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खुला आकाश: किसान आंदोलनों से गांधी की राह तक.... राकेश रफीक ने किसान आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 04 Oct 2026 08:39 AM IST
सार

दर्शनशास्त्र की पढ़ाई करने के बावजूद राकेश रफीक ने किसान आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई। मार्च 1988 में मुरादाबाद के रजबपुर में किसानों के रास्ता रोको आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग के बाद भी उन्होंने किसानों के बीच काम जारी रखा।

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From farmers movements to path of Gandhi Rakesh Rafiq also played active role in know activism
महात्मा गांधी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

जो लोग जेपी से प्रभावित ‘छात्र संघर्ष वाहिनी’, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भारतीय किसान यूनियन आंदोलन और अन्ना हजारे के जंतर-मंतर आंदोलन को जानते हैं, वे राकेश ‘रफीक’ की भूमिका से भी परिचित होंगे। 27 सितंबर, 2026 को सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों में सक्रिय इस शख्स की धड़कनें वैशाली के मैक्स अस्पताल में थम गईं। अंतिम समय में उनकी पत्नी डॉ. मीनाक्षी, बेटियां डॉ. झरना और पायलट तराना सक्सेना समेत मित्र और संबंधी मौजूद थे।

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8 जून, 1960 को जन्मे राकेश सक्सेना ने रुहेलखंड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए किया और जेएनयू से पीएचडी की। छात्र जीवन में ही वह जयप्रकाश नारायण की ‘छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी’ से जुड़ गए। सांप्रदायिक एकता के लिए उन्होंने युवाओं के बीच हिंदू-मुस्लिम मिश्रित पहचान अपनाने का प्रयोग किया। विजय बहादुर सक्सेना ‘विजय आलम’ बने, जबकि काशिम कसीम आजाद, आसिफ-कमल और रजनीश-असलम जैसे नाम भी सामने आए। दहेज और सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ प्रेम तथा अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने का अभियान ‘वैज्ञानिक विचार केंद्र’ के माध्यम से चलाया गया। मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित रहने के बावजूद लेखन और आंदोलन के दस्तावेजीकरण के दौरान उनका झुकाव गांधीवादी विचारों की ओर हुआ।
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उन्होंने ‘महात्मा गांधी की शिक्षा दृष्टि’, ‘महात्मा गांधी एक शिक्षा दार्शनिक’ और ‘भारतीय राष्ट्रवाद और हमारे राष्ट्र पिता’ जैसी पुस्तकें लिखीं। किसान आंदोलनों में भी राकेश रफीक की सक्रिय भूमिका रही। जनवरी 1988 में मेरठ के सीडीए ग्राउंड में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हुए विशाल किसान धरने के लिए उन्होंने मुरादाबाद क्षेत्र में किसानों को संगठित किया। इससे पहले 1987 के शामली कर्मूखेड़ा बिजलीघर गोलीकांड के बाद किसानों के आंदोलन को उन्होंने नजदीक से समझा। मार्च 1988 में मुरादाबाद के रजबपुर में किसानों के रास्ता रोको आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग के बाद भी उन्होंने किसानों के बीच काम जारी रखा।
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उनका मानना था कि किसान आंदोलन को लोकतांत्रिक स्वरूप दिया जाना चाहिए और उसका संदेश देश भर तक पहुंचना चाहिए। बिलारी में गांधी पार्क और आयुष्मान अस्पताल जैसे स्थानीय मुद्दों पर भी वे जीवन के अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे। राकेश रफीक ने स्वयं अपने जीवन के बारे में कहा था कि सेना में जाने का सपना मेडिकल जांच में रंगांधता के कारण पूरा नहीं हो सका। उन्होंने इसे प्रकृति का आदेश मानकर शोषित-पीड़ित जनता के लिए जीवन समर्पित कर दिया। वे अपने विचारों, लेखन और उनसे जुड़े लोगों के बीच लंबे समय तक जीवित रहेंगे।

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