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कोरोना से जंग: एक छोटे से वायरस ने पूरी दुनिया ही बदल दी 

Mon, 27 Apr 2020 12:06 PM IST
Arvind Kumar yadav अरविंद कुमार
Updated Mon, 27 Apr 2020 12:06 PM IST
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coronavirus how change world know the crisis of covid-19
इस महामारी ने पूरी दुनिया की दिनचर्या को ही बदल दिया है। - फोटो : PTI

लॉकडाउन के दूसरे चरण में बैठे हुए, आजकल हम सब रोज़ बड़े ही बेचैनी से देश में बढ़ रहे कोरोना के मरीज़ों की संख्या पर नज़र गड़ाए हुए हैं। कोरोना के फैलने और इससे बचने के तरीकों वाले संदेशों से हम सब के मोबाइल भरे पड़े हैं। ऐसा समय सिर्फ हमारी ही पीढ़ी ने नहीं बल्कि हमारे माता-पिता ने भी कभी अपने जीवन में नहीं देखा होगा।

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कोरोना शब्द जो की हमारे गांंव की तरफ बोले जाने वाले शब्द कीरौऊना से काफी मिलता जुलता है जिसका मतलब होता है कीड़े मकोड़े। इस एक वायरस ने आज गांंव और शहरों की महत्वता को बदल दिया। हवाई जवाज, मेट्रो, ट्रेन कल-कारखाने सब बंद है। हमेशा वीकेंड प्लान बनाने वाली पीढ़ी के लिए इस एक वायरस ने वीकेंड की परिभाषा ही बदल दी। आजकल सप्ताह के सातों दिनों का एक सा ही महत्व रह गया है।
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अभी पिछले साल के आखिर की ही तो बात है जब चीन के वुहान से यह वायरस शुरू हुआ और अप्रैल खत्म होते होते इस के प्रकोप से पूरी दुनिया जूझ रही है। अभी तक यह वायरस 177 देशों को अपनी गिरफ्त में ले चुुका है और जहांं इस वायरस से पहली मौत 11 जनवरी को हुई तो 4 महीने के भीतर इससे होने वाली मौतों का आंंकड़ा 2 लाख को पार कर गया।
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विश्व की महाशक्ति अमेरिका आज अपने घुटनोंं पर है, इस वायरस ने उसे भी लाचार कर दिया है। यहांं के हालात का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है की दुनियाभर में कोरोना वायरस से मरने वाले लोगों में से एक चौथाई लोगों की मौत अमेरिका में हुई है और संक्रमण के एक तिहाई से अधिक मामले अमेरिका में सामने आए हैं। आज अमेरिका में मौतों का आंंकड़ा 50000 को भी पार कर गया है और अब भी रोज़ हज़ारों लोग मर रहे हैं।
 

coronavirus how change world know the crisis of covid-19
घरों में बंद लोग: क्या किसी ने ऐसी कल्पना की थी। - फोटो : पीटीआई

हम भी इससे अछूते नहीं है, हांं लेकिन समय से उठाए गए क़दमों ने कोरोना की बढ़ने की रफ़्तार कुंद कर दी। आज भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या भले ही 25 हजार के पार पहुंच गई लेकिन अगर प्रभावित विकसित देशों से तुलना करें तो यह भी एक सफलता ही मानी जाएगी और वो भी जब हमारे पास सीमित संसाधन और एक बड़ी आबादी है। यह बात पक्की है कि अगर अपने देश में सही समय पर लॉकडाउन न हुआ होता तो आज हमारी हालत भी इटली और अमेरिका जैसी होती नहीं तो उससे भी बदतर होती। लेकिन सोशल डिस्टन्सिंग, सफाई का विशेष ख्याल और जन जागरूकता के बलबूते भारत आज जिस तरह से अपनी लड़ाई लड़ रहा है, वह सराहनीय है। इस वायरस से  लड़ने में जो एक अच्छी बात सामने आई है वह है शहरों से ज्यादा जागरूकता गांंव में है। आज अगर शहर में फेस मास्क है तो गांंव में वही काम गमछा कर रहा है। कुछ मायने में तो गाँव शहरों से भी अच्छी लड़ाई लड़ रहे है कोरोना से।
 
वैसे पिछले 3 महीने में, इस वायरस की वजह से हम सब की ज़िन्दगी पूरी तरह से बदल गई। लॉकडाउन, सोशल डिस्टन्सिंग, क्वारंटाइन जैसे शब्द शायद इससे पहले हम सब की ज़िन्दगी में नहीं होते थे और थे भी तो उनका अर्थ कुछ और होता था। आज साफ-सफाई को ले कर हम इतने जागरूक हो गए जितना कभी शायद अपनी पूरी ज़िन्दगी में नहीं हुए। आज बच्चों को भी फेस मास्क के बारे में पता है। सैनीटाइजर भी अब घर-घर में नज़र आने लगा जो की पहले सिर्फ ऑफिस या होटलों में देखने को मिलता था। बच्चों से लेकर बुजुर्ग किसी को भी अब बताने की जरुरत नहीं है की हाथ धोने या साफ सफाई का क्या महत्व हैं।
 
सोचिए कहांं, हम रोज़ नित नई तकनीक से लैस हो रहे थे, अंतरिक्ष की ऊंचाई और समुद्र की गहराई सब नाप ली थी। मोबाइल नेटवर्क भी 5G पर स्विच होने को बस तैयार था, चांंद पर बनने वाले घरों का डिज़ाइन भी फाइनल कर लिया गया था। लेकिन समय ने एक दम से पलटी मारी और एक छोटा सा वायरस, इतना छोटा की आँखों से दिखाई भी न दे। उस एक वायरस ने आज पुरी मानवता पर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया। सब हथियार परमाणु बम, सब धरे के धरे रह गए और हमारी हालत ऐसी हो गयी है की जो जीव जंतु हमारी वहज से घटते हुए जंगलों में दुबके रहते थे आज वो शहरों में घूम रहे हैं और हम घरों में दुबके हुए हैं। विश्व की सबसे बड़ी परमाणु शक्ति का दम्भ भरने वाले देश भी बगले ताक रहे हैं। गाँव से निकल कर शहर में बसे लाखों लोग जिनको शहर में अच्छा भविष्य दीखता था वह भी गाँव को ही याद कर रहे हैं।
 
इस वायरस के प्रकोप ने यह बात तो सिद्ध कर दी है की हम खुद को कितना भी शक्तिशाली माने कितनी भी तरक्की कर लें लेकिन प्रकृति के आगे हम कुछ भी नहीं और इससे सामजस्य मिला कर ही रहना होगा वर्ना हर ऐसे मौके पर यह हमें हमारी सीमाओं का अनुभव कराएगी। खैर जो भी हो आज एक एक वायरस ने हम सब के सोचने और जीने के तरीक़ों को बदल दिया है और इसका ज्यादा अनुभव हमें लॉकडाउन खुलने के बाद होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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