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हवाओं की दस्तक: जब राजेश खन्ना ने कहा- हम 34 हजार फीट की ऊंचाई पर बात करेंगे और फिर बदल गई भारतीय राजनीति ..!

Fri, 30 Jun 2023 09:25 PM IST
Noida Published by: अनुराग चतुर्वेदी Updated Fri, 30 Jun 2023 09:25 PM IST
सार

वे बिज़नेस क्लास में थे। मैं इकॉनॉमी क्लास में था। हम लोगों के रास्ते जुदा हो गए। हवाई जहाज़ उड़ा और जल्दी ही अपनी नियत ऊंचाई पर पहुंच गया। मुंबई-लंदन जहाज़ में कमोबेश भीड़ रहती है और फिर एयर इंडिया हो तो क्या कहने, तभी हलचल हुई, काका जिन्हें मैंने अपना सीट नम्बर बताया था, उन्होंने एयर होस्टेस को भेज मुझे ऊपर बुलाया। उन्होंने सफ़ेद कुर्ता-धोती जैसे आरामदायक वस्त्र पहने थे। हमारी बात राजनीति से शुरू हुई, तब उनकी राजीव गांधी से मित्रता हुई थी और वे उन्हें राजनीति में आने के लिए कह रहे थे।

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bollywood actor rajesh khanna and his entry in politics know the interesting facts of book hawaon ki dastak by
हमारी बात राजनीति से शुरू हुई, तब उनकी राजीव गांधी से मित्रता हुई थी और वे उन्हें राजनीति में आने के लिए कह रहे थे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मेरी पहली विदेश यात्रा समाप्ति पर थी। फ़्रान्स और उसके बाद इंग्लैण्ड गया था। पेरिस और लंदन ही दो मुख्य शहर थे। यात्रा फ़्रांसीसी क्रांति के 150 वर्ष के मौक़े पर हुई थी और इसका आयोजक सोशलिस्ट इंटरनेशनल था।

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इस यात्रा का टिकट आने-जाने दोनों के लिए एयर इंडिया का था, इसलिए लौटना भी एयर इंडिया से ही था। जहाज़ में चढ़ते वक़्त मुझे तब और आज भी हर फ़िल्मप्रेमी के दिल में राज करनेवाले राजेश खन्ना दिखे। मैंने उन्हें देख अपना परिचय दिया और कहा मैं फ़िल्मी पत्रकार नहीं हूं राजनीति और सामाजिक विषयों पर लिखता हूं। 

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उन्होंने कहा- 

"ठीक है, जब जहाज़ चौंतीस हज़ार फ़ीट पर उड़ेगा तब हम ज़रूर बात करेंगे।”


वे बिज़नेस क्लास में थे। मैं इकॉनॉमी क्लास में था। हम लोगों के रास्ते जुदा हो गए। हवाई जहाज़ उड़ा और जल्दी ही अपनी नियत ऊंचाई पर पहुंच गया। मुंबई-लंदन जहाज़ में कमोबेश भीड़ रहती है और फिर एयर इंडिया हो तो क्या कहने, तभी हलचल हुई, काका जिन्हें मैंने अपना सीट नम्बर बताया था, उन्होंने एयर होस्टेस को भेज मुझे ऊपर बुलाया। उन्होंने सफ़ेद कुर्ता-धोती जैसे आरामदायक वस्त्र पहने थे। हमारी बात राजनीति से शुरू हुई, तब उनकी राजीव गांधी से मित्रता हुई थी और वे उन्हें राजनीति में आने के लिए कह रहे थे।

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राजेश खन्ना ने सहज रूप से पूछा- 

"यह बताओ राज्यसभा बड़ी होती है या लोकसभा? मुझे कहां जाना चाहिए?”

