फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chhattisgarh ›   Raipur News ›   sukma naxal surrender rehabilitation centre mandavi kosa 66 surrendered naxals skill training bastar

छत्तीसगढ़: 20 साल जंगल में भागते रहे, अब नई जिंदगी का ककहरा सीख रहे सरेंडर कर चुके नक्सली

Sat, 03 Oct 2026 02:04 PM IST
Dr. Sanjay Pandey डॉ. संजय पांडेय
Updated Sat, 03 Oct 2026 02:04 PM IST
सार

सुकमा के पुनर्वास केंद्र में रह रहे 44 पुरुष और 22 महिला सरेंडर कर चुके नक्सली अब सामान्य जीवन की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। करीब 20-22 साल तक जंगल में नक्सली जीवन बिताने वाले मांडवी कोसा ने बताया कि कम उम्र में स्थानीय नाटक और संगठन के प्रभाव में वह इस रास्ते पर आए, लेकिन समय के साथ जंगल की जिंदगी बीमारी, लगातार भागदौड़ और अनिश्चितता से भरी होती गई।

विज्ञापन
sukma naxal surrender rehabilitation centre mandavi kosa 66 surrendered naxals skill training bastar
सुकमा में बदल रही 66 सरेंडर नक्सलियों की कहानी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बंदूक उठाकर जंगलों में निकलने के बाद जिंदगी कैसे धीरे-धीरे एक ऐसे रास्ते में बदल गई, जहां न ठिकाना था, न आराम और न भविष्य की कोई निश्चितता...सुकमा के पुनर्वास केंद्र में रह रहे सरेंडर कर चुके नक्सलियों की कहानियां इसकी गवाही देती हैं। यहां 44 पुरुष और 22 महिलाएं अपनी पुरानी जिंदगी छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश कर रहे हैं। 22-23 साल से लेकर 53-54 साल तक की उम्र वाले इन लोगों में ज्यादातर की कहानी अलग-अलग गांवों से शुरू होकर लगभग एक ही मोड़ पर पहुंची जंगल, हथियार, लगातार भागदौड़, बीमारी,मौत और अब अंत में आत्मसमर्पण। मांडवी कोसा भी इन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने जिंदगी के करीब 20-22 साल जंगलों में नक्सली जीवन गुजारने के बाद अब आत्मसमर्पण करके नई जिंदगी शुरू करने का फैसला किया है।
विज्ञापन


विज्ञापन


मांडवी कोसा बताते हैं कि उनके गांव और आसपास के इलाकों में मनोरंजन के साधन लगभग नहीं थे। एक बार गांव में नाटक कंपनी आई। लोग नाटक देखने पहुंचे। नाटक में स्थानीय परंपराओं, लोकगीतों और संस्कृति को दिखाया जाता था। लेकिन नाटक खत्म होते-होते एक अलग संदेश भी बड़े ताकतवर अंदाज में दिया जाता था कि बाहर के लोग आएंगे और उनकी शांतिपूर्ण जिंदगी में खलल डालेंगे।कम उम्र में मांडवी और उनके जैसे कई युवाओं पर इन बातों का असर पड़ा। बाहर की दुनिया के बारे में जानकारी सीमित थी और संगठन की बातें ही उन्हें उस समय सच लगती थीं। धीरे-धीरे वे नक्सली संगठन के साथ जुड़ते चले गए।
विज्ञापन
विज्ञापन


‘रास्ता पहले बहुत अच्छा लगा, फिर दलदल में फंसते गए’

मांडवी अपनी उस जिंदगी को एक ऐसे रास्ते के रूप में याद करते हैं, जो शुरुआत में आसान और आकर्षक लगा, लेकिन बाद में उसी रास्ते से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। उनके मुताबिक कम उम्र और अनुभव की कमी के कारण शुरुआत में उन्हें यह सब रोमांच जैसा लगता था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसकी असली कीमत समझ आने लगी।मांडवी कहते हैं, पहले हमें यह रास्ता बहुत चिकना और अच्छा दिखाई दिया। उम्र भी कम थी, इसलिए मस्ती-मजाक में हम उनके साथ हो लिए। धीरे-धीरे पता चला कि यह रास्ता फिसलन भरा है। हम उसमें फिसलते गए, कीचड़ गहराता गया और आखिर में दलदल में फंस गए।

