ट्रंप और इमरान के बयान का क्या करे हिन्दुस्तान ?
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इमरान ख़ान और डोनाल्ड ट्रंप की शिखर बैठक से पाकिस्तान और अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ। हां अपने देशों में दोनों नेताओं ने बेवजह की मुसीबत मोल ले ली।उत्साह या भावावेश में ट्रंप ने कश्मीर में मध्यस्थता का जुमला उछाल दिया। यह अमेरिका की कश्मीर नीति के ख़िलाफ़ है और उनके देश में ही इसकी तीख़ी आलोचना हो रही है।
भारत की कश्मीर नीति कभी भी परदे में नहीं रही है। हमेशा उसने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का विरोध किया है।भारतीय प्रधानमंत्री का बेवजह नाम घसीटने के कारण ट्रंप के प्रति लोगों में ग़ुस्सा है। इसी तरह इमरान ख़ान ने यह क़बूल किया कि उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले मुल्क़ में 40 आतंकवादी समूह सक्रिय थे। उनकी सरकार ने इन पर काबू पाया है।
इस बयान से पाकिस्तान में बवाल मच गया है।पाकिस्तान बरसों से कहता रहा है कि उसकी ज़मीन का इस्तेमाल आतंकवादी गुट नहीं करते। अब इमरान अपने ही बयान की प्रेत छाया में स्वदेश लौट रहे है। अगर इस शिखर वार्ता की राजनीतिक पड़ताल करनी है तो हालिया दिनों के घटनाक्रम को ध्यान में रखना होगा।
दरअसल इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति कमाल की है। कोई स्थाई सिद्धांत आधारित नीतियां नहीं रहीं हैं।तात्कालिक हितों को देखते हुए भी देश अपनी परदेसी पॉलिसी का मिजाज़ तय करने लगे हैं। अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते भी इसी तरह के हैं।जन्म से ही पाकिस्तान की परवरिश अमेरिका के संरक्षण में होती रही है। हाल के कुछ वर्षों में आतंकवाद को पालने पोसने की खुली नीति और कुछ भारतीय दबाव के चलते पाकिस्तान अलग थलग पड़ गया है। दिवालिया होने की कग़ार पर खड़े इस पड़ोसी के सामने अस्तित्व का संकट है इसलिए यू टर्न प्राइम मिनिस्टर इमरान ख़ान अनगिनत टर्न लेकर अमेरिकी शरण में गए थे।
ट्रंप-इमरान शिखर वार्ता का निष्कर्ष यह है कि दोनों मुल्क़ एक तीर से कई निशाने कर रहे हैं। दरअसल डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारी लेते ही चीन का रौब कम करना उनकी प्राथमिकताओं की सूची में था। इसके लिए एशियाई विराट देशों में हिन्दुस्तान ही उनका सहयोगी हो सकता था। इधर नरेंद्र मोदी और भारत के लिए अमेरिकी आँखों के तारे पाकिस्तान की असलियत उजागर करना बेहद ज़रूरी था।
हिन्दुस्तान से बेहतर संबंध-संतुलन के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान से दूरी बनाकर रखी।उसकी आर्थिक मदद रोकी और हाफ़िज़ सईद को वैश्विक आतंकी घोषित कराने में साथ दिया। मगर पहला कार्यकाल पूरा होने के क़रीब आते आते ट्रंप प्रशासन के भारत के साथ असहमतियों के सुर निकलने लगे। कारोबारी शुल्क लगाने तथा अफगानिस्तान व ईरान के मसले पर ये मतभेद सामने आए। लगने लगा है कि एक बार फिर अमेरिका रंग बदल रहा है।
बरसों से वहां सैनिकों की मौजूदगी से अमेरिकी अवाम में नाराजगी है। सैनिक मारे जा रहे हैं, उनके परिवार दुखी हैं।ट्रंप अगले चुनाव में उनकी सहानुभूति चाहते हैं।तालिबान से जंग जीत नहीं पा रहे हैं। ऐसी सूरत में समझौते के सिवा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। भारत इसमें मदद नहीं दे सकता। तालिबानी कश्मीरी आतंकवादियों और पाकिस्तान के साथ खड़े हैं। इस कारण अमेरिका एक साल से पाकिस्तान की सहायता से तालिबान के साथ गुपचुप वार्ताएं कर रहा है।
निकट भविष्य में भी एक बैठक होने जा रही है। ट्रंप-इमरान वार्ता का यह बड़ा मुद्दा है। ज़ाहिर है अमेरिका पाकिस्तान के प्रति नरम हो रहा है।तालिबान-संधि प्रयासों के ज़रिए पाकिस्तान अमेरिका को एक तरह से उपकृत करेगा, दूसरी तरफ़ अपने देश के लिए रोकी गई आर्थिक - सैन्य मदद को बहाल करने का प्लेटफॉर्म तैयार करेगा और तीसरी तरफ़ तालिबान को मुख्य धारा में लाकर भारत के अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण की कोशिश को झटका देगा।
आपको याद होगा कि चंद रोज़ पहले ट्रंप ने अपने ट्वीट में लश्करे तैयबा और जमात उद दावा के सरगना आतंकवादी हाफ़िज़ सईद को गिरफ़्तार करने की जानकारी दी थी और कहा था कि उनका दो साल का दबाव काम आया है। यह चौंकाने वाला था।डोनाल्ड ट्रंप मित्र देशों के सामने पाकिस्तान का पक्ष इस आधार पर रख सकते हैं कि पाकिस्तान अब अपने यहाँ सक्रिय आतंकवादी समूहों को पुरज़ोर तरीक़े से नष्ट कर रहा है।
उसे चेतावनी दी गई है कि अगर उसने आतंकवाद का पालन पोषण बंद नहीं किया तो तो उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा।इसके लिए पाकिस्तान को पहले जनवरी,फिर मई और अब अक्टूबर तक आख़िरी मोहलत दी गई है।इसमें पाकिस्तान नाक़ाम रहा तो दुनिया भर से आर्थिक मदद पर अलीगढ़ी ताला लग जाएगा। याने भारत के लिए अमेरिकी व्यवहार गंभीर चेतावनी भी है।
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