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साझा हिमालय के लिए अंतर्राष्ट्रीय नीति और तंत्र जरुरी

Wed, 02 Sep 2026 09:39 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 02 Sep 2026 09:39 AM IST
सार

हाल ही में नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस प्राकृतिक और वैज्ञानिक वास्तविकता को एक बार फिर पूरे दक्षिण एशिया के सामने उजागर कर दिया है। हिमालय के दुर्गम और ऊपरी हिस्सों में घटने वाली पर्यावरणीय घटनाओं का असर केवल उसी देश तक सीमित नहीं रहता जहां उनका जन्म होता है।

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International Policy and Mechanisms Needed for the Shared Himalayas
नेपाल बाढ़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पृथ्वी के 'तीसरे ध्रुव' और एशिया के विशाल 'वाटर टॉवर' के रूप में पहचाना जाने वाला हिमालय राजनीतिक सीमाओं में बंटा हुआ कोई साधारण भौगोलिक ढांचा भर नहीं है।

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यह सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेकांग, यांग्त्ज़ी और साल्वीन जैसी एशिया की महान नदियों का उद्गम स्थल है, जिनके प्रवाह पर भारत, चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों के लगभग दो अरब लोगों का जीवन, कृषि, पेयजल और संपूर्ण अर्थव्यवस्था निर्भर है।
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वैज्ञानिक और भू-पारिस्थितिकी दृष्टिकोण से हिमालय को किसी एक देश की संप्रभुता या राजनीतिक सीमा के दायरे में बांधकर देखना एक गंभीर और विनाशकारी भूल है। जब इसके उच्च शिखरों पर कोई विशाल हिमखंड खिसकता है, भूस्खलन के कारण नदी का प्रवाह अवरुद्ध होकर अस्थाई झील बनती है या कोई हिमनदीय झील (ग्लेशियर लेक) फटती है, तो उससे पैदा होने वाली प्रलयंकारी जलधाराएं किसी देश का नक्शा, संप्रभुता या पासपोर्ट देखकर सीमा पार नहीं करतीं।
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उस विनाश का प्रभाव उद्गम स्थल से सैकड़ों और कभी-कभी हजारों किलोमीटर दूर निचले मैदानी इलाकों तक तबाही मचाता है।

हाल ही में नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने इस प्राकृतिक और वैज्ञानिक वास्तविकता को एक बार फिर पूरे दक्षिण एशिया के सामने उजागर कर दिया है। हिमालय के दुर्गम और ऊपरी हिस्सों में घटने वाली पर्यावरणीय घटनाओं का असर केवल उसी देश तक सीमित नहीं रहता जहां उनका जन्म होता है।

तिब्बती पठार से निकलने वाली नदियाँ भारत, नेपाल और भूटान से गुजरते हुए बांग्लादेश तक पहुँचती हैं। इसी तरह सिंधु और सतलुज जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ तिब्बत से निकलकर भारत और पाकिस्तान के मैदानों को सींचती हैं। इस प्रकार, पूरे हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी और दक्षिण एशिया की मानवीय व आर्थिक सुरक्षा एक-दूसरे से पूरी तरह अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में विश्वविख्यात पर्यावरणविद, चिपको आंदोलन के प्रणेता पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट की ताजा अपील विशेष महत्व रखती है।

नेपाल की भीषण जलप्रलय पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने हिमालय से जुड़े देशों के शासनाध्यक्षों से राजनीतिक सीमाओं और कूटनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक साझा मंच पर आने तथा प्राकृतिक आपदाओं से जन-धन की हानि कम करने के लिए स्थायी संयुक्त सुरक्षा तंत्र विकसित करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि हिमालयी आपदाओं को राष्ट्रीय सीमाओं में नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय और नदी बेसिन तंत्र के संदर्भ में देखना होगा।

नेपाल की जलप्रलय कोई अलग-थलग घटना नहीं है। इसने उत्तराखंड की ऋषिगंगा-धौलीगंगा और धराली तथा सिक्किम की तीस्ता घाटी की आपदाओं की याद फिर ताजा की है। इसलिए हिमालयी देशों को आपदा के बाद राहत और पुनर्निर्माण तक सीमित रहने के बजाय अंतर्राष्ट्रीय हिमालयी संरक्षण एवं आपदा सुरक्षा तंत्र स्थापित करना चाहिए।

इसमें चीन, भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और बांग्लादेश प्रमुख साझेदार हों तथा व्यापक हिंदूकुश-हिमालयी परिप्रेक्ष्य में अफगानिस्तान और म्यांमार को भी शामिल किया जाए।

वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि वैश्विक तापन के कारण हिमालय में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी है, जिससे हिमनद, जल-चक्र और पर्वतीय ढालें अधिक अस्थिर हो रही हैं। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में 25,000 से अधिक हिमनद झीलें हैं।

