असम की 'पुश बैक' नीति: विवाद और सियासत के बीच सरकार के कदम
Assam: असम से बांग्लादेशी घुसपैठियों के जबरन पुशबैक यानी उनको सीमा पार भेजने का मुद्दा अब जोर पकड़ रहा है। मुख्यमंत्री हिमांता बिस्वा सरमा ने साफ कर दिया है कि विदेशी न्यायाधिकरणों की अनुमति के बिना ही विदेशी लोगों को जबरन वापस भेजने का अभियान जारी रहेगा।
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असम से बांग्लादेशी घुसपैठियों के जबरन पुशबैक यानी उनको सीमा पार भेजने का मुद्दा अब जोर पकड़ रहा है। मुख्यमंत्री हिमांता बिस्वा सरमा ने साफ कर दिया है कि विदेशी न्यायाधिकरणों की अनुमति के बिना ही विदेशी लोगों को जबरन वापस भेजने का अभियान जारी रहेगा। उन्होंने इसके लिए 75 साल पुराने एक कानून का सहारा लेने की बात कही है।
सीएम के मुताबिक इस तरीके से अब तक करीब तीन सौ लोगों को वापस भेजा जा चुका है। हाल में 14 लोगों की एक टीम को भी इसी तरीके से भेजा गया था, लेकिन उनमें से कुछ को दो दिनों बाद वापस भेज दिया गया था। बीएसएफ ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकार के इस रवैए पर सवाल उठा रहे हैं।
असम सरकार की इस नीति की चौतरफा निंदा हो रही है, लेकिन मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि सरकार इस नीति पर आगे बढ़ती रहेगी। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि साल 1950 में बना एक कानून अब तक लागू है। अब सरकार उसी के जरिए घुसपैठियों को राज्य से बाहर निकालेगी। अप्रवासी निष्कासन आदेश नामक उक्त कानून के तहत जिला शासक को किसी भी अवैध व्यक्ति को तत्काल देश से निकालने का आदेश जारी करने का अधिकार है। सरकार को इसकी जानकारी नहीं थी। अब इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद इसी के जरिए घुसपैठियों को उनके देश वापस भेजने की कवायद तेज की जाएगी।विज्ञापन विज्ञापन
मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकार उन लोगों के पुश बैक का अभियान चला रही है जिनको राज्य के विदेशी न्यायाधिकरणों ने विदेशी घोषित कर दिया है। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। उन्होंने कहा है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) की वजह से विदेशियों की पहचान की कवायद कुछ समय के लिए रुक गई थी, लेकिन अब उसे तेज किया जाएगा। सरकार का कहना है कि अब अगर कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज पेश करने में नाकाम रहता है तो उन मामलों को न्यायाधिकरणों में भेजने की बजाय लोगों को जबरन सीमा पार भेज दिया जाएगा।
राज्य में अब तक विदेशी न्यायाधिकरणों की ओर से विदेशी घोषित व्यक्ति इस फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता था, लेकिन सरकार के ताजा रुख से अब उसके सामने इसका मौका नहीं होगा।
लेकिन असम सरकार की दलील है कि असमिया जाति की पहचान बचाने के लिए घुसपैठ को पूरी तरह रोकना और असम को अवैध विदेशियों से मुक्त करना जरूरी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि निहित स्वार्थ वाले कुछ तत्व और संगठन सरकार के इस प्रयास का विरोध कर रहे हैं। हिमंता ने कांग्रेस की भी खिंचाई की है। उन्होंने इस काम में आम लोगों से भी सहयोग की अपील की है।
उधर, राज्य के ताकतवर छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने भी सरकार की पुश बैक की नीति का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे जारी रखना जरूरी है। संगठन के मुख्य सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्य कहते हैं कि अगर इसे बीच में रोक दिया गया तो लोग समझेंगे कि सरकार ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए वोट बैंक के लिए ही इसे शुरू किया था।
कई अल्पसंख्यक संगठनों ने सरकार के इस रवैए के प्रति नाराजगी जताते हुए इसका विरोध किया है। अल्पसंख्यक-बहुल राजनीतिक संगठन ऑल इंडिया यूनाइटेड माइनॉरिटी फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने सरकार की इस नीति के खिलाफ राज्यपाल गणेश आचार्य को एक ज्ञापन सौंपा है। उसका आरोप है कि अवैध विदेशियों की शिनाख्त करने के नाम पर भारतीय मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। अवैध आप्रवासी के बहाने लोगों को बेवजह गिरफ्तार और परेशान किया जा रहा है। उनमें से ज्यादातर की नागरिकता साबित होने के बाद उनको रिहा कर दिया गया है।
राज्य के अल्पसंख्यक छात्र संगठनों ने सरकार की इस नीति के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि बांग्लादेशियों को खदेड़ने के नाम पर राज्य के अल्पसंख्यकों को बेवजह परेशान किया जा रहा है।
एक अल्पसंख्यक छात्र संगठन ऑल बीटीसी माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन ने इस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि असम सरकार उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना ही लोगों को विदेशी नागरिक मानकर हिरासत में ले रही है और उन्हें बांग्लादेश सीमा के पार भेज रही है। कई मामलों में राज्य के नागरिकों के साथ भी ऐसा हो रहा है। यह उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर सुनवाई से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को गौहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर करने को कहा है।
दूसरी ओर, सौ से ज्यादा बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने भी एक खुला पत्र जारी कर पुश बैक नीति को संविधान और मानवाधिकार विरोधी करार दिया है। लोगों की पहचान की पुष्टि के बिना जबरन सीमा पार भेजने की वजह से बांग्लादेशी अधिकारी उनको जेल भेज सकते हैं। इसके अलावा इस कवायद के दौरान बांग्लादेशी सुरक्षाबलों की ओर से फायरिंग में जान गंवाने का भी खतरा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वैसे तो सीमा पार से घुसपैठ की समस्या राज्य में दशकों पुरानी है। अस्सी के दशक में आसू के बैनर तले इसके खिलाफ असम आंदोलन भी हो चुका है। लेकिन भाजपा के सत्ता में आने और खासकर हिमंता बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा काफी जोर पकड़ चुका है। एनआरसी के दौर में भी इसमें काफी तेजी आई थी.
एक राजनीतिक विश्लेषक सुमन ठाकुरिया कहते हैं कि सरकार ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए पुश बैक की कवायद को तेज करने का फैसला किया है। अल्पसंख्यकों के प्रति मुख्यमंत्री हिमंता का नजरिया किसी से छिपा नहीं है। इस मुद्दे पर उन्होंने अपना रुख साफ कर दिया है।
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