छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्वभर में पहचान दिलाने वाली पंडवानी की महान कलाकार और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। शनिवार देर रात रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। 70 वर्षीय तीजन बाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन की खबर मिलते ही प्रदेश सहित देशभर के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
2 of 7
तीजन बाई
- फोटो : अमर उजाला
भिलाई के गनियारी गांव की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने वाली तीजन बाई ने पंडवानी को नई पहचान दी। महाभारत की कथाओं को उन्होंने जिस अंदाज में मंच पर जीवंत किया, वह उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। उनकी बुलंद आवाज, प्रभावशाली अभिनय और दमदार प्रस्तुति ने लाखों लोगों को पंडवानी का दीवाना बनाया।
3 of 7
तीजन बाई
- फोटो : अमर उजाला
महज 13 वर्ष की उम्र में सार्वजनिक मंच पर पहली प्रस्तुति देने वाली तीजन बाई के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया, जब रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश के प्रमुख मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे कई देशों में भारतीय लोक संस्कृति की प्रतिनिधि बनकर पहुंचीं और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया।
4 of 7
तीजन बाई ने एक नहीं कई भावों पर अभिनय किया
- फोटो : अमर उजाला
कापालिक शैली की सबसे बड़ी पहचान बनीं
तीजन बाई पंडवानी की कापालिक शैली की सबसे लोकप्रिय कलाकार थीं। इस शैली में कलाकार केवल कथा नहीं सुनाता, बल्कि पात्रों को मंच पर जीता है। तीजन बाई भीम, अर्जुन, द्रौपदी और दुर्योधन जैसे पात्रों के भावों को अपने अभिनय और आवाज के माध्यम से साकार कर देती थीं। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता तो कभी अर्जुन का धनुष। चेहरे के हाव-भाव, ऊर्जावान आवाज और मंच पर उनकी सक्रियता दर्शकों को पूरी तरह महाभारत के संसार में ले जाती थी।
5 of 7
लोककला की वैश्विक पहचान बनीं तीजन बाई
- फोटो : अमर उजाला
लोकभाषा और अभिनय ने बनाया अलग मुकाम
उन्होंने पारंपरिक कथा में स्थानीय बोली, लोक मुहावरे और हास्य का ऐसा समावेश किया कि पंडवानी हर वर्ग के लोगों तक पहुंच गई। यही वजह रही कि उनकी प्रस्तुतियां केवल भारत ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड, तुर्की, मॉरीशस समेत कई देशों में भी सराही गईं।