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दूसरा पहलू: ब्रिटिश फौजी, हीरा व्यापारी और आगरा की मिलें
Thu, 28 May 2026 08:18 AM IST
Pavan
भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार
Published by: Pavan
Updated Thu, 28 May 2026 08:18 AM IST
सार
यह कहानी किसी घोटाले की नहीं है। यह उस शख्स की है, जिसके वंशजों ने आगरा को आधुनिक पहचान दी। हीरा व्यापारी एंतोनियो जोआनीदेस भारत की ख्याति सुनकर आए थे। यहां आकर उन्होंने व्यापार छोड़ दिया और अंग्रेजी फौज में भर्ती हो गए। उनके परिवार ने ही आगरा की जोंस पब्लिक लाइब्रेरी व सेंट मेरी चर्च बनवाया। हालांकि, बाद में, परिवार के लोग यूरोप व अमेरिका चले गए और उनकी संपत्ति की बंदरबांट शुरू हो गई।
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अमर उजाला
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अगर कभी आप आगरा आएं, तो यमुना किनारे अंग्रेजों के समय का विशाल खंडहर हो चुका कारखाना नजर आएगा, जिसके दर-ओ-दीवार अब ढह चुके हैं। कभी 100 से ज्यादा बीघे में फैला जोंस मिल के नाम से विख्यात यह परिसर, अब जमीन की बंदरबांट के लिए कुख्यात है। करीब तीन हजार करोड़ रुपये के घोटाले की जांच चल रही है।
यमुना किनारा मार्ग के पास चिमनियों से सटे घर व औद्योगिक परिसर हैं, जो घोटाले की गगनचुंबी हकीकत बयान करते हैं। लेकिन यह कहानी किसी घोटाले की नहीं है। यह उस शख्स की है, जिसके वंशजों ने आगरा को आधुनिक पहचान दी। लेवेंत (आज का सीरिया, जॉर्डन व लेबनान का इलाका) में रहने वाले और यूनान (ग्रीस) के मूल निवासी एंतोनियो जोआनीदेस 18वीं शताब्दी के उन मुसाफिरों में से थे, जिन पर भाग्य की देवी मेहरबान होती है। हीरा व्यापारी एंतोनियो 1801 ईस्वी में भारत की ख्याति सुनकर ही आए थे। भारत आकर उन्होंने व्यापार छोड़ दिया और अंग्रेजी फौज में भर्ती हो गए।
लॉर्ड कंबरमेयर के नेतृत्व में भरतपुर के लोहागढ़ फोर्ट पर कब्जे के लिए हुई जंग में वह पहले सिपाही थे, जिन्होंने किले में प्रवेश किया था। इसके लिए उन्हें मेडल भी मिला। उन्होंने लेवेंत का अपना नाम बदलकर अंग्रेजी में एंथनी जॉन रख लिया। जॉन ने आगरा को अपना ठिकाना बनाया व फौज छोड़ने के बाद हीरों का कारोबार फिर से शुरू किया। 1855 में उनकी मौत के बाद बेटे निकोलस ने जॉन एंड कंपनी का कारोबार संभाला। निकोलस ने 1887 में स्थापित आगरा स्पिनिंग एंड वीविंग मिल्स पर काम शुरू किया। उनके नौ बच्चों में से एक एडविन ने उनके काम को आगे बढ़ाया।
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यह वह समय था, जब भाप से ही औद्योगिक इकाइयां चलाई जाती थीं। जाॅन की जिनिंग (कपास से बिनौले को अलग करना) फैक्टरी में 600 मजदूर काम करते थे। आसपास और भी कारखाने थे, जिनमें दो हजार से ज्यादा मजदूर काम करते थे। आगरा के रेल नेटवर्क से मुंबई तथा कोलकाता तक सामान की सप्लाई होने लगी। यह आगरा के वैभव का काल था। इस परिवार ने ही जोंस पब्लिक लाइब्रेरी व सेंट मेरी चर्च बनवाया।
बाद में, जॉन परिवार के लोग अमेरिका व यूरोप चले गए और उनकी संपत्ति की बंदरबांट शुरू हो गई। पर उस ग्रीक व्यापारी ने जो किया, वह आज भी लोगों को चिमनियों की बुलंदियों में दिखता है, पर उनसे अब धुआं नहीं निकलता।
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यमुना किनारा मार्ग के पास चिमनियों से सटे घर व औद्योगिक परिसर हैं, जो घोटाले की गगनचुंबी हकीकत बयान करते हैं। लेकिन यह कहानी किसी घोटाले की नहीं है। यह उस शख्स की है, जिसके वंशजों ने आगरा को आधुनिक पहचान दी। लेवेंत (आज का सीरिया, जॉर्डन व लेबनान का इलाका) में रहने वाले और यूनान (ग्रीस) के मूल निवासी एंतोनियो जोआनीदेस 18वीं शताब्दी के उन मुसाफिरों में से थे, जिन पर भाग्य की देवी मेहरबान होती है। हीरा व्यापारी एंतोनियो 1801 ईस्वी में भारत की ख्याति सुनकर ही आए थे। भारत आकर उन्होंने व्यापार छोड़ दिया और अंग्रेजी फौज में भर्ती हो गए।
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लॉर्ड कंबरमेयर के नेतृत्व में भरतपुर के लोहागढ़ फोर्ट पर कब्जे के लिए हुई जंग में वह पहले सिपाही थे, जिन्होंने किले में प्रवेश किया था। इसके लिए उन्हें मेडल भी मिला। उन्होंने लेवेंत का अपना नाम बदलकर अंग्रेजी में एंथनी जॉन रख लिया। जॉन ने आगरा को अपना ठिकाना बनाया व फौज छोड़ने के बाद हीरों का कारोबार फिर से शुरू किया। 1855 में उनकी मौत के बाद बेटे निकोलस ने जॉन एंड कंपनी का कारोबार संभाला। निकोलस ने 1887 में स्थापित आगरा स्पिनिंग एंड वीविंग मिल्स पर काम शुरू किया। उनके नौ बच्चों में से एक एडविन ने उनके काम को आगे बढ़ाया।
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यह वह समय था, जब भाप से ही औद्योगिक इकाइयां चलाई जाती थीं। जाॅन की जिनिंग (कपास से बिनौले को अलग करना) फैक्टरी में 600 मजदूर काम करते थे। आसपास और भी कारखाने थे, जिनमें दो हजार से ज्यादा मजदूर काम करते थे। आगरा के रेल नेटवर्क से मुंबई तथा कोलकाता तक सामान की सप्लाई होने लगी। यह आगरा के वैभव का काल था। इस परिवार ने ही जोंस पब्लिक लाइब्रेरी व सेंट मेरी चर्च बनवाया।
बाद में, जॉन परिवार के लोग अमेरिका व यूरोप चले गए और उनकी संपत्ति की बंदरबांट शुरू हो गई। पर उस ग्रीक व्यापारी ने जो किया, वह आज भी लोगों को चिमनियों की बुलंदियों में दिखता है, पर उनसे अब धुआं नहीं निकलता।