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Mungeli: एक गांव ऐसा जहां नहीं होता रावण का दहन, निकाली जाती है राजा की सवारी, 44 गांवों के लोग होते हैं शामिल

Tue, 24 Oct 2023 07:25 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, मुंगेली
अमर उजाला नेटवर्क, मुंगेली Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 24 Oct 2023 07:25 PM IST
सार

मुंगेली जिला मुख्यालय से महज दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत कन्तेली में 16वीं सदी से चली आ रही है एक अनोखी परंपरा है। यहां राजा की सवारी निकलती है लेकिन रावण का दहन नहीं होता है।

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Ravana burning does not happen in a village in Mungeli
कन्तेली में नहीं होता रावन का दहन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मुंगेली जिला मुख्यालय से महज दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत कन्तेली में 16वीं सदी से चली आ रही है एक अनोखी परंपरा है। यहां राजा की सवारी निकलती है लेकिन रावण का दहन नहीं होता है। राजा के दर्शन के लिए 44 गांवों से ग्रामीण एकत्रित होते हैं। राजा कुल देवी मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा कर पूरे क्षेत्र में खुशहाली की कामना करते हैं।

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छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव

जिस प्रकार केरल में मान्यता है कि दशहरे के दिन राजा बली अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए पाताललोक से बाहर आते हैं और प्रजा उन्हें सोनपत्ती देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करती है। कुछ ऐसी ही परंपरा मुंगेली जिले के कन्तेली गांव में है, जो दशकों से चली आ रही है। यह छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव है, जहां दशहरा में मेला तो लगता है लेकिन रावण का दहन नहीं होता है।

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44 गांव के लोग होते हैं एकत्रित

16वीं सदी से चली आ रही यह परंपरा दशहरे के दिन होती है। मेले में आस-पास के करीब 44 गांव के लोग शामिल होते है। यहां के राजा यशवंत सिंह के महल से एक राजा की सवारी निकलती है, जिसमें लोग शामिल होकर नाचते-गाते कुल देवी के मंदिर तक पहुंचते हैं। राजा यशवंत सिंह के द्वारा कुल देवी मां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा कर पूरे क्षेत्र की खुशहाली की कामना करते हैं। इतना ही नहीं इसके बाद राजमहल में एक सभा का आयोजन किया जाता हैं, जहां ग्रामीणों के द्वारा राजा को सोनपत्ती भेंट कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

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इसका भी एक इतिहास है  

कंतेली जमीदारी के प्रथम पुत्र गजराज सिंह के द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व सन 1944 में राजा पोखराज सिंह द्वितीय के मृत्यु के बाद तत्कालीन राज माता पिनांक कुमारी देवी द्वारा स्वतंत्रता के बाद यशवंत कुमार सिंह राजा को दत्तक पुत्र बनाया गया था तब से मंदिर के देख रेख एवं इनके द्वारा किया जा रहा था। 30 वर्षों से यशवंत कुमार सिंह के संरक्षण में मां महामाया समिति संचालित था जो नवरात्रि पर्व में ज्योति कलश एवं पूजन आयोजन करते हैं अभी मंदिर का जीणोद्धार वर्तमान मंदिर टृस्ट के द्वारा सतत जारी है। 


इस साल नहीं निकलेगी राजा की सवारी

अशोक कुमार बड्डगैया ज्योतिषाचार्य ट्रस्ट अध्यक्ष व छोटे राजा घनश्याम सिंह के द्वारा बताया गया की हर वर्ष जो राजमहल से राजा की सवारी निकाली जाती थी वो इस साल नहीं निकाली जायेगी क्योंकि जो राजा का पुत्र था स्व.गुनेंद कुमार सिंह थे उनका कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गया और अभी तक राजतिलक किसी का नहीं हुआ है।   इसी कारण इस साल राजा की सवारी नहीं निकाली जायेगी और जो मेला लगता है ओ हमेशा की तरह इस साल भी मेला लगेगा। 



 
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