जय प्रकाश नारायण जयंती विशेष: लोकतंत्र के लिए नैतिकता को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे लोकनायक
जेपी की मान्यता है कि जब तक सत्ता और शक्ति का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, तब तक संसदीय लोकतंत्र में केंद्रवाद की मजबूती सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के बुनियाद को कभी मजबूत नहीं कर सकती। मौजूदा लोकतंत्र में जनता की इतनी ही ताकत है कि वह किसी दल की सरकार को सत्तारूढ़ कर सकती है अथवा सत्ता से बेदखल कर सकती है।
विस्तार
जयप्रकाश नारायण ने सन 1959 में ''भारतीय- राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना: एक सुझाव'' नामक पुस्तिका लिखी। इस पुस्तिका में जेपी ने प्राचीन अनुभवों तथा आधुनिक आवश्यकताओं के परिपेक्ष में भारतीय राज्य व्यवस्था के पुनर्निर्माण की आवश्यकता को महसूस किया और तदनुसार एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दस्तावेज देश के समक्ष प्रस्तुत किया।
इस दस्तावेज में यह बताया गया है कि कैसे लोकतंत्र जिसे जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा बेहतर राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश जाता है, उसमें दरअसल चुनावों के अलावा जनता की व्यापक भागीदारी होती ही नहीं है।
जेपी की मान्यता है कि जब तक सत्ता और शक्ति का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, तब तक संसदीय लोकतंत्र में केंद्रवाद की मजबूती सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के बुनियाद को कभी मजबूत नहीं कर सकती। मौजूदा लोकतंत्र में जनता की इतनी ही ताकत है कि वह किसी दल की सरकार को सत्तारूढ़ कर सकती है अथवा सत्ता से बेदखल कर सकती है। इसके अलावा लोकतंत्र के विषय में ज्यादा कुछ दावा कोरी बकवास है अथवा शब्दों का अपव्यय।
संसदीय लोकतंत्र मे दलीय प्रणाली की खामियों को इंगित करते हुए जे पी कहते हैं-
आज संसदीय लोकतंत्र में जो दलीय प्रणाली काम कर रही है, उसमें जनता की इतनी ही भूमिका है कि वह दलों द्वारा चुने प्रतिनिधियों को पांच साल के नियमित समय पर चुन लें,जो उनके कल्याण की चिंता करेगा।
जेपी का आग्रह एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था से है, जिसमें अधिक से अधिक लोग अपना अधिक से अधिक शासन कर सकें। लोकतंत्र के बारे में अपने विचार स्पष्ट करते हुए जेपी ने कहा है कि- पहली बात यह कि लोकतंत्र की समस्या मूलतः नैतिक समस्या है। संविधान, शासन प्रणाली, निर्वाचन ये लोकतंत्र के अनिवार्य अंग है, किंतु जब तक लोगों में नैतिकता की भावना नहीं रहेगी, लोगों का आचार- विचार ठीक नहीं रहेगा, तब तक अच्छे से अच्छे संविधान और राजनीतिक प्रणाली के बावजूद लोकतंत्र ठीक से काम नहीं कर सकता।
लोकतंत्र के लिए नैतिक गुण और मानसिक प्रवृत्तियां आवश्यक है: पहला सत्य के प्रति निष्ठा, हिंसा से विरक्ति। स्वातंत्र्य से प्रेम और दमन-उत्पीड़न से प्रतिरोध का साहस। सार्वजनिक हित के साथ अपने हित की संगति। दूसरे के विचारों को तवज्जो देने का भाव और सहिष्णुता। उत्तरदायित्व वहन करने के लिए तैयार रहना। सबको समान समझने की भावना ,आस्था और मानव स्वभाव के सुधार के प्रति विश्वास।
