बिहार की जातीय जनगणना: लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश का "चुनावी गणित" भाजपा के लिए नई चुनौती..!
क्या देश को स्वयं से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि जब हमारा तिरंगा चांद पर पहुंच गया तो सियासी दलों को जाति के आधार पर राजनीति से हटकर देश की मूल समस्याओं जैसे:- गरीब उन्मूलन, लैंगिक असमानता को दूर करना, शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाना, रोजगार के अवसर पैदा करना, नए आविष्कार करना, जल संकट दूर करना जैसे मुद्दों पर केंद्रित करना चाहिए?
क्या देश को स्वयं से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि जब हमारा तिरंगा चांद पर पहुंच गया तो सियासी दलों को जाति के आधार पर राजनीति से हटकर देश की मूल समस्याओं जैसे:- गरीब उन्मूलन, लैंगिक असमानता को दूर करना, शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाना, रोजगार के अवसर पैदा करना, नए आविष्कार करना, जल संकट दूर करना जैसे मुद्दों पर केंद्रित करना चाहिए?
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देश एक बार फिर एक नए मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है, जिस तरह बिहार में जातीय जनगणना कराई गई और उसके आंकड़े जारी किए गए हैं, तो लगता है कि फिर से जातियों की राजनीति पार्टियों के लिए नया हथियार बनेगी। आजादी के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं और सरकार अमृतकाल की बात कह रही है और वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने का संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार दोहरा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या देश फिर विकास की पटरी से उतरकर जाति की ट्रेन पर चढ़ने को तैयार है।
दरअसल, वर्ष 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी की बहुमत वाली चुनावी सफलता ने विपक्षी दलों में वर्ष 2024 से पहले एक बार फिर बेचैनी पैदा की है कि नरेंद्र मोदी पुनः वर्ष 2024 में विजय रथ पर सवार होकर तीसरे कार्यकाल में आ सकते हैं।
पिछले साढ़े नौ साल से विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अलग-अलग मुद्दों पर घेरने की असफल कोशिश करता रहा है, लेकिन जातीय जनगणना का नया हथियार पिछले दिनों बिहार से नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने मिलकर निकाला। कांग्रेस पार्टी भी इस मुद्दे पर मुखर है।
कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी, लेकिन सवाल यह उठता है कि जब दुनिया सभी तरह के भेदभावों को दूर करने की पुरजोर वकालत कर रही है और उसे दिशा में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है तो क्या जाति के आधार पर हिस्सेदारी देने से देश का भला हो पाएगा?
क्या मोदी सरकार के लिए संकट है जातीय जनगणना?
वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा पर 50% की कैपिंग लगा रखी है। फिर भी अपने पिछले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर जनरल कैटेगिरी को 10 प्रतिशत का ईडब्ल्यूएस आरक्षण दिया। देखा जाए तो आरक्षण 50 से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है और अनारक्षित श्रेणी मात्र 40 प्रतिशत रह गई। तमिलनाडु जैसे राज्य तो 65 प्रतिशत से ऊपर आरक्षण दे रहे हैं।
बिहार से निकले जातीय जनगणना के आंकड़े मोदी सरकार के लिए निश्चित रूप से संकट में डालने वाले हैं, क्योंकि बिहार से चली जातीय जनगणना की ट्रेन अब सभी राज्यों में घूमने वाली है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इसके कई स्टॉपेज आपको देखने को मिल जाएंगे। यह भी संभव है कि ओबीसी जातियां फिर से मंडल कमीशन वाली राह पर लौटें और आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग को लेकर देश एक बड़े आंदोलन की तरफ बढ़ जाए। फिर वही सवाल, विकास का क्या होगा।
दरअसल, राजनीति ही देश की कुछ ऐसी है कि जातियों को देखकर टिकट निर्धारित होते हैं। नेता बनते हैं, वरना क्या कारण था कि मेट्रो मेन ई.श्रीधरन केरल में चुनाव हार गए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पिछले दिनों संसद में भारत सरकार में सचिव भी जातियों के आधार पर बांट दिए।
क्या नहीं उठने चाहिए ये सवाल?
क्या देश को स्वयं से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि जब हमारा तिरंगा चांद पर पहुंच गया तो जाति के आधार पर राजनीति से हटकर देश की मूल समस्याओं जैसे:- गरीब उन्मूलन, लैंगिक असमानता को दूर करना, शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाना, रोजगार के अवसर पैदा करना, नए आविष्कार करना, जल संकट दूर करना जैसे मुद्दों पर केंद्रित नहीं होना चाहिए।
क्या आरक्षण को लेकर एक समीक्षा यह नहीं होनी चाहिए कि कौन सी ऐसी जातियां हैं, जो आरक्षण के दायरे में आती हैं, लेकिन उन्हें आज भी इसका लाभ नहीं मिला है।
कुछ खास जातियों को ही आरक्षण का लगातार लाभ मिल रहा है या जिन परिवारों ने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया, वही लगातार आरक्षण के लाभ को लेते आ रहे हैं। जातीय जनगणना के साथ आरक्षण का लाभ ले चुके परिवारों और नहीं लाभ लेने वाले परिवारों की जानकारी भी दी जानी चाहिए। साथ ही, आर्थिक आधार पर भी जातियों की गणना होनी चाहिए। क्रीमीलेयर को सख्ती से निर्धारित किया जाना चाहिए। आज ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जहां परिवार बहुत संपन्न है, लेकिन वह आरक्षण का लाभ जाति के नाम पर ले रहा है।
जाति के आधार पर नए सिरे से आरक्षण की मांग तो उठेगी, लेकिन उसमें उन आरक्षित परिवारों पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है, जिनका उद्धार अभी तक आरक्षण से नहीं हुआ है। आरक्षण की कितनी सीमा रखी जाए, इस पर भी सभी राजनीतिक दलों को बैठकर सोचने की जरूरत है, क्योंकि मेरिट भी जरूरी है।
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