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छत्तीसगढ़: क्या रावण का पुतला जलाना मानवाधिकार हनन है…जानिए आयोग ने क्यों हाथ खड़े कर दिए
Mon, 28 Sep 2026 04:29 PM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Mon, 28 Sep 2026 04:29 PM IST
सार
छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग में रावण का पुतला जलाने को मानवाधिकार हनन बताते हुए शिकायत पहुंची। आयोग ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया। जानें आयोग ने क्या कहा...
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग के समक्ष अक्सर ऐसे मामले भी पहुंचते हैं, जो सीधे तौर पर मानवाधिकारों के दायरे में नहीं आते। आयोग को लगभग 3 से 4 हजार ऐसी फर्जी अथवा अनपेक्षित शिकायतें मिली हैं। एक अनोखे मामले में आवेदक ने रावण का पुतला जलाए जाने को मानवाधिकारों का हनन बताते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायतकर्ता का तर्क था कि रावण की तुलना में दुर्योधन ने कहीं अधिक गंभीर और बड़े पाप किए थे, फिर भी दुर्योधन के बजाय रावण का ही पुतला क्यों जलाया जाता है। आयोग ने शिकायतकर्ता को समझाते हुए स्पष्ट किया कि रावण मानव की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए यह विषय मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर है।
आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष गिरधारी नायक ने सोमवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि आयोग में वर्ष 2000 से 2026 तक की अवधि में लगभग 74 हजार प्रकरण सुनवाई के लिए पहुंचे हैं। इन्हीं में ऐसे अनपेक्षित मामले में शामिल थे। हालांकि, आयोग ने अधिकांश मामलों का निराकरण कर दिया है, जबकि लगभग 900 मामले वर्तमान में लंबित चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि लंबित मामलों में से अधिकतर प्रकरण पिछले एक से दो वर्षों के हैं, जिन्हें शीघ्रता से सुलझाने के लिए विशेष प्रयास जारी हैं। इसके साथ ही आयोग में दर्ज कुल शिकायतों में से लगभग 40 से 45 प्रतिशत मामले सामाजिक बहिष्कार की समस्याओं से जुड़े होते हैं।
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सामाजिक बहिष्कार और पेंशन से जुड़े मामले ज्यादा
छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग के सामने आने वाले कुल प्रकरणों में 40 से 45 प्रतिशत शिकायतें सामाजिक बहिष्कार की होती हैं। हालांकि, प्रकरणों की विस्तृत पड़ताल के बाद केवल 1 प्रतिशत मामलों में ही दंडात्मक अथवा कानूनी कार्रवाई की स्थिति बनती है। आयोग ऐसे मामलों में आवश्यकतानुसार पक्षकारों को समझाइश देता है, प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करता है या पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश जारी करता है।
सामाजिक बहिष्कार के अलावा पेंशन न मिलने की गंभीर समस्याओं पर भी आयोग ने संज्ञान लिया है। पेंशन से वंचित रहने वाले लगभग 150 प्रकरण आयोग के पास पहुंचे थे। इनमें से कई आवेदक 3 वर्ष, 5 वर्ष या 7 वर्ष से अपनी पेंशन के लिए भटक रहे थे। एक विशेष मामले में संबंधित व्यक्ति को वर्ष 2009 से पेंशन का भुगतान नहीं हुआ था। आयोग ने इन प्रकरणों को गंभीरता से लिया और जिला स्तर पर भ्रमण के दौरान ट्रेजरी अधिकारियों से सीधी चर्चा की। आयोग के इस कदम से लगभग 120 पेंशन प्रकरणों का समाधान हुआ, जिसके बाद कई बुजुर्गों व पेंशनधारियों ने आयोग को धन्यवाद पत्र भी भेजे।
कर्मचारियों के हक और बाल संरक्षण की पहल
आयोग ने महाविद्यालयों के विद्यार्थियों की कॉशन मनी वापस न मिलने और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के बकाये वेतन की शिकायतों का भी समाधान कराया है। शिकायतें मिलने के बाद संबंधित कॉलेजों और शासकीय विभागों को नोटिस भेजे गए, जिसके बाद कर्मचारियों को उनके वेतन का भुगतान संभव हो सका।
