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सीजी: विभागीय जांच के बिना कर्मचारी को नहीं दे सकते दंड, हाईकोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश किया रद्द
Sat, 31 Oct 2026 11:02 AM IST
शबाहत हुसैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
Published by: शबाहत हुसैन
Updated Sat, 31 Oct 2026 11:02 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा चौकीदार को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच के बिना दंडात्मक कार्रवाई अवैध है। कर्मचारी को बड़ी राहत मिली।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हाईकोर्ट के जस्टिस एनके व्यास ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच के बिना दंडात्मक कार्रवाई करना अवैधानिक है। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय द्वारा चौकीदार को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दिए जाने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया है।
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बीमारी और हृदय संबंधी परेशानी का दिया था हवाला
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता रामसिंह यादव की नियुक्ति 6 जुलाई, 2002 को पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में चौकीदार के पद पर हुई थी। परिवीक्षा अवधि पूरी हो जाने के बाद 8 जुलाई, 2004 को उनकी सेवा नियमित की गई थी। इसके पश्चात उन पर 7 जून से 4 अगस्त, 2011 तक अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहने का आरोप लगा था। याचिकाकर्ता ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी नोटिस का जवाब दिया, जिसमें अपनी बीमारी तथा हृदय संबंधी परेशानी का हवाला दिया था। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने 10 सितंबर, 2012 को 461 दिनों की अनुपस्थिति को बिना वेतन की अवधि मानते हुए एक वेतनवृद्धि रोकने का दंड दिया। इसके बाद 16 अप्रैल, 2013 को उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई।
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निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करने पर रद्द हुआ आदेश
विश्वविद्यालय के इस निर्णय के खिलाफ याचिकाकर्ता ने अभ्यावेदन भी प्रस्तुत किया था, जिसे 11 जुलाई 2018 को खारिज कर दिया गया। इस फैसले से परेशान होकर चौकीदार ने न्याय प्राप्त करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दंडात्मक प्रकृति का था और इसे नियमित विभागीय जांच चलाए बिना ही जारी कर दिया गया था। विश्वविद्यालय ने कोर्ट में बार-बार अनुपस्थिति और खराब कार्यप्रदर्शन का तर्क दिया था, लेकिन अदालत ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी माना। इसके बाद हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया।