पॉक्सो पीड़ितों को मुआवजा: न्याय से आगे की महती जिम्मेदारी
पॉक्सो एक्ट में पीड़ित बच्चों की तरफ से केस लड़ने वाले वकील मोईन खान कहते हैं, "जिस तरह बच्चों के लिए न्याय आवश्यक है, उसी तरह मुआवजा भी बेहद जरूरी है। मुआवजे की मदद से उनकी बेपटरी जिंदगी वापस पटरी पर आती है।"
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जब एक बच्चा यौन शोषण और यौन हिंसा की काली सुरंग से गुजरता है, तब वह रोशनी की एक किरण के लिए भी छटपटाता है। यौन शोषण सिर्फ शरीर पर घाव नहीं करता, यह अंतरात्मा को झिंझोड़ कर रख देता है। फिर वह अबोधपन, जब बच्चे जानते ही नहीं कि शारीरिक संबंध या शोषण क्या होता है, तब वे मानसिक रूप से बहुत टूट जाते हैं। यह एक ऐसा घाव है, जिसे नासूर बनने में वक्त नहीं लगता। अदालतें दोषी को सजा देती हैं, कानून अपनी प्रक्रिया पूरी करता है, लेकिन पीड़ित का पुनर्वास उसके नए और बेहतर जीवन की नींव है।
पुनर्वास का सबसे अहम पहलू है-
यह मुआवजा बच्चे और उसके परिवार के लिए भावनात्मक और व्यवहारिक सहारा बनता है। पॉक्सो एक्ट की धारा 33(8) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 357-A इस बात को स्पष्ट करती हैं कि पीड़ित को उचित, त्वरित और सम्मानजनक मुआवजा मिलना चाहिए। यह मुआवजा:
• मानसिक और चिकित्सकीय उपचार में मदद करता है
• पढ़ाई और सामाजिक पुनःस्थापन में सहायक होता है
• राज्य की जवाबदेही दर्शाता है
लेकिन दुर्भाग्यवश, हमारे देश–प्रदेश–अंचल में आज भी ऐसे हजारों मामले हैं, जहां बच्चों को समय पर या पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता। यह कोताही सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि बच्चों को दूसरी बार न्याय से वंचित करने जैसा है।
'आस' संस्था, जो कि बच्चों के बचपन को सुरक्षित बनाने के लिए काम करती है, की काउंसलर शिवकन्या बघेल बताती हैं कि वे लगातार पीड़ित बच्चियों को मुआवजा दिलवाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाती हैं। कुछ मामलों में तीन लाख तक का मुआवजा भी मिला है, लेकिन अनेक मामले अभी पेंडिंग चल रहे हैं।
जब बच्चों के साथ यौन शोषण की दुर्घटना होती है, तो अधिकांश पालक चुप्पी साध लेते हैं। हम उन्हें समझा-बुझा कर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज करवाने के लिए तैयार करते हैं। अधिकांशतः ये लोग गरीब तबके से आते हैं। वे सामाजिक डर से स्थानांतरण करते हैं। अधिकांश मामलों में परिजन अपना पुराना मोहल्ला या गांव छोड़ देते हैं। नई जगह पालकों को बसने में कठिनाई आती है, काम-धंधा छूट जाता है, वहीं नाबालिग बच्चे की स्कूल या पढ़ाई भी छूटती है। इन सभी को सुचारू रूप से चलाने के लिए कंपनसेशन बहुत जरूरी है। परंतु अधिकांश मामलों में या तो कंपनसेशन वक्त पर नहीं मिलता या इतना कम होता है कि वह नाबालिग के पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं होता।
हमने देखा है, कई बार विक्टिम कंपनसेशन बोर्ड की बैठकें समय पर नहीं हो पाती हैं। तबादले के कारण जो नए अधिकारी आते हैं, वे केस फिर से पूरा समझते हैं। जिला अधिकारियों को यह स्पष्ट नहीं होता कि मुआवजे की प्रक्रिया किसे शुरू करनी है- पुलिस, अदालत या बाल कल्याण समिति को। इन व्यवस्थागत उलझनों के बीच बच्चा कहीं खो जाता है, जिसे त्वरित सहायता की जरूरत थी। हम लोग चूंकि लंबे समय से इस प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं, इसलिए यह राह हमारे लिए फिर भी थोड़ी आसान है, लेकिन अन्य पालकों को मुसीबत का सामना करना पड़ता है।
पॉक्सो एक्ट में पीड़ित बच्चों की तरफ से केस लड़ने वाले वकील मोईन खान कहते हैं, "जिस तरह बच्चों के लिए न्याय आवश्यक है, उसी तरह मुआवजा भी बेहद जरूरी है। मुआवजे की मदद से उनकी बेपटरी जिंदगी वापस पटरी पर आती है।"
एक केस के संबंध में चर्चा करते हुए वे बताते हैं, "यह एक ग्रामीण केस था। बच्ची के माता-पिता अलग हो गए थे। मां ने दूसरी शादी कर ली थी। बच्ची मां और सौतेले पिता के साथ थी। एक दिन वह अपने जैविक पिता के पास लौट आई। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली इस बच्ची के साथ उसके अपने पिता ने बलात्कार किया, एक नहीं, कई बार। तंग आकर बच्ची ने डायल 100 पर सूचना देकर थाने में रिपोर्ट करवाई।
बच्ची को न्याय मिला। उसके हैवान पिता को दस साल की सजा हुई। उसके बाद दूसरी जद्दोजहद शुरू हुई, बच्ची को मुआवजा दिलवाने की। अपने ही घर–परिजनों की सताई बच्ची अब उनके साथ नहीं रहना चाहती थी। हमने कोशिश करके न्यायालय से 1,50,000 का मुआवजा दिलवाया। यह मुआवजा बच्ची के अच्छे भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। अब यह बच्ची अपने भाई के साथ वापस स्कूल जाने लगी है और अतीत की कटु यादों से निकलने की हर संभव कोशिश कर रही है।"
एक बच्चा जब हिम्मत करके शोषण की बात बताता है, तो वह केवल अपराध की शिकायत ही नहीं करता। कहीं ना कहीं उसे विश्वास होता है कि सिस्टम उसे संभालेगा। अभी उसकी उम्र नहीं कि वह खुद से खुद को संभाल ले। यदि हम उस भरोसे के बदले उसे कागजी वादा, तारीख और इंतज़ार ही दे पाते हैं, तो यह एक अन्याय के बाद दूसरा अन्याय होगा। प्रशासन को यह समझना चाहिए कि मुआवजा केवल राशि नहीं, यह एक मरहम है—और मरहम समय पर दिया जाए, तभी घाव नासूर नहीं बनता, बल्कि भरता है।
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