विजयादशमी विशेष: आओगे तो तुम भी राम के पास ही
रावण हो या हनुमान, या फिर विभीषण हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है।
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विस्तार
कहानी है कि मंदोदरी गई रावण के पास, बोली, "तुम्हें सीता को पाने की इतनी इच्छा है, तो तुम तो महामायावी हो, जाओ, सीता के पास राम ही बनकर चले जाओ अपनी माया का उपयोग करके। राम बनो, सीता के पास चले जाओ, सीता को पा लो। कैद तो तुमने कर ही रखा है सीता को।"
रावण ने कहा, "पगली, राम का रूप भी धरता हूं, बस ऊपर-ऊपर से राम होने का स्वांग भी करता हूं, तो भी इतनी गहन शांति मिलती है कि उसके बाद कहां छल कर पाऊं?"
रावण कह रहा है कि, "मैं रावण तब तक ही हूं जब तक जबरदस्ती मैंने राम को अपने से दूर रखा है। राम की छाया भी मुझपर पड़ गई तो मैं रावण रहूंगा नहीं न! राम का यदि विचार भी कर लिया मैंने तो मैं रावण रहूंगा नहीं न!"
ऐसे ही हैं हम, और इसीलिए हम राम से बचते हैं, क्योंकि वो जरा भी पास आया तो हम वो नहीं कर पाएंगे जो करने की हमने ठान ली है। राम यदि रावण के पास आ गए तो फिर वो सीता को बंधक नहीं रख पाएगा और अगर तुमने यही ठाना हुआ है कि सीता तो बंधक रहे, तो तुम्हारी विवशता हो जाएगी कि तुम राम से दूरी बनाओ। ये अनिवार्य हो जाएगा तुम्हारे लिए। तुम दोनों काम एक साथ नहीं कर सकते कि सच्चाई के पास भी हो और अपनी भी चला रहे हो। जिन्हें अपनी चलानी है, उन्हें मजबूरन सच्चाई को दूर रखना होगा, ठुकराना होगा।
रावण को पता है कि राम नाम लेते ही, राम की छवि का स्मरण करते ही चित्त शांत हो जाता है, ज्वाला शीतल हो जाती है। तो फिर वो क्यों नहीं राम नाम ले रहा? क्योंकि वो बहुत दूर निकल आया है। आदत बहुत पुरानी हो गई है, बीमारी दुसाध्य हो गई है। तो अब रावण कहता है कि, "मेरे करे नहीं होगा।
मैं तो अब अपनी रावणी इच्छाओं का गुलाम हो गया हूं। वो जान रहा है भलीभांति कि राम ही उसकी नियति हैं। यही बात तो मंदोदरी को दिए वक्तव्य से प्रकट होती है कि जान भली-भांति रहा है कि राम में ही शीतलता है, राम में ही चैन मिलना है, पर ये भी जान रहा है कि अब वो चैन वो अपने हाथों हासिल नहीं कर सकता।
मंजिल भले राम हैं, पर पांव रावण के हो गए हैं, और रावण के हैं पांव जब तक, तब तक वो राम की ओर बढ़ेंगे नहीं। तो रावण की विषम स्थिति है। तो रावण फिर इलाज निकालता है। रावण कहता है कि, "राम को अगर पाना है तो अब ऐसे तो वो मुझे मिलेंगे नहीं कि मैं उनके सामने हाथ जोड़कर चला जाऊं, क्योंकि मैं तो रावण हो गया हूं।"
भीतर बोध का दिया टिमटिमा रहा है, पर बाहर घोर कालिमा। लेकिन दिया तो दिया है फिर भी, और दिया भारी पड़ रहा है। रावण जो कर रहा है, है वो प्रकाश की दिशा में, रावण जा राम की तरफ ही रहा है, पर वो कह रहा है, "अपने पांव नहीं आ पाऊंगा, सीधा रास्ता नहीं इख्तियार कर पाऊंगा"। तो रावण जरा टेढ़ा रास्ता लेता है।