यह प्रवृत्तियां किसी मनुष्य में जन्मजात तो नहीं होती, लेकिन शिक्षण द्वारा इन्हें प्राप्त करना और उसे अपने जीवन में ढाल लेना संभव है। यह लोकतंत्र की सफलता की निम्नतम शर्तें हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि किसी जीवंत लोकतंत्र में समयानुकूल संसोधन- परिष्कार लोकतंत्र के बुनियादी सरोकारों को मजबूती प्रदान करता है।
जेपी लोकतंत्र की प्रचलित परिभाषा को समाज की आवश्यकताओं और अपने अनुभव के आलोक में एक कुशल समाज वैज्ञानिक की तरह निरंतर जांचते-परखते और पड़ताल करते चलते हैं और इस वजह से वे इस निष्कर्ष पर पहुंच सकें कि संसदीय लोकतंत्र में चाहे जितना सुधार हो, इसके मूलभूत दोष बने ही रहेंगे, क्योंकि इसका ढांचा ही गलत बुनियाद पर खड़ा है। फिर भी लोकतंत्र के हिमायती इससे संतुष्ट है कि इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं है।
संसदीय व्यवस्था में संशोधन
एक सीमा के भीतर संसदीय व्यवस्था में संशोधन और सुधार संभव है। जेपी का कहना है कि व्यक्तिगत मतदान पर आधरित, समाज का विकीर्ण रूप ही इस प्रणाली का जनक है। यह कि राज्य व्यक्तियों का योगात्मक स्वरूप नहीं हो सकता। राष्ट्र या समुदाय को जनता के वैयक्तिक मतदान के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है।
जेपी इस संदर्भ में वाल्टर लिपमैन को उद्धृत करते है कि भले ही इसका कोई आधार न हो पर सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि मतदान द्वारा लोग अपना अभिमत व्यक्त करते हैं, उसे हम व्यापक रूप से मुक्त तंत्र की संज्ञा देते हैं।
आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह मान्यता ही गलत है। 20वीं शताब्दी के सामूहिक आम चुनावों का अनुभव हमें बताता है कि स्थिति ठीक इसके विपरीत है। जिन समूहों को पूरी सूचना मिलनी चाहिए और जिससे अपने पक्ष की बात किया जाना चाहिए, वह जैसे-जैसे विशाल और विविधता पूर्ण होता जाता है वैसे-वैसे वोटों द्वारा प्राप्त जनमत अवास्तविक होता जाता है। (वाल्टर लिपमैन: द पब्लिक फिलासफी -1956)
संसदीय लोकतंत्र के समर्थकों का दावा है की संपूर्ण जनमत का नहीं तो कम से कम बहुमत के प्रतिनिधित्व करने का दवा तो सरकार कर ही सकती है। पर अक्सर यह देखा जाता है कि इस दावे में भी सच्चाई उतनी नहीं है।
अभी हाल में सम्पन्न हरियाणा और जम्मू कश्मीर के चुनावों से यह बात साबित होती है कि 25% से कम वोट पाकर नेशनल कांफ्रेंस की सरकार जम्मू और काश्मीर में बनने जा रही है, जबकि 40% से कम वोट पाकर बीजेपी हरियाणा में सरकार बना लेती है। मतलब यह की इन दोनों राज्यों में सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों में कोई भी दल कम से कम 50% वोट प्राप्त करने का आंकड़ा नहीं पार कर सका।
लोकतांत्रिक प्रणाली पर खतरा
आज चुनावों में वोट प्राप्त करने के लिए जिस तरह के झूठ-फरेब और असत्य तथ्यों को सत्य की तरह परोसने और जनमत को प्रभावित करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उससे लोकतांत्रिक प्रणाली पर यह खतरा पैदा हो रहा है कि जनता उसके बहकावे में आकर अगर निर्णय करने लगे, तो फिर सत्य निष्ठा के प्रति वफादारी, जनहित में किये सरकार के कल्याणकारी कामों का क्या हश्र होगा?
