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'दंगल' देख दंगल के लिए तैयार हो रहीं जम्मू-कश्मीर की बेटियां
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
Updated Tue, 03 Jan 2017 07:28 PM IST
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एमए स्टेडिम के इनडोर कांप्लेस में अभ्यास करतीं लड़कियां
- फोटो : AMAR UJALA
आमिर खान की बाक्स आफिस पर हिट फिल्म दंगल ने रियासत की बेटियों में कुछ कर दिखाने के लिए जोश भर दिया है। इस फिल्म ने उन्हें खेल के मैदान पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम चमकाने के लिए प्रेरित किया है।
फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाली कश्मीर की बाल अभिनेत्री जारिया वसीम और फातिमा सना शेख राज्य की युवतियों के लिए रोल माडल बनकर उभरी हैं। उन्होंने अब जूडो, रेसलिंग जैसे जोश भरे खेलों को अपनाने का मन बनाया है। एमए स्टेडियम के इंडोर जूडो हाल में जूडो के साथ रेसलिंग के लिए ऐसी कई बच्चियां पहुंच रही हैं।
रियासत से वर्ष 1996 में पहली महिला रेसलर एवं मौजूदा जम्मू-कश्मीर स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल की जूडो कोच ऋतिका सलाथिया (37) ने बताया कि दंगल फिल्म ने बच्चियों में जबरदस्त बदलाव लाया है। इस फिल्म से प्रेरित होकर चार बच्चियां जूडो और रेसलिंग सीखने के लिए पहुंची हैं।
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वर्ष 2002 से युवतियों को प्रशिक्षण दे रही सलाथिया का कहना है कि जूडो, रेसलिंग जैसे खेलों से युवतियों में आत्मविश्वास, आत्मरक्षा के साथ शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूती मिलती है। जूडो और रेसलिंग के लिए पहुंचीं बहनें कनवी (11) और मेघना (10) ने बताया कि उन्होंने दंगल फिल्म देखने के बाद इस खेल को अपनाने का फैसला लिया है। इसी तरह एक अन्य फ्रे शर सात वर्षीय मन्नत ने कहा कि दंगल फिल्म देखकर उसे महसूस हुआ है कि ऐसे खेलों में भी युवतियां आगे जा सकती हैं।
राज्य से एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक सहित अन्य कई पदक अपने नाम करने वाली निपु जंबाल का कहना है कि जोश भरे खेलों के प्रति हमारी बच्चियों को प्रेरित करने के लिए बालीवुड में और प्रयास होने चाहिएं।
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फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाली कश्मीर की बाल अभिनेत्री जारिया वसीम और फातिमा सना शेख राज्य की युवतियों के लिए रोल माडल बनकर उभरी हैं। उन्होंने अब जूडो, रेसलिंग जैसे जोश भरे खेलों को अपनाने का मन बनाया है। एमए स्टेडियम के इंडोर जूडो हाल में जूडो के साथ रेसलिंग के लिए ऐसी कई बच्चियां पहुंच रही हैं।
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रियासत से वर्ष 1996 में पहली महिला रेसलर एवं मौजूदा जम्मू-कश्मीर स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल की जूडो कोच ऋतिका सलाथिया (37) ने बताया कि दंगल फिल्म ने बच्चियों में जबरदस्त बदलाव लाया है। इस फिल्म से प्रेरित होकर चार बच्चियां जूडो और रेसलिंग सीखने के लिए पहुंची हैं।
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वर्ष 2002 से युवतियों को प्रशिक्षण दे रही सलाथिया का कहना है कि जूडो, रेसलिंग जैसे खेलों से युवतियों में आत्मविश्वास, आत्मरक्षा के साथ शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूती मिलती है। जूडो और रेसलिंग के लिए पहुंचीं बहनें कनवी (11) और मेघना (10) ने बताया कि उन्होंने दंगल फिल्म देखने के बाद इस खेल को अपनाने का फैसला लिया है। इसी तरह एक अन्य फ्रे शर सात वर्षीय मन्नत ने कहा कि दंगल फिल्म देखकर उसे महसूस हुआ है कि ऐसे खेलों में भी युवतियां आगे जा सकती हैं।
राज्य से एशियन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक सहित अन्य कई पदक अपने नाम करने वाली निपु जंबाल का कहना है कि जोश भरे खेलों के प्रति हमारी बच्चियों को प्रेरित करने के लिए बालीवुड में और प्रयास होने चाहिएं।
खस्ताहाल ढांचे में खेलने को मजबूर युवतियां
दंगल
- फोटो : File Photo
सीनियर नेशनल में दो स्वर्ण, आल इंडिया यूनिवर्सिटी में पांच पदक लाने वाली राज्य की श्वेता ठाकुर का कहना है कि खेलों में युवतियों को आगे लाने के लिए राज्य में खेल ढांचे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। चीन में हुई एशियन कैडेट चैंपियनशिप में कांस्य पदक विजेता शिखा भाऊ का कहना है कि राज्य में युवा प्रतिभा में कोई कमी नहीं है, लेकिन उसे बाहर लाने के लिए उचित प्रयास नहीं किए जाते हैं।
बालीवुड में एक तरफ दंगल जैसी फिल्में युवतियों को खेलों को आगे लाने के लिए प्रेरित कर रही हैं, लेकिन राज्य में हालात इसके विपरीत हैं। एमए स्टेडियम जम्मू के इंडोर जूडो कक्ष में खस्ताहाल मैट पर महिला खिलाड़ी खेलने को मजबूर हैं। हालत यह है कि प्रशिक्षण के लिए लगाए गए अधिकांश मैट खराब पड़े हुए हैं। उनके किनारे खस्ताहाल हैं।
इससे अभ्यास के दौरान हमेशा गंभीर चोट लगने का खतरा रहता है। स्टैंडर्ड साइज से भी जूडो, रेसलिंग हाल काफी छोटा है। ढांचागत सुविधाओं में क्रश मेट, डम्मी, हैंगिंग रोप, पोलिंग रोप, जिम के उपकरण कुछ नहीं है।
बालीवुड में एक तरफ दंगल जैसी फिल्में युवतियों को खेलों को आगे लाने के लिए प्रेरित कर रही हैं, लेकिन राज्य में हालात इसके विपरीत हैं। एमए स्टेडियम जम्मू के इंडोर जूडो कक्ष में खस्ताहाल मैट पर महिला खिलाड़ी खेलने को मजबूर हैं। हालत यह है कि प्रशिक्षण के लिए लगाए गए अधिकांश मैट खराब पड़े हुए हैं। उनके किनारे खस्ताहाल हैं।
इससे अभ्यास के दौरान हमेशा गंभीर चोट लगने का खतरा रहता है। स्टैंडर्ड साइज से भी जूडो, रेसलिंग हाल काफी छोटा है। ढांचागत सुविधाओं में क्रश मेट, डम्मी, हैंगिंग रोप, पोलिंग रोप, जिम के उपकरण कुछ नहीं है।