मीडिया और राजनेता: नेताओं को समझनी होगी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कीमत
भारत में बीते एक दशक में पत्रकारों की सुरक्षा और उनके सम्मान को लेकर लगातार खबरें सामने आई हैं। मप्र हो या उप्र या फिर देश का कोई दूसरा राज्य भारत में पत्रकारों के अपमान और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से नेता और सियासतदान लगातार मीडिया की भूमिका पर ना केवल सवाल उठाते रहे हैं बल्कि कई बार उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित भी करते रहे हैं।
भारत में बीते एक दशक में पत्रकारों की सुरक्षा और उनके सम्मान को लेकर लगातार खबरें सामने आई हैं। मप्र हो या उप्र या फिर देश का कोई दूसरा राज्य भारत में पत्रकारों के अपमान और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से नेता और सियासतदान लगातार मीडिया की भूमिका पर ना केवल सवाल उठाते रहे हैं बल्कि कई बार उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित भी करते रहे हैं।
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मीडिया और पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। मीडिया ना केवल लोकतंत्र की आवाज है बल्कि जनता के पक्ष को संसद और सरकार के सामने रखने वाली मजबूत आवाज भी है। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारों और पत्रकारिता का बड़ा योगदान रहा है। आजादी के बाद से ही पत्रकारों ने अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह किया है। भारत में बीते कुछ दशकों में मीडिया का विस्तार तो हुआ है लेकिन पत्रकारों की सुरक्षा और उनके सम्मान में जरूर कमी आई है।
भारत में बीते एक दशक में पत्रकारों की सुरक्षा और उनके सम्मान को लेकर लगातार खबरें सामने आई हैं। मप्र हो या उप्र या फिर देश का कोई दूसरा राज्य भारत में पत्रकारों के अपमान और उनकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से नेता और सियासतदान लगातार मीडिया की भूमिका पर ना केवल सवाल उठाते रहे हैं बल्कि कई बार उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित भी करते रहे हैं।
बात यदि उत्तर प्रदेश करें तो 2012 से 2017 के दौरान मीडिया की स्थिति कैसी थी? 2016 की बात है। अखिलेश शासन का चौथा साल चल रहा था। 'Reporters Without Borders' नाम के संगठन ने 'वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स रिपोर्ट' में उत्तर प्रदेश को भारत में पत्रकारों के लिए 'सबसे खतरनाक क्षेत्रों' में रखा था। रिपोर्ट कहती है कि 2015 में यूपी में 4 पत्रकार मारे गए और हर महीने हमले हुए। 'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया' (PCI) और कुछ मीडिया वॉचडॉग्स (जैसे The Hoot) ने उस समय राज्य में पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया के साथ सरकार के संबंधों पर रिपोर्ट दी थी। सपा सरकार में पत्रकारों पर खतरों को लेकर इन रिपोर्ट्स में स्पष्ट चिंता जाहिर की गई थी।
यूपी सरकार में मीडिया रिपोर्टिंग के खतरों को शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड से अच्छे से समझा जा सकता है। मामला जून 2015 का है। जगेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के एक स्वतंत्र पत्रकार थे, जो मुख्य रूप से फेसबुक पेज 'शाहजहांपुर समाचार' के माध्यम से स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक गतिविधियों पर रिपोर्टिंग करते थे। जगेंद्र ने तत्कालीन पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री राम मूर्ति वर्मा पर अवैध खनन, भूमि कब्जा और एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से गैंगरेप जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। ये पोस्ट मई 2015 में वायरल हुईं, जिसमें जगेंद्र ने वर्मा की संपत्ति और अपराधों पर सवाल उठाए।
अप्रैल 2025 में सपा प्रमुख ने सार्वजनिक मंच से कुछ मीडिया समूहों का बहिष्कार करने की बात कही। आखिर लोकतंत्र में कोई राजनीतिक पार्टी या नेता कैसे किसी मीडिया समूह के बहिष्कार का आह्वान कैसे कर सकता है? नवंबर 2025 में भी आजमगढ़ की एक रैली और संसद सत्र के दौरान मीडिया पर पक्षपाती होने का आरोप लगा।
मीडिया समूहों के बहिष्कार के जरिए वे लोकतंत्र के एक पूरे स्तंभ का बहिष्कार कर रहे हैं। आलोचनात्मक मीडिया को भी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को सकारात्मक ढंग से लेना चाहिए। नेता जब मीडिया पर आरोप लगाते हैं तो उन्हें अपने शासनकाल की तरफ भी नजर घुमाकर देखना चाहिए। कई बार केवल मीडिया पक्षपाती नहीं होता, आपका नजरिया भी पक्षपाती होता है।
(विनम्र सेन सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक के रूप में वह कई मीडिया समूहों में लेखन करते हैं।)