मैंने उन्हें कहा लोकसभा का दबदबा अधिक होता है, सीधे चुनाव से जीते प्रतिनिधि की कानून बनाने में अहम भूमिका होती है। हर मायने में लोकसभा बड़ी है। राज्यसभा तो संघीय ढांचे में राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। अगर आपको मौक़ा मिलता है तो आप लोकसभा का चुनाव लड़ें और लोकप्रिय हैं, ज़रूर जीत जाएंगे। वे ध्यान से मेरी कही बातें सुन रहे थे। यह 1990 के आसपास की बात है, तब हरियाणा में देवीलाल परिवार का दबदबा था और ओमप्रकाश चौटाला मेहम में हिंसा कर काफ़ी कुख्यात हो चुके थे। हिंसा के कारण वहां चुनाव स्थगित हो चुका था और कांग्रेस नया उम्मीदवार लाने की सोच रही थी।

 

राजेश खन्ना ने हरियाणा की राजनीति की बात की और मेहम से आशा सचदेव नाम की एक बी.ग्रेड की डान्सर को उम्मीदवार बनाने की सम्भावना पर सोचने लगे।

मैंने पूछा, "क्या आप गम्भीरता से बात कर रहे हैं?”

वे बोले, “बिलकुल.”

उन्होंने मुझे कहा, “आप बॉम्बे पहुंच कर एक-दो दिन में उनसे मिल लें। मैं उन्हें फ़ोन से बता दूंगा। आप उन्हें राजनीति पर सलाह दे दो, क्या वो हरियाणा से चुनाव लड़ें?”

मैं आश्चर्यचकित था। राजनीति में सेलिब्रिटी की शुरुआत हो चुकी थी। 

मैंने राजेश खन्ना को कहा-

आपकी बात तो हो गई। मैं भी आपसे अमर-प्रेम फ़िल्म की बात करना चाहता था। आराधना फ़िल्म की बात करना चाहता था। आपके सशक्त अभिनय की बात करनी थी। इसी बीच उन्होंने हम दोनों के लिए खाने का ऑर्डर दे दिया। मेरी फ़िल्मी जिज्ञासा अधूरी ही रह गई। उन्होंने जाते समय मुझे आशा सचदेव का फ़ोन नम्बर दिया और जब हम बॉम्बे पहुंचे तो मुझसे पूछा आपके पास कोई ऐसा सामान हो जो कस्टम से पार लगाना हो तो बताएं। मेरे पास ऐसा कोई सामान नहीं था।


कुछ दिनों बाद मैं राजेश खन्ना की दोस्त आशा सचदेव से मिलने गया जहां वे और उनकी मां रहती थीं। वे सिगरेट पी रही थीं और काका की बात उन्हें याद थी। वे राजनीति और खासकर चुनावी राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानती थी और उनमें राजनीतिक समझ ना के बराबर थी। हरियाणा, मेहम और देवीलाल परिवार से पूरी तरह अनजान थीं। 

मैंने उन्हें राजनीति से दूर रहने को कहा और हमारी बातचीत समाप्त हुई। आशा सचदेव ने मुझे भोजन पर आमंत्रित किया था इसलिए उन्होंने मुझे भोजन कराके विदा किया।

भारत के अधिकांश फ़िल्मी अभिनेता-अभिनेत्री जिन्होंने राजनीति में सक्रियता दिखाई, उनमें मुझे सबसे समझदार राज बब्बर लगे जिनका बैकग्राउंड समाजवादी युवजन सभा का था और जो समाजवादी दल के बाद कांग्रेस में चले गए। राज बब्बर जब समाजवादी पार्टी में थे और मैं महानगर का सम्पादक था तब उन्होंने अंधेरी से विधानसभा का चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया, पर हमारे दो पत्रकार साथियों सुमन्त मिश्र और बाद में साजिद रशीद को राज बब्बर चुनावी मैदान में उतारने में सफल रहे। हालांकि दोनों ही चुनाव जीतने में असफल रहे।

राज्यसभा में ज़रूर हमारे कई पत्रकार मित्र पहुंच गए जिनमें राजीव शुक्ला, भारत कुमार राऊत, कुमार केतकर और हरिवंश हैं।

अनुराग चतुर्वेदी देश के जाने-माने पत्रकार हैं। पत्रकारिता के अलावा एनजीओ के जरिए समाज के सबसे कमजोर तबकों का संबल बनने का सराहनीय प्रयास भी अनुराग जी के खाते में दर्ज है।  उपरोक्त दिलचस्प किस्सा उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक हवाओं की दस्तक’ का हिस्सा है जो शीघ्र ही प्रकाश्य है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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