20-22 साल में न घर रहा, न ठिकाना

जंगल की जिंदगी में स्थायी ठिकाना लगभग नहीं था। एक गांव में खाना खाया, कुछ देर आराम किया और फिर आगे बढ़ गए। मांडवी के मुताबिक पिछले 20-22 साल में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब उन्होंने किसी गांव में लगातार दो रात बिताई हो। लगातार जंगलों में भागना और छिपकर रहना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया था।कई बार हालात इतने कठिन होते थे कि कई-कई दिनों तक नहाने का मौका तक नहीं मिलता था। मांडवी बताते हैं कि चार-चार, पांच-पांच दिन तक वे नहाए बिना जंगलों में भागते रहते थे। कभी तेज गर्मी, कभी कड़ाके की ठंड और कभी लगातार बारिश के बीच चलना पड़ता था। मौसम की मार से बीमार पड़ने पर भी आराम करने का पर्याप्त समय नहीं मिलता था।

बीमारी में जड़ी-बूटियों के सहारे इलाज

जंगल में बीमार पड़ना अपने आप में बड़ी परेशानी थी। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जड़ी-बूटियों के सहारे इलाज किया जाता था। उनके साथ एक मेडिकल किट भी चलती थी, लेकिन उसमें इतनी पर्याप्त दवाएं नहीं होती थीं कि बीमारी या तकलीफ में तत्काल राहत मिल सके।मांडवी के मुताबिक कई बार बीमारी के बावजूद चलना पड़ता था। शरीर थकता जा रहा था और उम्र बढ़ने के साथ जंगल की वह जिंदगी और मुश्किल होती जा रही थी। जो जिंदगी कम उम्र में रोमांच और बदलाव जैसी लगती थी, वही धीरे-धीरे बोझ बनने लगी।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, जिंदगी बोझ बनती गई

मांडवी कहते हैं कि शुरुआत में उम्र कम थी, शरीर में ताकत थी और आगे के बारे में ज्यादा सोचने की समझ नहीं थी। लेकिन समय बीतने के साथ हालात बदलते गए। लगातार भागना, छिपना, मौसम की मार, बीमारी और अनिश्चितता ने शरीर और मन दोनों पर असर डाला।जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, जंगल की जिंदगी बोझ लगने लगी। एक तरफ सुरक्षा बलों का दबाव बढ़ रहा था तो दूसरी तरफ संगठन के भीतर भी परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रह गई थीं।

सुरक्षा बलों का घेरा कसता गया

समय के साथ सुरक्षा बलों की कार्रवाई और दबाव बढ़ता गया। मांडवी बताते हैं कि उनके पास मौजूद हथियारों में से ज्यादातर पुराने हो चुके थे। संगठन के सामने भी परिस्थितियां बदल रही थीं। आखिरकार एक समय ऐसा आया जब उनके नेताओं ने ही कहा कि अब आगे कुछ नहीं किया जा सकता और हथियार डाल देना चाहिए।इसके बाद मांडवी और उनके साथियों ने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना। उनके लिए यह केवल हथियार छोड़ने का फैसला नहीं था, बल्कि दो दशक से ज्यादा समय से चली आ रही जिंदगी से बाहर निकलने की शुरुआत थी।

अब लगता है जैसे भ्रमजाल में जी रहे थे

आत्मसमर्पण के बाद मांडवी को अब अपनी पुरानी जिंदगी को नए नजरिए से देखने का मौका मिल रहा है। उनका कहना है कि अब उन्हें राहत महसूस होती है और लगता है कि इतने वर्षों तक वे एक भ्रमजाल में जी रहे थे।
मांडवी कहते हैं, अब मन को बड़ी राहत महसूस हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे अब तक हम सब एक भ्रमजाल में जी रहे थे और सच्चाई अब हमारे सामने है।

66 लोग सीख रहे हैं सामान्य जिंदगी का ककहरा

सुकमा के पुनर्वास केंद्र में फिलहाल 44 पुरुष और 22 महिलाएं रह रही हैं। इनकी उम्र 22-23 साल से लेकर 53-54 साल तक है। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बस्तर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से के गांवों से नक्सली संगठन से जुड़े थे।अब इन लोगों के सामने हथियार छोड़ने के बाद सामान्य जीवन में लौटने की चुनौती है। वर्षों तक जंगल में रहने के बाद घर, परिवार, रोजगार और समाज के साथ सामान्य संबंध बनाना इनके लिए एक नई प्रक्रिया है। पुनर्वास केंद्र इसी बदलाव की शुरुआती जगह बना है।मांडवी की कहानी में सबसे बड़ा बदलाव यही है कि जिस जिंदगी में कभी जंगलों में लगातार भागना और छिपना उनकी मजबूरी थी, अब उसी जिंदगी से बाहर निकलकर वे ठहरना सीख रहे हैं। उनके शब्दों में, पहले पुरानी जिंदगी का प्रायश्चित करना है और फिर नई जिंदगी जीने की हिम्मत जुटानी है।