क्या टेढ़ा रास्ता लेता है? वो कहता है कि, "तुम्हारा सामने झुककर नहीं आ पाया तो तीर-कमान लेकर आऊंगा, तुम्हारे सामने भक्त की तरह नहीं आ पाया तो शत्रु की तरह आऊंगा, पर आना तो मुझे तुम्हारे सामने ही है क्योंकि वही नियति है मेरी। हाथ नहीं जोड़ पाया तो तीर मारूंगा।"
पुण्यात्मा-पापात्मा दोनों के राम
समझना इस बात को। पुण्यात्मा, पापी-दोनों का अंत तो एक ही होना है न? क्योंकि अंत तो एक ही हो सकता है। उस अंत का नाम है-परमात्मा। उसी अंत का नाम है-राम। और राम दोनों को आकर्षित करते हैं। राम पुण्यात्मा को और पापात्मा, दोनों को आकर्षित करते हैं। भक्त को कैसे आकर्षित करते हैं? कि भक्त कहता है, "मंदिर है, चलो चलें"। तो भक्त ऐसे आ गया राम की ओर। और पापी कैसे आकर्षित होता है? कि पापी कहता है, "राम हैं, डंडा उठाओ, मारो, गाली दो, मुंह नोच लो, अपशब्द कहो, निंदा करो।"
गौर से देखो कि शत्रुता हो कि मित्रता हो, दोनों ही स्थितियों में तुम शत्रु को और मित्र को याद करते हो। तो भक्त भी राम को याद करता है, और पापी भी राम को याद करता है। अंतर बस इतना है कि पापी का राम को याद करने का तरीका विकृत है, घिनौना है, दुःखदाई है।
तो रावण ने यही तरीका चुना। अपने हाथों तो मिट नहीं पाऊंगा राम तुम्हारे सामने, मैं बड़ा पुराना रावण हो गया, तो अब तुम्हारे सामने मिटने का एक ही तरीका है कि तुम्हें दुश्मन बना लूं और फिर तुम मुझे मिटा दो। ये बात हो सकता है उसने चैतन्य मन से न सोची हो। चैतन्य मन से हो सकता है वो यही सोच रहा हो कि, "तीर मारकर राम को खत्म ही कर देता हूं।" पर चैतन्य मन के नीचे कुछ बैठा है, उसके अपने तरीके हैं, उसके अपने क्रियाकलाप हैं।
तो वो जो नीचे बैठा है, वो रावण को घसीटकर ले गया राम के पास। जाना ही तो था पास, पहुंच गया रावण। हाथ जोड़कर नहीं पहुंचा, हाथ उठाकर पहुंचा, पर पहुंच तो गया ही न? पहुंच गया राम के पास। और फिर कथा ये भी कहती है कि राम के ही हाथों उसका उद्धार भी हो गया। जब उद्धार हो गया तो बड़ा अनुग्रहित हुआ, बोला, "यही तो था, यही तो चाहिए था। तुम्हारे अलावा किसी और के हाथों मौत मिलती तो भटकते ही रहता। भला हुआ राम कि तुमने मारा।"
तो आना तो तुम्हें है ही, दोस्त बनकर नहीं आओगे तो दुश्मन बनकर आओगे। भला होगा अगर तुम दोस्त बनकर ही आ जाओ। जब सत्य दुनिया में कहीं भी हुंकार करता है तो दुनिया दो हिस्सों में बंट जाती है। तगड़ा पोलाराइजेशन (ध्रुवीकरण) होता है: कुछ समर्थक बन जाते हैं, और कुछ घोर विरोधी। उदासीन कोई नहीं रह पाता; इंडिफरेंट आप नहीं रह सकते।
ये सत्य की हुंकार का एक प्रामाणिक लक्षण है। कुछ होंगे जो बिल्कुल उसके भक्त बन जाएंगे, मित्र बन जाएंगे, साथी हो लेंगे और बाकी जितने होंगे वो आरोप लगाएंगे, वार करेंगे, दुश्मन हो लेंगे। ऐसा लगेगा कि जैसे दुनिया दो हिस्सों में बंट गई है, और ऐसा लगेगा कि जैसे वो दोनों हिस्से एक-दूसरे के विरोधी हैं और विपरीत काम कर रहे हैं।
