोड़ने के लिए चर्चा करने पहुंचे।
बताया जाता है कि जरीफ को बुलाए जाने को लेकर ट्रंप को पहले बता दिया गया था। ट्रंप ने इस पर सहमति जताई, हालांकि उन्होंने जरीफ से मुलाकात नहीं की। लेकिन ट्रंप ने जो संकेत दिए हैं, उससे स्पष्ट है कि ईऱान के साथ ट्रंप संबंधों को ठीक करने के लिए तैयार हो सकते हैं, उसका एक महत्वपूर्ण कारण है।
अफगानिस्तान शांति वार्ता में ईऱान से तनाव अमेरिका के लिए परेशानी का कारण है। ईऱान की लंबी सीमा अफगानिस्तान के साथ मिलती है, जिस तरह से तालिबान के कमांडर पाकिस्तान के नजदीक है, पिछले चार-पांच सालों में तालिबानी कमांडरों ने ईरान से भी नजदीकी बढ़ाई है, इसलिए ट्रंप को अब ईऱान की अहमियत फिलहाल समझ मे आ रही है।
अफगानिस्तान में शांति के लिए ईऱान और पाकिस्तान दोनों की जरूरत है। दूसरी तरफ ट्रंप सलाना 50 अरब डॉलर के खर्च को बचाना चाहते हैं जो अमेरिका अफगानिस्तान में खर्च कर रहा है। वहीं अमेरिकी दबावों के आगे ईऱान अभी तक नहीं झुका है।
दूसरी तरफ मंदी की शिकार यूरोपीय कंपनियां ईऱानी बाजार को खोना नहीं चाहते हैं। खासकर विमानन और तेल खनन क्षेत्र में सक्रिय यूरोपीय कंपनियां ईऱान में अपने बाजार को बढ़ाने के लिए बैठी हुई हैं। डोनॉल्ड ट्रंप ने फ्रांस में अपने पुराने स्टैंड को बदलते हुए चीनी लीडर शी जिनपिंग को ग्रेट लीडर बताया। उन्होंने यह भी आशा प्रकट की कि जल्द ही दोनों मुल्कों के बीच चल रहे ट्रेड वॉर का कोई न कोई हल निकलेगा। हालांकि दोनों मुल्क एक दूसरे के निर्यात पर लगातार टैरिफ बढ़ा रहे हैं।
कश्मीर पर पाकिस्तान को खास सफलता नहीं
जी-7 की बैठक में कश्मीर को लेकर जो कुछ उम्मीद पाकिस्तान लगाए बैठा था, वो उम्मीद पूरी नहीं हो पाई। पाकिस्तान कश्मीर मामले के अंतराष्ट्रीयकरण की पूरी कोशिश कर रहा है, पर उसे खास सफलता नहीं मिली है। कश्मीर मसले पर सबसे गर्म सहयोग पाकिस्तान को चीन की तरफ से मिला है। लेकिन बीच-बीच में डोनॉल्ड ट्रंप के ब्यानों से पाकिस्तान का मनोबल बढ़ा है।
पाकिस्तान के आग्रह के बाद ही ट्रंप ने कश्मीर मामले में मध्यस्थता की पेशकश कर भारत को परेशानी में डाल दिया था। लेकिन जी-7 की बैठक में फ्रांस पहुंचे ट्रंप बीच का रास्ता निकाल निकल गए। ट्रंप मोदी को भी खुश किया और इमरान खान को भी खुश करने की कोशिश की।
मोदी के सामने कश्मीर का मसला उठा ट्रंप ने इमरान खान को खुश करने की कोशिश की। वहीं कश्मीर मामले को आपसी बातचीत से हल करने की बात कर उन्होंने भारत को भी खुश किया।
दरअसल, पाकिस्तान अमेरिका और चीन दोनों की मजबूरी का फायदा उठाने में लगा है। अमेरिका अफगानिस्तान से निकलना चाहता है, क्योंकि अफगानिस्तान में सलाना 50 अरब डॉलर का खर्च अमेरिका को महंगा पड़ रहा है। लेकिन यह तभी संभव है कि अफगानिस्तान का पड़ोसी पाकिस्तान अमेरिका की मदद करे।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान की आपस में लंबी सीमा है। अफगान तालिबान के कमांडर पाकिस्तानी सेना के इशारे पर नाचते हैं। अफगानिस्तान का दूसरा पड़ोसी ईऱान है, जिसके संबंध अमेरिका से काफी खराब हैं। वैसे में पाकिस्तान की नाराजगी अमेरिका कभी नहीं चाहेगा। इसी का लाभ पाकिस्तान उठाना चाह रहा है।
अफगान शांति वार्ता और कश्मीर सीमा पर तनाव के बहाने लेनदेन में लगा पाकिस्तान
अफगान शांति के बहाने पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को गर्म कर रहा है। यह सीधा लेनदेन का खेल है। पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर की गर्मी के बहाने अफगानिस्तान से भारत को बाहर किया जाए। पाकिस्तान का तर्क है कि पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर भारत की मजबूती पाकिस्तान एक साथ बर्दाश्त नहीं कर सकता है।
अफगान शांति के बहाने पाकिस्तान कुछ आर्थिक सहायता भी हासिल करना चाहता है। पाकिस्तान फाइनांशियल एक्शन टास्क फोर्स से राहत भी चाहता है। इस टास्क फोर्स पर अमेरिकी प्रभाव काफी ज्यादा है। अमेरिका चाहेगा तो पाकिस्तान को राहत मिल जाएगा। टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को आतंकियों पर कार्रवाई के लिए मोहलत दी है।
पाकिस्तान को अब कुछ करके दिखाना है। हालांकि जमीन पर पाकिस्तान आतंकियों के खिलाफ बहुत कुछ नहीं कर पाया है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के आर्थिक हालात में कुछ सुधार नहीं है। सऊदी अरब पहले ही 6 अरब डॉलर की बेलआउट पैकेज की घोषणा कर चुका है। चीन ने भी 2 अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज दिया है।
संयुक्त अरब अमीरात ने भी पाकिस्तान की आर्थिक मदद की है। अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कई शर्तों के साथ पाकिस्तान को 6 अरब डॉलर का बेल आउट पैकेज देने को हरी झंडी दे दी है। लेकिन ये बेलआउट पैकेज पाकिस्तान को कितनी मदद कर पाएगा, यही सवाल है। पाकिस्तान को आर्थिक हालात सुधारने के लिए क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना होगा, आतंकियों पर कार्रवाई करनी होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।