यह भी एक हकीकत है कि जनता के निर्णय करने के अपना अलग पैमाना होता है। हर चुनावों में ज्यादातर फैसले जनता ने ऐसा किया कि तमाम राजनीतिक पंडितों के अनुमान धरे के धरे रह गये। जैसा कि हालिया हरियाणा चुनाव में देखने को मिला।
जे.पी को यह शिकायत है कि सार्वजनिक हित से संबंध किसी प्रश्न को भी जनता के सामने ठीक से प्रस्तुत करने के बजाय तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है। नतीजतन राष्ट्रीय हितों की ऐसे मामले में बलि चढ़ जाती है। जे पी की नजर में संसदीय लोकतंत्र की एक सबसे बड़ी खामी यह है कि इसके एक छोर पर केंद्र और दूसरे छोर पर राज्य और बीच में वैयक्तिक मतदाताओं से पर्याप्त दूरी।
जिस लोकतंत्र में सर्वस्व सत्ताधारी जनता मरुस्थल में बालू कणों की तरह बिखरी हो, उसके तथा राज्य शक्ति के बीच कोई अन्य सुसंगठित राज्यशक्ति न हों, उसका स्वाभाविक परिणाम है नौकरशाही की निरंकुशता। इसलिए जरूरी है कि प्रशासनिक कार्यों में भी जनता की अधिक से अधिक भागीदारी संभव हो, ताकि नौकरशाही की निरंकुशता पर अंकुश लगाया जा सके और जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराया जा सके।
जे पी लोकतंत्र में धन के बढ़ते असर को भी लोकतंत्र के लिए घातक मानते हैं। धन के बढ़ते प्रभाव का ही कमाल है कि बड़े-बड़े दल अपने पक्ष में प्रचार करने के लिए धन की गठरी का इस्तेमाल कर निर्वाचन को अपने पक्ष में प्रभावित करते हैं। इसका असर जे पी की नजर में यह है कि ऐसा निर्वाचन मतदाताओं का नहीं बल्कि उन शक्तियों और हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो दलों को शिखंडी बनाकर अपना काम साधने में तत्पर रहते हैं।
इससे यहीं निष्कर्ष निकालता है कि केवल अधिनायकवादी देशों में ही जनहित को नजरंदाज नहीं किया जाता, बल्कि संसदीय लोकतंत्र में जनहित को कुचलने वालों की होड़ लगी लगी रहती है ताकि सत्ता के वर्चस्व की चुनौती देने वाला कोई प्रतिद्वंदी ही न रहें।
जनप्रतिनिधियों पर नैतिक अंकुश जरूरी
लोकतंत्र की इन तमाम खूबियों और खामियों पर विचार करने के बाद जे पी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जहां जनता की व्यापक भागीदारी लोकतंत्र की सफलता की न्यूनतम शर्त है, वहीं चुने जनप्रतिनिधियों पर नैतिक अंकुश लगाने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दलों के बजाय उम्मीदवारों का चयन जनता के द्वारा हों और अगर वे ठीक से काम न करें, तो जनता को उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।
बिहार में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने जे पी के इस सुझाए राह पर चलने की घोषणा किया है। इसके लिए पांच साल इंतजार करने की जरूरत नहीं होना चाहिए। गांधी की तरह जयप्रकाश भी यह मानते हैं कि वह सरकार सबसे बेहतर होती है, जो सबसे न्यूनतम शासन करती है।
संसदीय लोकतंत्र में मौजूदा दलीय प्रणाली पर विचार करते हुए जे पी का यह मानना है कि यह लोगों को डरपोक और नपुंसक बना रही है। इस दलीय पणाली ने इस तरह से काम नहीं किया कि जनता को अपनी व्यवस्था संभालने में सहायता मिले। जे पी मानते हैं कि मनुष्य प्रकृति और संस्कृति दोनों की उपज है। अतः संतुलित विकास के लिए आवश्यक है कि दोनों के बीच मधुर और समरसता का सम्बन्ध बना रहे।
एक सफल लोकतंत्र के लिए यह समझना भी जरूरी है कि आर्थिक संपन्नता का मतलब भौतिक पदार्थों की अत्यधिक उपलब्धता नहीं है। आत्म संतुष्टि, आत्म संयम और स्वयं आरोपित सीमा बंधन, साथ ही यह भी ध्यान रखना कि प्रकृति के अप्राप्त साधन बर्बाद न होने पाएं।
इस संदर्भ में ई एफ शुमाखेर का कहना है कि वन्य तथा कृषि जैसे पुनः प्राप्य पदार्थों पर खड़ी सभ्यता निश्चित ही उस सभ्यता से श्रेष्ठ है जो लोहा कोयला और तेल पर आधारित है। यह सभ्यता क्षणभंगुर ही रहेगी। दरअसल भारतीय सभ्यता- संस्कृति और नैतिकता पर आधारित लोकतंत्र ही जे पी के सपनों का लोकतंत्र है। यह लोकतंत्र ही सच्चे अर्थों में संसदीय लोकतंत्र की कई खमियों को दुरुस्त करने में भी कामयाब साबित होगा।
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