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ऐ खय्याम , मेरे मेहबूब मौसिक़ार, मैंने तो नहीं पढ़ना आज तेरे नाम का फ़ातिहा!

Tue, 20 Aug 2019 05:01 PM IST
Sushobhit saktawat सुशोभित सक्तावत
Updated Tue, 20 Aug 2019 05:01 PM IST
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Bollywood Veteran music composer Mohammed Zahur 'Khayyam' passes away
खय्यामः क्यों मरना एक लंबी कहानी है। - फोटो : सोशल मीडिया

बहुतेरे फ़नकार बहुत लम्बी उम्र जीते। बहुतेरे एक लम्बी उम्र जीकर मरते। उनकी उम्र हमारी उम्र के साथ ही वाक़य होती। भले उसी रौ में नहीं, उसी सिलसिले में नहीं! दुनिया में अनगिनत ऐसे लोग होते, जो एक पूरी उम्र हमारे साथ जीते और जीकर मर जाते, पर हमको उनके होने की कोई ख़बर नहीं मिलती। लेकिन उस एक फ़नकार से हमारा एक ताल्लुक़ होता, मरासिम होता। या शायद उससे नहीं उसके फ़न से। फ़र्क़ तो उसके जीने-मरने से भी हमको नहीं पड़ता, लेकिन उसकी मौत हमारे लिए एक ख़बर ज़रूर होती, जिस पर हम ग़ौर करते। बड़ी ऐहतियात से उस ख़बर की तफ़सीलें सुनते।

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हमारे लिए हर मौत एक हादसा नहीं होती। हर मौत से हमारे हवास गुम नहीं होते। जे़हन पर सकता नहीं पड़ता। बहुतेरी मौतें मुलायम क़िस्म की होतीं। हम उनकी ख़बर सुनते और एक मीठा अफ़सोस जताते कि ओह वो मर गया। अगर मर जाने के मायने ये हैं कि ये आदमी अभी कल तक मुझको यहां दिखाई दे रहा था और अब नहीं दिख रहा है तो यक़ीनन आप कह सकते हैं कि अब वो मर गया है।
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अलबत्ता सच कहूं तो हमें उससे भी ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता। हम उस शख़्स को यों भी कहां जानते थे। हम केवल उसके हुनर को जानते थे। उस अहले-सुख़न की निशानियां पहले भी मेरे साथ थीं, आज भी हैं। या शायद मैं ही अब उनके साथ नहीं, लेकिन वो एक दूसरा अफ़साना है।
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सच ये है कि मरना एक मुद्दत है। लोग एक दिन में नहीं मरते। एक दिन में केवल सांस टूटती है। एक दिन केवल मर जाने की ख़बर आती है। लेकिन लोग एक दिन में ख़ाक नहीं होते। मरना एक लम्बी कहानी है।

 

Bollywood Veteran music composer Mohammed Zahur 'Khayyam' passes away
खय्याम जिसने रेशम सरीखी वो धुनें बांधी थीं और एक ज़माना जीता था। - फोटो : सोशल मीडिया

मेरी पैदाइश के बहोत पहले उस फ़नकार ने रेशम सरीखी वो धुनें बांधी थीं और एक ज़माना जीता था। मेरी पैदाइश के पहले वो बहोत नौजवां था। जब मैं नौजवां हुआ तो उन्हीं धुनों से फिर अपने को जोड़ लिया। उनको सुनकर ही सोता, जागता, अपने हालात का तर्जुमा उनके मआनी में करता। इस तरह एक राब्ता बना। ये राब्ता उन धुनों से था या उस शख़्स से, जिस पर वो धुनें नाज़िल हुई थीं, ये तो मालूम नहीं। मेरी पैदाइश के पहले जो नौजवां था, वो आज मर गया, जबके अब तो मैं भी नौजवां नहीं, तो मैं सोग़ किसका मनाऊं? उसका या अपना?

बहुतेरी मौतें मर्गे नागहां नहीं होतीं। सालों साल धीरे-धीरे जलने के बाद एक ख़ुशगवार सुबह ज़िंदगी का फ़ानूस एक सपने की तरह बुझ जाता है। नींद खुलने पर टूटने वाले सपने की तरह नहीं, उस तरन्नुम की तरह जो नींद टूटने के बाद देर तलक हमारे ख़ून में बेख़ुदी की धड़कन की तरह गूंजता है।

लेकिन मरसिये का एक दस्तूर ज़रूर होता है। मरसिये का एक दिन मुअय्यन रहता है। एक दिन मन भरकर, मातम की मसर्रत को चुगने के बाद, अगले रोज़ हम उससे ऊब जाते हैं। ऐन मातम के रोज़ सोग़ ना मनाएं तो यार लोग ही आकर पूछ बैठें के क़िब्ला मोहतरम की रुख़सती पर यों ख़ामोशी क्यूं है। कुछ तो बोलिये! दो रोज़ बाद ये ही आके कहेंगे कि अब तो बिन मौसम का मल्हार है, अब बस भी कीजिये। ज़माना आगे बढ़ चला। कि मातमपुर्सी में इतनी खेंच मुनासिब नहीं।

जिस भरपूर ज़िंदगी का हासिल एक रोज़ की अनमनी मातमपुर्सी हो, उसका यों भी क्या मोल?

मुझे याद है एक दफ़ा गुज़िश्ता ज़माने के एक अदाकार की मौत की ख़बर आई। उस रात मैं देर तलक उसके गाने देखता रहा। उन गानों में वो इतना ज़िंदा मालूम होता था कि गला रूंध गया। यों लगा जैसे ये जवां मौत हो। कि जैसे वो अदाकार यों ही झूमते नाचते अचानक खेत रहा हो। कलेजा पकड़कर गिर पड़ा हो। मैं भूल ही गया था कि धूप-छांह के इस खेल के बाद वो और पचास साल जीया और ख़ूब बूढ़ा होकर मरा था!

लेकिन क्या वो एक दिन में बूढ़ा हो गया था, एक दिन में मर गया था? या वो मरा भी था या नहीं? एक दिन में भला कौन मरता है? और जो एक दिन में नहीं मरता, क्या वो कभी मर सकता है भला?

 

Bollywood Veteran music composer Mohammed Zahur 'Khayyam' passes away
खय्यामः ज़ेहन अब ख़ाक हो गया पर धुनें रह गईं। - फोटो : सोशल मीडिया

मरसिये का दस्तूर ही सही, रिवाज़ ही ठीक, पर मुझको मालूम नहीं मैं कैसे मातम करूं। खय्याम  मर गया, आप बतलाते हैं, मैं चुपचाप सुन लेता हूं। अब ये असूल है, क़ायदा है के ऐसे मौक़े पर आप उनके फ़न की, उनके ख़ुलूस की ख़ुसूसियत गिनाएं। यों ये अपने में एक बेकार क़वायद नहीं, पर मैं समझ नहीं पाता मैं ये आज क्यूं करूं? मेरी पैदाइश के पहले जो नौजवां था, मेरी नौजवानी के बाद जो मरा, उससे मेरा यों भी क्या राब्ता, सिवाय इस तआर्रुफ़ के कि ये था वो ज़ेहन, जिस पर वो जादुई धुनें तारी हुईं! वो ज़ेहन अब ख़ाक हो गया पर धुनें रह गईं, तो अब मैं किस पर रोऊं?

ऐ खय्याम , मेरे मेहबूब मौसिक़ार, मैंने तेरे बाबत् ख़ूब बातें करना हैं, पर आज ना करुंगा। आज भला क्यूं करूं? आज हुआ ही क्या है? याद है, मख़दूम की एक ग़ज़ल को तुमने धुन में बांधा था, और उसको फूलों की सिफ़त अता की थी। दो हज़ार पंद्रह की एक तमाम शाम में वो गाना गुनगुनाता रहा और थककर हार गया था। मैं अपने भीतर फिर उस शाम को तलाशूंगा, ये शामे ग़म की क़सम है मुझको। जिस दिन वो मेरे डौल में जागी, मैं उसको उसी दिन गाऊंगा। जीऊंगा। मरूंगा।

ऐ खय्याम , मेरे मेहबूब मौसिक़ार, मैंने तो नहीं पढ़ना आज तेरे नाम का फ़ातिहा!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।       

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