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CG: पंच से लेकर राष्ट्रपति तक हर चुनाव में किस्मत आजमाने वाले सुल्तान सिंह का निधन, इलाके में शोक की लहर
Fri, 27 Feb 2026 02:06 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Fri, 27 Feb 2026 02:06 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक फिजा में अपनी अनोखी पहचान बनाने वाले सुल्तान सिंह अब नहीं रहे। गुरुवार को शहर से सटे ग्राम चौबेबंधा में पैरी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
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सुल्तान सिंह का निधन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक फिजा में अपनी अनोखी पहचान बनाने वाले सुल्तान सिंह अब नहीं रहे। गुरुवार को शहर से सटे ग्राम चौबेबंधा में पैरी नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और बड़ी संख्या में लोगों ने पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
सुल्तान सिंह 1980 और 1990 के दशक में अपने अलग अंदाज़ और जुझारू राजनीतिक सफर के लिए जाने जाते थे। उन्होंने पंच से लेकर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक चुनाव लड़कर सबको चौंकाया। हालांकि वे किसी भी चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सके, लेकिन चुनावी मैदान से उनका रिश्ता कभी टूटा नहीं। उनके लिए चुनाव सिर्फ राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र में भागीदारी का उत्सव था।
वे छत्तीसगढ़ के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और बिहार से भी चुनाव मैदान में उतरे। अलग-अलग समय में उन्होंने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, वहीं कई बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी अपनी दावेदारी पेश की। बताया जाता है कि उनका समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से अच्छा परिचय था। राजिम विधानसभा चुनाव में उन्हें ‘बकरी छाप’ चुनाव चिन्ह मिला था, जिसे लेकर उन्होंने पूरे क्षेत्र में जोरदार प्रचार अभियान चलाया था।
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उनकी पहचान सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं थी। बुलेट मोटरसाइकिल की गूंजती आवाज, तनी हुई मूंछें और बेबाक अंदाज़ ने उन्हें इलाके में अलग मुकाम दिया। वे जहां भी जाते, लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार वे स्पष्टवादी, निडर और अपने विचारों पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे।
हालांकि खुद पंच का चुनाव जीतने में वे सफल नहीं हो पाए, लेकिन अपनी पत्नी को सरपंच पद पर विजयी बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनके राजनीतिक कौशल और संगठन क्षमता का उदाहरण माना जाता है। उनके करीबी विष्णु राम जांगड़े के अनुसार सुल्तान सिंह को राजनीति की गहरी समझ थी और वे बड़े नेताओं से संवाद बनाए रखते थे। उनका नाम पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से भी जोड़ा जाता रहा।
जीवनभर चुनावी हार का सामना करने के बावजूद उनका आत्मविश्वास कभी कम नहीं हुआ। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी के प्रतीक माने जाते थे। उनके निधन के साथ क्षेत्र ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जो जीत से ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखता था।
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सुल्तान सिंह 1980 और 1990 के दशक में अपने अलग अंदाज़ और जुझारू राजनीतिक सफर के लिए जाने जाते थे। उन्होंने पंच से लेकर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति तक चुनाव लड़कर सबको चौंकाया। हालांकि वे किसी भी चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सके, लेकिन चुनावी मैदान से उनका रिश्ता कभी टूटा नहीं। उनके लिए चुनाव सिर्फ राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र में भागीदारी का उत्सव था।
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वे छत्तीसगढ़ के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और बिहार से भी चुनाव मैदान में उतरे। अलग-अलग समय में उन्होंने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, वहीं कई बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी अपनी दावेदारी पेश की। बताया जाता है कि उनका समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से अच्छा परिचय था। राजिम विधानसभा चुनाव में उन्हें ‘बकरी छाप’ चुनाव चिन्ह मिला था, जिसे लेकर उन्होंने पूरे क्षेत्र में जोरदार प्रचार अभियान चलाया था।
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उनकी पहचान सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं थी। बुलेट मोटरसाइकिल की गूंजती आवाज, तनी हुई मूंछें और बेबाक अंदाज़ ने उन्हें इलाके में अलग मुकाम दिया। वे जहां भी जाते, लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार वे स्पष्टवादी, निडर और अपने विचारों पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे।
हालांकि खुद पंच का चुनाव जीतने में वे सफल नहीं हो पाए, लेकिन अपनी पत्नी को सरपंच पद पर विजयी बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनके राजनीतिक कौशल और संगठन क्षमता का उदाहरण माना जाता है। उनके करीबी विष्णु राम जांगड़े के अनुसार सुल्तान सिंह को राजनीति की गहरी समझ थी और वे बड़े नेताओं से संवाद बनाए रखते थे। उनका नाम पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से भी जोड़ा जाता रहा।
जीवनभर चुनावी हार का सामना करने के बावजूद उनका आत्मविश्वास कभी कम नहीं हुआ। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी के प्रतीक माने जाते थे। उनके निधन के साथ क्षेत्र ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जो जीत से ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखता था।