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विमर्श के अभाव में सुलगता देश: योजनाओं की घोषणा और पीछे कदम लेती सरकार

Mon, 27 Jun 2022 02:22 PM IST
Amiy bhushan अमिय भूषण
Updated Mon, 27 Jun 2022 02:22 PM IST
सार

कमोबेश पूरा देश इन दिनों विरोध की लपटों के चपेट में है। केंद्र की ओर से घोषित सैन्य बहाली की नई योजना "अग्निपथ " के खिलाफ उठी चिंगारी देखते ही देखते आग के शोलो में तब्दील हो गई है।

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Agnipath Scheme country is burning in the absence of discussion
अग्निपथ योजना लेकर जहां देश के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में देशवासियों को आश्वस्त किया है। - फोटो : Social media

विस्तार

कमोबेश पूरा देश इन दिनों विरोध की लपटों के चपेट में है। केंद्र की ओर से घोषित सैन्य बहाली की नई योजना "अग्निपथ " के खिलाफ उठी चिंगारी देखते ही देखते आग के शोलो में तब्दील हो गई है। विरोध की इस आग में भारतीय रेलवे की करोड़ों की सम्पत्ति अब तक स्वाहा हो चुकी है।

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अग्निपथ पर खड़े देश को सुलगाने और चोटिल करने की कोशिश अचानक की नहीं है। आगजनी और पत्थरबाजी के सुनियोजित षड्यंत्र की आंच पिछले कुछ दिनों से लगातार लगातार जलाई जा रही थी। 
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लघु अवधि सैन्य सेवा की योजना "अग्निपथ" पर केंद्र सरकार, तीनों सेना के प्रमुख, और सैन्य सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के अलावा सेना के रिटायर्ड वेटरन्स की अपनी अपनी राय है।
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अग्निपथ योजना लेकर जहां देश के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा है की समय आने पर इसका फायदा दिखेगा। वहीं सर्वोच्य सैन्य अधिकारियों ने इसे बहुप्रतीक्षित बताया है, इनके अनुसार सेना सन 1989 से ही इस परिवर्तन को लेकर प्रयत्नशील थी। किंतु उचित समय की प्रतीक्षा में यह लंबित था।


अब जब कोरोना काल के नाते पिछले दो वर्षों से सैन्य बलों मे भर्ती रुकी पड़ी है। ऐसे में इस योजना को लाने का इससे बेहतर अवसर हो ही नहीं सकता। साथ ही सैन्य बलों मे जवानों की नियमित और पूर्ववर्ती भर्ती पर रोक की घोषणा भी सेना कर चुकी है।
 

जहां तक इसके पक्ष में दलीलों की बात करें तो यह युगांतरकारी है। इससे सैन्य बलों की औसत आयु कम होगी। देश को युवा सैनिक मिलेंगे। इनमें से एक चौथाई को आगे स्थाई नियुक्ति भी मिलेगी। वहीं सैन्य बलों में कटौती के कारण भविष्य में भारतीय सेना तकनीकी आधारित युद्ध मे सक्षम होगी। इन अग्निवीरों के लिए अर्धसैनिक एवं पुलिस बलों मे आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई है। वहीं देश के व्यवसायी घरानों के साथ ही विभिन्न राजनैतिक दलों के कार्यालयों में भी इनके लिए सेवा के बेहतर अवसर होंगे।


अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीर बनने वाले इन युवाओं को सेवा अवधि उपरांत लाखों रुपये मिलेंगे। इसके बावजूद भी देश का युवा आक्रोशित है? विपक्षी दल इसे भुनाने और सुलगाने में लगे हैं। जबकि देश विरोधी तत्व इस बहाने फिर एक बार देश जलाने मे लगा है। दरअसल मोदी सरकार में ये कोई पहली घटना नहीं है।

इससे पहले भी किसान आंदोलन, एनआरसी एवं सीएए और एससी एसटी एक्ट दुरुपयोग मामले में ऐसा हो चुका है। अपने आठ वर्षों के कार्यकाल में इन महत्वपूर्ण मसलों पर सोच, साहस एवं पहल के बावजूद सरकार बैकफुट पर रही है। इन सभी मामलों में योजना के निर्माण और उसकी घोषणा अथवा लागूकरण में विमर्श का घोर अभाव रहा है। इन निर्णयों को लेकर लागू करने से पहले देशव्यापी चर्चा या विमर्श का कोई माहौल नहीं खड़ा किया गया।

