बजट समीक्षा 2020ः सुस्त अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की कोशिश
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने दूसरे बजट में मध्य वर्ग पर नजर-ए-इनायत बरसाने का मकसद साफ है। वह मध्य वर्ग के हाथ में पैसा देना चाहती हैं, ताकि वह इस पैसे को अपनी दैनंदिन जिंदगी के मोर्चे पर खर्च कर सके। मौजूदा दौर में हमने जिस नई आर्थिकी को अंगीकार किया है, उसका बुनियादी आधार उपभोग है।
पिछले करीब दो साल से भारतीय अर्थव्यवस्था के डगमगाने की जो बातें की जा रही थीं, उसे भले ही नकारा जाता रहा, लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने स्वीकार कर ही लिया है। बेशक सरकार इसके लिए वैश्विक आर्थिक सुस्ती, निवेश और मांग में कमी को जिम्मेदार ठहरा रही हो, लेकिन प्रकारांतर से उसने मान लिया है कि आर्थिक सुस्ती को मांग और निवेश बढ़ाकर ही पूरा किया जा सकता है। मध्य वर्ग को सबसे खुशी उसके आयकर दायरे में मिलने वाली छूट से मिलती है। वह छूट से बचे पैसों का इस्तेमाल अपनी निजी जिंदगी की आवश्यकताओं को पूरा करने में करता है।
आखिर टैक्स में छूट के मायने क्या हैं?
जाहिर है कि वित्त मंत्री ने आयकर में छूट देकर एक तरह से मध्य वर्ग को खर्च के लिए उकसाया है। आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने माना है कि आर्थिक सुस्ती 2020 की दूसरी छमाही में दूर हो जाएगी। ऐसा लगता है कि ऐसा कहते वक्त वित्त मंत्री के दिमाग में मध्य वर्ग को आयकर छूट की बात जरूर रही होगी।
दरअसल, उन्हें भी लगता है कि भारत का विशाल मध्य वर्ग ही हिचकोले खाती भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकेगा, इसलिए उन्होंने आयकर छूट के दायरे को बढ़ाते हुए पांच लाख तक की आय पर कोई टैक्स ना लगाने और उसके बाद सिर्फ तीन और स्लैब रखने एवं उसमें भी कटौती करने का फैसला किया है।
बेशक यह रकम सीधे अब सरकारी खजाने में नहीं मिलेगी, लेकिन इस रकम के सहारे भारतीय आर्थिक परिदृश्य में जब हलचल बढ़ेगी तो वह देश की आर्थिक सेहत के लिए अच्छी होगी। लेकिन इस व्यवस्था को वैकल्पिक बनाने का विचार थोड़ा संशय पैदा करता है। अव्वल तो होना यह चाहिए कि यह अनिवार्य होता।
वरिष्ठ नागरिक को मिलने वाली रेल किराए में छूट और गैस सब्सिडी छोड़ने जैसे अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय नागरिक का अभी ऐसा मानस नहीं विकसित हुआ है कि वह कर खुद देने के लिए आगे आए, इसलिए बेहतर होता कि नए कर स्लैब को अनिवार्य बनाया जाता, ना कि वैकल्पिक।
बजट में किसान के लिए क्या?
भारत के विशाल मध्य वर्ग के साथ ही देश का एक और बड़ा वर्ग है, जो देश की आर्थिक और राजनीतिक-दोनों सेहत की बुनियाद है। करीब 67 प्रतिशत जनसंख्या अब भी खेती-किसानी पर या तो सीधे या परोक्ष रूप से निर्भर है। लेकिन कटु सत्य यह है कि इस क्षेत्र की देश के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 13 फीसद की ही हिस्सेदारी है। इसे सामान्य शब्दों में समझने की कोशिश करें तो देश की आमदनी के तेरह फीसद हिस्से पर देश की 67 प्रतिशत जनता निर्भर है।
जाहिर है कि खेती-किसानी पर बड़ा दबाव है। मोदी सरकार जब सत्ता में आई थी तो उसने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुना करने का वादा किया था। वह लक्ष्य अभी हासिल किया जाना बाकी है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वित्त मंत्री ने किसानों के लिए 16 योजनाओं की ना सिर्फ घोषणा की है, बल्कि इनके लिए 2.83 लाख करोड़ रुपये आवंटित भी किया है।
ध्यान रखने की बात यह है कि इस रकम में करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये कृषि और सिंचाई के लिए रखी गई है। पीएम कुसुम योजना के तहत 20 लाख किसानों को सोलर पंप लगाने में आर्थिक मदद देने का फैसला ना सिर्फ किसानों के हित में है, बल्कि देश में अक्षय ऊर्जा पर बढ़ती जरूरतों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का रास्ता भी होगा। गर्मियां आते ही देश के कई इलाके जल संकट से जूझने लगते हैं।