पुनर्वास केंद्र में नई जिंदगी की तैयारी

सुकमा के पुनर्वास केंद्र में सरेंडर कर चुके नक्सलियों के लिए सरकार ने रहने और प्रशिक्षण की व्यवस्था की है। 3 मंजिला इस भवन में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं। केंद्र के फर्स्ट फ्लोर पर महिलाओं और सेकंड फ्लोर पर पुरुषों के रहने की व्यवस्था है। यहां आने वाले लोगों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार 3 से 6 महीने तक अलग-अलग कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता है, निरक्षर लोगों को पांचवी तक की पढ़ाई सिखाई जाती है।प्रशिक्षण में खेती-बाड़ी, राजमिस्त्री, बढ़ई, लोहार, मोटर मैकेनिक, सिलाई-बुनाई सहित कौशल विकास से जुड़े विभिन्न काम शामिल हैं। इस अवधि में रहने, खाने, कपड़े और दवाइयों की व्यवस्था सरकार की ओर से की जाती है। इसके अलावा प्रशिक्षुओं को ₹10,600 का वेतन भी दिया जाता है।

जो युवक-युवतियां आयुष अस्पतालों में सेवा कार्य करना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए अलग से प्रशिक्षण दिया जाता है। अधिकारियों के मुताबिक, जिन लोगों ने 3 महीने के प्रशिक्षण के दौरान अच्छा काम किया, उनमें से कुछ को आयुष अस्पतालों में नियुक्त भी किया गया है।3 से 6 महीने का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन्हें अपने गांवों की ओर भेजा जाता है, ताकि वे सीखे हुए हुनर के आधार पर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सकें। गांव लौटने के बाद भी पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं होती। सरकार ने गांवों में निगरानी केंद्र बनाए हैं, जहां से इनकी स्थिति और पुनर्वास की प्रगति पर नजर रखी जाती है।

 परिवार ने हथियार उठाने से रोका था, लेकिन लौटने पर गांव ने अपनाया नहीं

मांडवी कोसा बताते हैं कि यह कहना सही नहीं होगा कि पूरा समाज नक्सली गतिविधियों के पक्ष में था। जब उन्होंने घर छोड़कर हथियार उठाने का फैसला किया था, तब उनकी मां बहुत रोई थीं और पिता ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की थी। परिवार के लोगों ने उन्हें समझाया था कि वह यह रास्ता छोड़ दें, लेकिन कम उम्र में उन्होंने किसी की बात नहीं मानी।मांडवी के मुताबिक करीब 23 साल तक जब वह हथियारबंद जिंदगी में रहे, तब परिवार में किसी ने उनसे मिलने की कोशिश नहीं की और न ही उनकी स्थिति जानने का प्रयास किया। परिवार को यही लगता रहा कि शायद वह अब जिंदा नहीं हैं।वह बताते हैं कि जब हथियार छोड़कर वापस गांव लौटे तो स्थिति और कठिन थी। गांव के लोग उनसे बात करने के लिए तैयार नहीं थे और कई लोग उनसे नफरत करते थे। मांडवी के अनुसार संगठन के लोगों ने ग्रामीणों के भीतर इतना डर पैदा कर रखा था कि वे खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते थे। स्थानीय भाषा में इलाके की वास्तविक स्थिति और बाहर की दुनिया की जानकारी देने वाला कोई माध्यम भी उनके पास नहीं था।मांडवी कहते हैं कि गांव के कई लोग संगठन के साथ अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि डर और परिस्थितियों के कारण बने रहे। लोग कंपनी वालों से डरकर और सहन करके रहते थे, इसलिए उनका साथ देते थे,ऐसा मांडवी का कहना है।

प्रशासन का फोकस पुनर्वास के साथ सोच में बदलाव

सुकमा कलेक्टर अमित कुमार और एसपी मयंक गुर्जर का कहना है कि सरेंडर कर चुके नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना बड़ी चुनौती है। इसके लिए प्रशासन की ओर से पुनर्वास, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।

अधिकारियों के मुताबिक कोशिश केवल हथियार छुड़ाने तक सीमित नहीं है। उद्देश्य यह भी है कि लंबे समय तक नक्सली संगठन के साथ रहे लोगों को सामान्य सामाजिक जीवन के लिए तैयार किया जाए, उनका भरोसा बहाल हो और वे अपने परिवार तथा समाज के बीच सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू कर सकें।
कलेक्टर और एसपी का कहना है कि प्रशासन पूरी तरह कमर कसकर काम कर रहा है और आने वाले समय में प्रयास रहेगा कि सरेंडर कर चुके सभी नक्सलियों को सहज तरीके से मुख्यधारा में लाया जा सके और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed