दानिश सिद्दीकी स्मृति शेष : एक पत्रकार जो कर्तव्य के मोर्चे पर शहीद हो गया
वह जोखिम भरे कुछ असाइनमेंट करना चाहता था। उनमें कश्मीर में सक्रिय कुछ उग्रवादी समूहों के डेरों पर जाकर उनके साक्षात्कार करना, महाराष्ट्र और आंध्र में नक्सली ठिकानों पर जाकर उनसे बात करना और तमिलनाडु में लिट्टे के अवशेषों की सक्रियता को परदे पर दिखाने जैसे कवरेज शामिल थे।
मुझे व्यक्तिगत रूप से ये विषय पसंद आए थे ,लेकिन किन्ही वजहों से यह संभव नहीं हुआ। इसके बाद जब राज्यसभा टीवी में कार्यकारी निदेशक था तो डॉक्यूमेंट्री बनाने के सिलसिले में वह आता रहा। फिर अचानक काफ़ी दिनों तक कोई संपर्क नहीं रहा।
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विस्तार
मैं उस नौजवान दानिश सिद्दीकी को यक़ीनन सेल्यूट करना चाहूंगा, जो अफ़ग़ानिस्तान में अपने फ़र्ज़ को अंजाम देते शहीद हो गया। चार बरस पहले पुलित्ज़र सम्मान सम्मान मिलने पर वह बेहद खुश था। उसने फ़ोन पर यह ख़बर मुझे दी तो मैंने कहा था,"दानिश ! यह पड़ाव है, मंज़िल नहीं। उसने कहा- " सर ! दुआ कीजिए"। मैंने कहा ,वह तो सदैव तुम्हारे साथ हैं।
अफ़सोस ! एक उत्साही और जांबाज़ पत्रकार का सफ़र मंज़िल पर पहुंचने से पहले ही ख़त्म हो गया। वह बहुत आगे जाता। उसकी आंखों में वह चमक थी, जो उसकी पीढ़ी के ज़्यादातर पत्रकारों में नहीं होती। मेरे पास वह क़रीब दस -बारह साल पहले आया था। उन दिनों मैं एक चैनल समूह का मैनेजिंग एडिटर था।
वह जोखिम भरे कुछ असाइनमेंट करना चाहता था। उनमें कश्मीर में सक्रिय कुछ उग्रवादी समूहों के डेरों पर जाकर उनके साक्षात्कार करना, महाराष्ट्र और आंध्र में नक्सली ठिकानों पर जाकर उनसे बात करना और तमिलनाडु में लिट्टे के अवशेषों की सक्रियता को परदे पर दिखाने जैसे कवरेज शामिल थे।
मुझे व्यक्तिगत रूप से ये विषय पसंद आए थे ,लेकिन किन्ही वजहों से यह संभव नहीं हुआ। इसके बाद जब राज्यसभा टीवी में कार्यकारी निदेशक था तो डॉक्यूमेंट्री बनाने के सिलसिले में वह आता रहा। फिर अचानक काफ़ी दिनों तक कोई संपर्क नहीं रहा।
एक दिन उसने रॉयटर्स ज्वाइन करने की सूचना दी थी। इसके बाद महीने -दो महीने में उसके फ़ोन आते रहे। संवाद चलता रहा। नियति ने हमसे वाकई एक प्रतिभाशाली पत्रकार छीन लिया है।
दानिश सिद्दीकी की शहादत भारत सरकार के लिए भी एक झटका है। स्पिन बोलडाक में तालिबान और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष में कर्तव्य निभाते हुए एक भारतीय चला गया। इसी तरह कई इंजीनियर ,डॉक्टर, मजदूर और अन्य भारतीय अफ़गानिस्तान में अपने अपने मोर्चे पर अभी भी डटे हुए हैं।
तालिबान के ताक़तवर होने से उनके लिए ख़तरा बढ़ गया है। कुछ वाणिज्यिक केंद्र बंद कर वहां के कर्मचारियों -अधिकारियों को वापस बुलाना समझदारी भरा विकल्प हो सकता है ,लेकिन स्थाई नहीं। उन परियोजनाओं का क्या होगा, जो हिंदुस्तान वहां संचालित कर रहा है। भारत ने एक बड़ा पूंजीनिवेश वहां किया है। मुल्क़ की नाज़ुक अर्थव्यवस्था के मद्देनज़र हम कितना नुक़सान वहां उठाने की स्थिति में हैं। इन हालिया घटनाओं ने भारत की चिंताओं के आकार बढ़ा दिए हैं।
तालिबान और अमेरिका के बीच संधि वार्ताएं दो साल से चल रही थीं। इनमें पाकिस्तान और चीन भी सक्रिय थे। ऐसे में हम कहां थे? हमारी पहचान कूटनीति के क्षेत्र में रही है। लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के मामले में हमसे चूक हुई है। हम भविष्य के अफ़ग़ानिस्तान में अपनी भूमिका क्यों नहीं खोज सके? इतने वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान सरकार से भरपूर निकटता के बावजूद पाकिस्तान को अफ़ग़ान प्रसंग में अलग थलग नहीं कर पाए।
यह हिन्दुस्तान की विदेश और कारोबारी नीति की नाकामी ही कही जानी चाहिए। अमेरिकी निकटता ने हमसे ईरान के साथ रिश्ते छीन लिए। चाबहार बनाने में समय,श्रम, ऊर्जा और धन का नुकसान हुआ। उसका मक़सद अफ़ग़ानिस्तान से व्यापार बढ़ाना भी था। चाबहार से अफ़ग़ान सीमा तक सड़क निर्माण में अनेक भारतीयों ने क़ुर्बानी दी है। वह तो बेकार ही चली गई।
इसके अलावा अमेरिका ने हमारे हितों का ख़्याल नहीं रखा। वैसे भी हमें उससे उम्मीद क्योंकर रखनी चाहिए थी। दानिश की शहादत के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के लिए वहां भारतीयों की सुरक्षा बड़ा मसला है। अब अफ़ग़ानिस्तान के मामले में प्राथमिकताएं और फ़ौरी क़दम तय करना भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
अलविदा दानिश एक अनंत सफर के लिए. नीचे कुछ फोटो हैं जिन्हें दानिश ने अपने कैमरे की आंखों में कैद कर लिया.