साथ ही आयोग ने जिला स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों को अनाथ बच्चों के संरक्षण के संबंध में विशेष निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि अनाथ बच्चों की उचित देखभाल और सुरक्षा आवश्यक है ताकि उन्हें अपराध के रास्ते पर जाने से रोका जा सके। नक्सली संगठन प्रायः अनाथ बच्चों को बहला-फुसलाकर अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा बेहद जरूरी है। इसके अलावा आयोग ने मालवाहक ट्रक चालकों को समूह बीमा का लाभ दिलाने और समाज के लिए महत्वपूर्ण कार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों को उनके अधिकारों एवं सुविधाओं से वंचित न रखने पर जोर दिया है।
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शिकायतकर्ता का तर्क था कि रावण की तुलना में दुर्योधन ने कहीं अधिक गंभीर और बड़े पाप किए थे, फिर भी दुर्योधन के बजाय रावण का ही पुतला क्यों जलाया जाता है। आयोग ने शिकायतकर्ता को समझाते हुए स्पष्ट किया कि रावण मानव की श्रेणी में नहीं आता है, इसलिए यह विषय मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर है।
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आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष गिरधारी नायक ने सोमवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि आयोग में वर्ष 2000 से 2026 तक की अवधि में लगभग 74 हजार प्रकरण सुनवाई के लिए पहुंचे हैं। इन्हीं में ऐसे अनपेक्षित मामले में शामिल थे। हालांकि, आयोग ने अधिकांश मामलों का निराकरण कर दिया है, जबकि लगभग 900 मामले वर्तमान में लंबित चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि लंबित मामलों में से अधिकतर प्रकरण पिछले एक से दो वर्षों के हैं, जिन्हें शीघ्रता से सुलझाने के लिए विशेष प्रयास जारी हैं। इसके साथ ही आयोग में दर्ज कुल शिकायतों में से लगभग 40 से 45 प्रतिशत मामले सामाजिक बहिष्कार की समस्याओं से जुड़े होते हैं।
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सामाजिक बहिष्कार और पेंशन से जुड़े मामले ज्यादा
छत्तीसगढ़ मानव अधिकार आयोग के सामने आने वाले कुल प्रकरणों में 40 से 45 प्रतिशत शिकायतें सामाजिक बहिष्कार की होती हैं। हालांकि, प्रकरणों की विस्तृत पड़ताल के बाद केवल 1 प्रतिशत मामलों में ही दंडात्मक अथवा कानूनी कार्रवाई की स्थिति बनती है। आयोग ऐसे मामलों में आवश्यकतानुसार पक्षकारों को समझाइश देता है, प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करता है या पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश जारी करता है।
सामाजिक बहिष्कार के अलावा पेंशन न मिलने की गंभीर समस्याओं पर भी आयोग ने संज्ञान लिया है। पेंशन से वंचित रहने वाले लगभग 150 प्रकरण आयोग के पास पहुंचे थे। इनमें से कई आवेदक 3 वर्ष, 5 वर्ष या 7 वर्ष से अपनी पेंशन के लिए भटक रहे थे। एक विशेष मामले में संबंधित व्यक्ति को वर्ष 2009 से पेंशन का भुगतान नहीं हुआ था। आयोग ने इन प्रकरणों को गंभीरता से लिया और जिला स्तर पर भ्रमण के दौरान ट्रेजरी अधिकारियों से सीधी चर्चा की। आयोग के इस कदम से लगभग 120 पेंशन प्रकरणों का समाधान हुआ, जिसके बाद कई बुजुर्गों व पेंशनधारियों ने आयोग को धन्यवाद पत्र भी भेजे।
कर्मचारियों के हक और बाल संरक्षण की पहल
आयोग ने महाविद्यालयों के विद्यार्थियों की कॉशन मनी वापस न मिलने और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के बकाये वेतन की शिकायतों का भी समाधान कराया है। शिकायतें मिलने के बाद संबंधित कॉलेजों और शासकीय विभागों को नोटिस भेजे गए, जिसके बाद कर्मचारियों को उनके वेतन का भुगतान संभव हो सका।
साथ ही आयोग ने जिला स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों को अनाथ बच्चों के संरक्षण के संबंध में विशेष निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि अनाथ बच्चों की उचित देखभाल और सुरक्षा आवश्यक है ताकि उन्हें अपराध के रास्ते पर जाने से रोका जा सके। नक्सली संगठन प्रायः अनाथ बच्चों को बहला-फुसलाकर अपने साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा बेहद जरूरी है। इसके अलावा आयोग ने मालवाहक ट्रक चालकों को समूह बीमा का लाभ दिलाने और समाज के लिए महत्वपूर्ण कार्य करने वाले सफाई कर्मचारियों को उनके अधिकारों एवं सुविधाओं से वंचित न रखने पर जोर दिया है।