वहीं इसको लागू किए जाने के साथ देश भर में जिस व्यापक चर्चा संवाद को किया जाना चाहिए ता वो भी होता हुआ नहीं दिखा। सरकार बस फायदे भर गिनाती रही, वहीं नेता मंत्री बयान और ट्वीट कर सबकुछ नियंत्रण में है जैसा संदेश देते रहे। जबकि परिस्थितियां ठीक इसके उलट रही। सहमति संकल्पनाओं के बावजूद भी ये बदलाव वापस लेने परे या फिर लागू नहीं हो पाए। बात अगर हालिया ज्ञानवापी- पैगंबर विवाद की करें तो बिन मांगे ही संघ एवं भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से बयान आने लगे।

Agnipath Scheme country is burning in the absence of discussion
आखिर एक लोकतांत्रिक देश में विरोध को कैसे अनुचित ठहराया जा सकता है। वहीं बलात बंदी और सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान को आखिर कैसे कोई जायज ठहरा सकता है। - फोटो : Social media

अपराध बोध से भरे इन बयानों में न्याय एवं लोकतंत्र की जगह मजहबी भाईचारे की अपील थी। जबकि वादी पक्ष ने न्यायालय से साक्ष्यों के आधार पर यथाशीघ्र निर्णय की गुजारिश की थी। इसके लिए इनकी मांग 1991 के पूजा अधिनियम की निरस्ती, न्यायालय द्वारा ऐसे सभी मामलों में सुनवाई और शीघ्र निपटारे की है। ऐसा ही कुछ कृषि सुधार कानून में भी हुआ। वर्षों से लंबित इस सुधार को लागू होना था।

इसके कई प्रावधान प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी एम एस स्वामीनाथन समिति द्वारा सुझाए गए थे। किंतु महिनों के आंदोलन, हिंसा और पंजाब चुनाव की आहट के नाते इसे पूरी तरह वापस लिया गया। एनआरसी एवं सीएए का मामला भी अब तलक लंबित है। जबकि यह केवल देश के पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों की समस्या नहीं अपितु देश की सुरक्षा और मतांधो से मानवता की रक्षा का भी मसला है।

इसके बावजूद यह शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन और प्रोपगंडा के नाते रुका पड़ा है। एससी एसटी एक्ट दुरुपयोग मामले मे तो सरकार सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तक पलट चुकी है। पुरोधा संगठन के प्रमुख की आरक्षण पर पुनर्विचार के सोच से ही सरकार बहादुर की पेशानी पर बल पड़ने लगता है। जबकि इसका आधार एकात्म मानववाद रूपी समानता का सम्यक दर्शन से जुड़ा है। देशव्यापी संपर्क और करोड़ों सदस्यों के बावजूद भी ऐसे हर मसले पर अटकाव ही दिखता है।

अग्निवीरों के तीरों की तपिश मे हिंसा और विरोध प्रदर्शन जारी है। सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वहीं युवाओं को विरोध प्रदर्शनों से दूरी बरतने अन्यथा भविष्य में सरकारी सेवाओं से मरहूम रहने का संदेश दिया जा रहा है।

आखिर एक लोकतांत्रिक देश में विरोध को कैसे अनुचित ठहराया जा सकता है। वहीं बलात् बंदी और सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान को आखिर कैसे कोई जायज ठहरा सकता है। किंतु क्या बिन पूरी तैयारी के इसे स्थाई तौर पर लागू रखा जा सकता है? क्योंकि शंका एवं विरोध के नाते नित्य थोड़ी बहुत सुविधा घोषणा जारी है।

इससे संबंधित कई संजीदा सवाल है। सैन्य बल के रूप में मिलने वाली सेवा सुविधा सम्मान और बहाली के तौर तरीकों को लेकर युवाओं मे संदेह है। फिर एक ही सैन्य बल मे अधिकारी और जवानों के लिए अलग कानून जायज होंगे! फिलहाल तो इस मुद्दे पर सैन्य अधिकारियों के वक्तव्य से विशेषज्ञ भी हैरान हैं। वहीं अल्पावधि वाले प्रशिक्षण और अनुबंधों वाले सैनिकों के भरोसे देश की सुरक्षा छोड़ी जा सकती है?

अनुबंधों के आधार वाली सेना का विचार कोई नया नहीं है। दुनियाभर में ऐसी सेनाओं का चलन रहा है। आचार्य चाणक्य ने भी अपने सैन्य दल मे भृति सैनिकों को नियुक्त किया था। उन्होंने गुप्तचर सेवा में अनुबंधों के आधार पर बहुरुपिये संग विषकन्याओं का भी चलन था। किंतु तब इनके भरोसे ही राष्ट्र की सुरक्षा नहीं थी।

ऐसे में सरकार को हठधर्मिता छोड़ सोचने की जरूरत है। वैसे भी किसी मसले पर देश का मानस जानने और सर्वप्रथम योजनाओं को सीमित पैमाने पर लागू कर समझने की जरूरत है। अन्यथा देश सुलगता और विमर्श यू ही भटकता रहेगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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