विपरीत नहीं काम कर रहे, दोनों ही हिस्सों में एक ही काम हो रहा है। पहला हिस्सा भी जा रहा है सच के पैगम्बर की ओर। क्या बनकर? मित्र बनकर, भक्त बनकर, श्रद्धालु बनकर। और दूसरा हिस्सा भी तो जा रहा है शत्रु बनकर। जा दोनों ही रहे हैं। काम हो गया।
संत, ऋषि मुस्कुराता है। वो कहता है, "तुम्हारी मर्जी, तुम्हें जैसे आना हो तुम आओ। ये दरवाजा मित्रों के लिए है, वो दरवाजा दुश्मनों के लिए है। तुम किसी भी दरवाजे से घुसो, सामने तो मुझे ही पाओगे। तुम दरवाजा चुनो। हां, ये है कि तुम मित्रता के दरवाजे से आओगे तो तुम्हारे लिए जरा सुविधा रहेगी, तुम शत्रुता के दरवाजे से आओगे तो तुम्हें ही समस्या आएगी।"
सबके हृदय में राम
उस बेचारे की मजबूरी बस इतनी है कि रावण हो कि हनुमान हो कि विभीषण हो, हृदय में तो सबके राम ही होते हैं। हनुमान का ये है कि राम उनके हृदय में भी हैं, और राम उनके जीवन में भी हैं। रावण का ये है कि जीवन तो उसका रावण का है, और दिल उसने राम को दे रखा है। तो फिर वहां पर क्या आ जाता है? विभाजन आ जाता है, द्वंद आ जाता है। चाहते किसी और को हो, और जी किसी और के लिए रहे हो। चाहते हो राम को और जी रहे हो रावण के लिए।
इसीलिए तो हम सब बड़े मूल्यवान हैं क्योंकि हृदय सबके रामनिष्ठ हैं, हृदय सबके राममय हैं। तुम चाहो तो खुद से ही प्यार कर लो, तुम इतने प्यारे हो। हनुमान की तो कथा है कि उन्होंने दिल चीरकर दिखा दिया वहां राम बैठे हुए थे। हनुमान भर के ही नहीं बैठे थे, तुम्हारे भी बैठे हुए हैं। तुम में और हनुमान में अंतर ये है कि हनुमान के हृदय में ही नहीं, हनुमान के मन और जीवन में भी राम थे। इसीलिए हनुमान मौज में थे, आनंद मनाते थे।
तुम्हारे साथ थोड़ी दुर्घटना हो गई है। तुम्हारे हृदय में तो राम हैं, और मन में तुम खुद हो। और न सिर्फ मन में तुम खुद हो, बल्कि तुम्हारा पूरा दावा है और इरादे हैं कि हृदय को बदलकर मानेंगे, हृदय को हराकर मानेंगे। क्योंकि दोनों एक साथ नहीं चल सकते। ये भेद, ये विभाजन चल नहीं सकता। दोनों में से एक को ही बचना होगा, या तो तुम बचोगे या राम बचेंगे।
तुम्हारा इरादा यही है कि राम को हरा दें और पूरा ही कब्जा कर लें, पर तुम्हारा इरादा पूरा होगा नहीं। परिणाम तय है, मैच फिक्स्ड है। क्यों गलत सट्टा लगा रहे हो? यहां पहले ही तय कर दिया गया है कि कौन जीतेगा, तुम गलत पक्ष पर पैसा लगाकर क्यों सब गंवाना चाहते हो? एक ही तरफ लगाओ बाजी। किस तरफ? हृदय की तरफ।
मत नाहक अड़ो, मत व्यर्थ लड़ो, तुम नहीं जीतोगे। कोई नहीं जीता सत्य से, कोई नहीं जीता आत्मा से, कोई नहीं जीता हृदय से, राम से। बात व्यक्तिगत रूप से तुम्हारी भर नहीं है। समय की शुरुआत से आज तक कोई नहीं जीता, तुम ही जीत लोगे? तुम्हारी कमजोरी या दोष नहीं बताया जा रहा कि तुम हार जाओगे क्योंकि तुम निर्बल हो। तुम हारोगे इसलिए क्योंकि जीतना संभव ही नहीं है। कभी कोई नहीं जीता। और तुम अपवाद नहीं हो सकते। कोई अपवाद नहीं हो सकता।
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