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फ्लाईदुबई विमान की घटना: क्या अब यात्रियों को पायलटों की धार्मिकता भी तलाशनी होगी?

Fri, 02 Oct 2026 03:10 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Fri, 02 Oct 2026 03:10 PM IST
सार

कैप्टन स्मित ने जिस बहादुरी से अपने कर्तव्य का निर्वाह किया, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस घटना की संभावित तुलना अमेरिका के न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए 9/11 हमले से की है। 

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Flydubai Flight FZ1073 Incident could prompt tighter security procedures during flight
फ्लाईदुबई मामले में नया खुलासा - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

फ्लाईदुबई की दुबई से इजराइल की राजधानी तेल अवीव जा रही उड़ान संख्या FZ1073 में जिस तरह भारतीय मूल के पायलट कैप्टन स्मित मछार ने अपनी जान पर खेलकर विमान के 174 यात्रियों की जान बचाई और उन्हीं के ओमानी को पायलट ने जिस ढंग से स्मित पर खूनी हमला कर विमान को फिदायीन हमले में बदलने की नाकाम कोशिश की, उससे सवाल यह उठ रहा है कि क्या दुनिया में विमान यात्रियों को यात्रा से पहले सम्बन्धित विमान के पायलट के धर्म और धर्मान्धता के बारे में पुख्ता जानकारी हासिल करने के बाद ही यात्रा करनी होगी?

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हालांकि इस हादसे को अपवाद ही मानना चाहिए फिर भी जो हुआ है, वह समूची दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। 

कैप्टन स्मित ने जिस बहादुरी से अपने कर्तव्य का निर्वाह किया, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस घटना की संभावित तुलना अमेरिका के न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए 9/11 हमले से की है। जिसमें चार कट्टरपंथी पायलटों ने यात्रियों से भरे तीन विमानों को विशाल इमारत से टकरा दिया था। उस घटना में विमान यात्रियों सहित 3 हजार से ज्यादा लोग मारे  गए थे।
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धार्मिक और आतंकी एंगल 

फ्लाईदुबई की घटना के पीछे कारणों की जांच अभी जारी है। यूएई पुलिस घटना के धार्मिक और आतंकी एंगल को भी तलाश रही है। लेकिन आरंभिक संकेतों से यही लगता है कि कट्टरपंथी ओमानी को-पायलट इस विमान को गिराकर यहूदियों और इजराइल के प्रति अपनी नफरत का खूनी बदला लेना चाहता था, लेकिन कैप्टन स्मित ने उसकी कुटिल मंशा पर पानी फेर दिया।
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कहा जा रहा है कि इस घटना में दिखाए गए असाधारण साहस और मानवीय संवेदना के लिए कैप्टन स्मित की दुनिया भर में तारीफ हो रही है। यह आंशिक रूप से सही है, क्योंकि इस घटना पर इस्लामिक देशों ने गहरी चुप्पी साध रखी है। को-पायलट की पहचान भी उजागर नहीं जा रही है और न ही जांच के तथ्यों को साझा किया जा रहा है।

इजराइल और अमेरिका को छोड़ दें तो दुनिया में बाकी देशों ने भी खास प्रतिक्रिया अभी तक नहीं दी है। विदेशी मीडिया में जरूर कुछ चर्चा है। इस चुप्पी में छिपी सियासत और धार्मिक आग्रहों को भी समझा जाना चाहिए। जबकि जो घटा है, वह सभी के लिए गंभीर चेतावनी है। इस बीच इजराइल के प्रधानमंत्री ने इस घटना में ईरान का हाथ होने की आशंका जताई है। 

जबाव में ईरान ने भी तुरंत पलटवार करते हुए फ्लाईदुबई हादसे को इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद का कारनामा बता दिया है। जहां तक भारत की बात है कि कैप्टन स्मित भारतीय हैं और इंसानियत के हक में उन्होंने जो काम उन्होंने किया, उसकी सराहना स्वाभाविक ही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी स्मित के साहस की सार्वजनिक रूप से सराहना की। गुजरात सरकार ने इस गुजराती सपूत को गुजरात गरिमा पुरस्कार देने का ऐलान किया।

लेकिन सवाल इससे आगे का है। दुनिया में हर घंटे करोड़ों लोग विमान, रेलवे, जहाज और बसों आदि से यात्राएं करते हैं। इसे अंजाम देने का जिम्मा हजारों पायलटों, लाखों ड्राइवरों पर होता है। यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ढंग से पहुंचाना, उनका पेशेवर और नैतिक कर्तव्य है। और मोटे तौर पर यह काम वे बिना किसी धार्मिक, जातीय अथवा नस्ली भेदभाव के पूरा करते हैं। इसी कारण से लोग बिना यह पूछे अथवा जाने कि सार्वजनिक परिवहन का पायलट/ ड्राइवर कौन  है, किस धर्म या पंथ का, किस नस्ल का या फिर किस देश या प्रांत का है, निश्चिंत भाव से सवार हो जाते हैं। 