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से मोरेन से घिरी इन झीलों में पानी बढ़ रहा है और उनके फटने या उनमें विशाल हिमस्खलन गिरने से विनाशकारी ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ पैदा हो सकती है। औद्योगिक क्षेत्रों से हिमालय तक पहुंचने वाला ब्लैक कार्बन बर्फ की परावर्तन क्षमता घटाकर पिघलने की गति और बढ़ाता है।

दूसरी ओर, तिब्बत या नेपाल में बड़े भूस्खलन नदियों को रोककर अस्थायी जलाशय बना सकते हैं। इनके अचानक टूटने से सांगपो, कोसी, गंगा या सिंधु की ऊपरी धाराओं में पैदा हुई जल-तरंग सीमाएं पार कर बिना पर्याप्त पूर्व चेतावनी के निचले क्षेत्रों में गंभीर बाढ़ और तबाही ला सकती है।

इस साझा खतरे से निपटने के लिए बनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय तंत्र का पहला मुख्य उद्देश्य हिमालय की संयुक्त वैज्ञानिक निगरानी होना चाहिए। ग्लेशियरों के खिसकने, हिमनदीय झीलों के आकार में परिवर्तन, अस्थिर ढलानों, भूस्खलन-संभावित क्षेत्रों और नदियों पर बनने वाले अस्थायी अवरोधों की निगरानी किसी एक देश के बलबूते संभव नहीं है।

उपग्रह चित्रों (विशेषकर सिंथेटिक एपर्चर रडार), मौसम रडार, स्वचालित जलस्तर मापक यंत्रों और भूकंपीय सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों को एक-दूसरे के साथ साझा करने की एक बाध्यकारी व्यवस्था होनी चाहिए।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू 'सीमा-पार पूर्व चेतावनी प्रणाली'  का गठन है। मान लीजिए कि तिब्बत के किसी दुर्गम क्षेत्र में भूस्खलन से किसी नदी पर प्राकृतिक बांध बन जाता है और कुछ घंटों बाद वह टूटता है, तो भारत या नेपाल के निचले इलाकों में अचानक तबाही आ सकती है।

ऐसी स्थिति में यदि ऊपरी क्षेत्र से कुछ घंटों की भी अग्रिम सूचना मिल जाए, तो हजारों मासूम लोगों की जान बचाई जा सकती है। यह चेतावनी केवल सरकार से सरकार के स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे वास्तविक समय (रियल-टाइम) में संबंधित देशों की आपदा प्रबंधन एजेंसियों, स्थानीय प्रशासनिक जिलों, जलविद्युत परियोजनाओं और नदी घाटियों में रहने वाली आबादी तक पहुंचाने का एक तय अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकॉल होना चाहिए।

तीसरे कदम के रूप में एक साझा 'हिमालयी वैज्ञानिक डेटा बैंक' की स्थापना अनिवार्य है। वर्तमान में ग्लेशियरों, वर्षा, बर्फबारी, तापमान और नदी प्रवाह से जुड़े आंकड़े अलग-अलग देशों और सामरिक गोपनीयता के पर्दों के पीछे बिखरे हुए हैं।

इन आंकड़ों को 'सामरिक गोपनीयता' से बाहर निकालकर एक साझा लोकतंत्रीकृत मंच पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि वैज्ञानिक पूरे नदी बेसिन को एक एकल इकाई मानकर खतरों का सटीक पूर्वानुमान लगा सकें।

इसके साथ ही, विकास परियोजनाओं के संदर्भ में सभी हिमालयी राष्ट्रों को 'पार-सीमा पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन' का कड़ाई से पालन करना होगा, ताकि एक देश द्वारा अपनी सीमा में किए जाने वाले भारी विस्फोटों, सुरंग निर्माण या नदियों के मोड़ने का नकारात्मक प्रभाव पड़ोसी देश की आबादी पर न पड़े।

अंटार्कटिका और आर्कटिक जैसी वैश्विक धरोहरों की सुरक्षा के लिए दुनिया के पास अंतर्राष्ट्रीय संधियां और साझा वैज्ञानिक मंच मौजूद हैं, परंतु विश्व की विशाल आबादी को जीवन देने वाले 'तीसरे ध्रुव' के पास आज भी ऐसा कोई बहुपक्षीय सुरक्षा कवच नहीं है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अगली बड़ी प्राकृतिक आपदा कहाँ जन्म लेगी, इसका सटीक अनुमान कठिन हो सकता है। इसलिए, दक्षिण एशियाई राष्ट्रों को किसी अगली बड़ी त्रासदी की प्रतीक्षा किए बिना, राजनीति पर विज्ञान को प्राथमिकता देते हुए तुरंत एक साझा हिमालयी संरक्षण नीति और स्थायी संस्थागत मंच की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाना होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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