इससे सबसे ज्यादा प्रभावित 100 जिलों के लिए बड़ी योजनाएं लाने और 15 लाख किसानों को ग्रिड कनेक्टेड पंपसेट से जोड़ने का फैसला भी खेती-किसानी का परिदृश्य बदलने वाला होगा। इसके साथ ही किसानों को 15 लाख करोड़ रुपए का कर्ज देने, दूध परिरक्षण क्षमता 80 लाख टन और 20 करोड़ 80 लाख टन मछली उत्पादन का भी लक्ष्य रखा गया है। इससे जहां रोजगार बढ़ेगा, वहीं ग्रामीण बाजारों में तेजी आने की संभावना भी बढ़ेगी।
रोजगार की संभावनाएं और सरकार
हाल ही में आई एक अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर शहरी खर्च में दस फीसद की बढ़ोत्तरी होती है, तो ग्रामीण इलाकों में रोजगार की संभावनाओं में 4.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि टैक्स छूट और ग्रामीण एवं कृषि विकास के लिए दी जाने वाली रकम से ना सिर्फ शहरों, बल्कि गांवों में भी आर्थिक तेजी लाने में मदद मिलेगी।
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में 'आकांक्षी भारत, सभी के लिए आर्थिक विकास करने वाला भारत और सभी की देखभाल करने वाला समाज केंद्रित भारत का विचार दिया है। हर बजट प्रस्ताव से ऐसे ही कल्याणकारी योजनाओं और उन्हें जमीनी स्तर पर अमलीजामा पहनाए जाने की की उम्मीद की जाती है। ऐसी उम्मीद रेलवे और स्वास्थ्य सेवा को लेकर दिए बजट प्रस्तावों को लेकर भी है।
वित्त मंत्री ने 27 हजार किलोमीटर रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण और रेलवे के विकास के साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 69 हजार करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव किया है। जनआरोग्य योजना के लिए 6400 करोड़ के साथ ही साल 2025 तक टीवी को जड़ से खत्म करने के लक्ष्य के साथ 3.6 लाख करोड़ का आवंटन किया जाना भी बड़ा कदम है।
इसी तरह बजट में शिक्षा के लिए 99300 करोड़ जबकि कौशल विकास के लिए 3000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इन सब योजनाओं को जारी करते हुए वित्त मंत्री ने उम्मीद जताई है कि देश को इन सबका बहुत फायदा होगा।
शिक्षा क्षेत्र में बजट की जरूरत
वित्त मंत्री ने इस साल नई शिक्षा नीति आने की उम्मीद भी जताई है और जीएसटी को और सहज बनाने का भी वादा किया है। लेकिन इन बिंदुओं पर सरकार पर सवाल भी उठते हैं। सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति लाने में क्यों नाकाम रही और आखिर सहज जीएसटी व्यवस्था पहले ही दौर में क्यों नहीं लागू की जा सकी।
जीएसटी लागू होने के बाद भारत सरकार को उम्मीद थी कि प्रत्यक्ष कर के रूप में उसे हर महीने एक लाख करोड़ रुपए मिलेंगे, लेकिन वह कभी लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। इसी तरह सरकार ने भारत की आर्थिक सेहत की रीढ़ समझे जाने वाले भारतीय जीवन बीमा निगम का कुछ हिस्सा आईपीओ लाकर बेचने का भी प्रस्ताव किया है।
जाहिर है कि इन बिंदुओं पर सरकार को जवाब देना होगा और उसे विपक्ष को ही नहीं आम जनता को भी संतुष्ट करना होगा। उसे यह समझाना होगा कि आखिर क्या वजह रही कि संकट के हर समय में सरकार का आर्थिक साथ निभाने वाले जीवन बीमा निगम की हिस्सेदारी बेचनी पड़ रही है।
बहरहाल, इन बजट प्रस्तावों को देखकर कहा जा सकता है कि वित्त मंत्री ने मध्य वर्ग और किसानों को राहत देकर देश की सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश की है।
पांच खरब की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए देश को ना सिर्फ आर्थिक सुस्ती से निजात पाना होगा, बल्कि हर साल करीब आठ फीसद की विकास दर भी हासिल करनी होगी।
इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति के साथ ही प्रतिबद्ध नौकरशाही और सरकारी तंत्र की जरूरत होगी, जो इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से लाए गए बजट प्रस्तावों को जमीनी हकीकत बना सकें। हालांकि अब तक नौकरशाही का जो रवैया रहा है, वह बहुत आश्वस्तकारी नहीं रहा है। इस ओर भी वित्त मंत्री ध्यान देतीं तो देश का भला करने की रफ्तार और तेज और विश्वस्त होती।
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