कुछ पेशे धार्मिक मान्यताओं और पूर्वाग्रहों से ऊपर

लापरवाही अथवा अन्य किसी कारण हुए हादसे को छोड़ दें तो यह आम वैश्विक विश्वास है कि कोई भी पायलट/ ड्राइवर अपनी धार्मिक मान्यताओं को अलग रखकर अपना पेशागत कर्तव्य पूरा करेगा। पायलट/ ड्राइवर के लिए यह मायने नहीं रखता कि उसकी निजी धार्मिक मान्यताएं या पूर्वाग्रह क्या हैं, वह आस्तिक है या नास्तिक या फिर उसके द्वारा चालित वाहन में सवार यात्रियों की धार्मिक निष्ठाएं और मान्यताएं क्या हैं? हकीकत में पायलट और वाहनचालक होना एक धर्मनिरपेक्ष कर्तव्य है और इसी कारण से करोड़ों लोगों का इस व्यवस्था पर असंदिग्ध भरोसा है।

लेकिन फ्लाईदुबई की घटना ने इस असंदिग्ध भरोसे को डिगा दिया है। ऐसा तो 9/11 के हमले के बाद भी नहीं हुआ था। क्योंकि वो घटना एक व्यापक आंतकी साजिश का हिस्सा थी और विमान चला रहे पायलट आतंकी ही थे। लेकिन ताजा घटना ने इस चिंता को गहराई से रेखांकित किया है कि अगर सामान्य यात्री विमान में भी कोई पायलट अचानक धार्मिक नफरत के वशीभूत होकर खुद की और यात्रियों की जान लेने पर उतारू हो जाए तो क्या किया जाए?

दूसरे, विमान के कॉकपिट के अंदर दो पायलट की भिड़ जाएं तो यात्रियों के पास भगवान का नाम लेने के अलावा क्या उपाय बचता है? 

फ्लाईदुबई की घटना में पायलट स्मित की हिम्मत के साथ साथ बाकी क्रू और यात्रियों के साहस की भी दाद देनी होगी  कि उन्होंने केवल घटना का वीडियो बनाने ( जैसा कि आजकल अमूमन होता है) के बजाए को को-पायलट को धर दबोचा, उससे जूझ रहे पायलट कैप्टन स्मित की मदद की और तेजी से नीचे आ रहे विमान को वापस ऊपर ले जाने और फिर सउदी अरब के तबूक में सुरक्षित लैंडिंग कराने में मदद की।

हालांकि आरोपी को-पायलट द्वारा विमान के कॉकपिट में रखी आपातकालीन  क्रैश कु्ल्हाड़ी से किए हमले में खून से लथपथ कैप्टन स्मित द्वारा आपातकालीन संदेश भेजे जाने के बाद इजराइल ने अपनी बचाव के लिए अपने सैन्य विमान भी भेज दिए थे। 

एक सवाल यह भी है कि इजराइल जाने वाली फ्लाइट में ओमानी को पायलट कैसे पहुंचा? यह भी जांच का विषय है। बहरहाल वो किसी भी तरीके से पहुंचा हो, लेकिन किसी दुश्मन देश का पायलट होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपने यात्रियों की हर हाल में सुरक्षा और भलाई के बुनियादी नैतिक और पेशेवर कर्तव्य को ही भुला दे।

किसी पायलट/ ड्राइवर का धार्मिक होना कोई अपराध नहीं है। सबको अपने धार्मिक विश्वासों के पालन का पूरा अधिकार है। लेकिन उसकी भी एक मर्यादा है। हो सकता है कि ओमानी पायलट जिसका नाम अभी तक उजागर नहीं किया गया है, कट्टर मजहबी हो। 

आरंभिक जांच में यह सामने आया है कि वह कट्टरपंथी मुसलमान है और महिलाओंसे भी हाथ नहीं मिलाता था। यह भी संभव है कि उसके मन में गाजा में इजराइली सेना की ज्यादतियों के कारण यहूदियों के प्रति गहरी नफरत भरी हो, लेकिन उस विद्वेष का बदला लेने का यह तो तरीका नहीं है। दूसरे, बाकी यात्रियों द्वारा उसे बंधक बनाने के बाद वह बार- बार ‘मुझे मार दो’ कह रहा था। इसका मतलब यह कि वह फिदायीन हमले का मानस बनाकर ही विमान के कॉकपिट में बैठा था और प्लेन को गिराने पर आमादा था, जो मंसूबा कैप्टन स्मित की बहादुरी और पेशेवर निष्ठा ने नाकाम कर दिया।   

कैप्टन स्मित की जाबांजी ने जहां भारत और भारतीय पायलटों की पेशेवर निष्ठा, कर्तव्यपरायणता और मानवीय प्रतिबद्धता को गर्व के साथ रेखांकित किया है, वहीं दुनिया भर के पायलटों के लिए भी यह सकारात्मक और गौरवपूर्ण संदेश है कि यात्रियों की सुरक्षा और हर कीमत पर उनकी निर्विघ्न यात्रा हमारा पहला फर्ज है।

हालांकि पिछले कुछ समय से पायलटों के आचरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हाल में एयर इंडिया के पायलटों के नशे में पाए जाने से उड़ान पर जाने से पहले पायलटों की कड़ी जांच जरूरी हो गई है। 

अब फ्लाईदुबई की घटना ने पायलटों की मानसिक जांच और कट्टरपंथी रूझानों की समीक्षा को भी अनिवार्य कर दिया है। इस प्रवृत्ति को सख्ती से रोकना होगा। क्योंकि फ्लाईदुबई में आरोपी को-पायलट कट्टरपंथी ( संभवत: मुसलमान) था और विमान के बहुसंख्य यात्री यहूदी थे। कल को इसका उल्टा भी हो सकता है, तब क्या होगा? क्या तब भी दुनिया के ज्यादातर देश खामोश ही बने रहेंगे?  



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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